राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र, ओडिशा के पंडो समुदाय की दुर्दशा

गुलाब नाग खुरसेंगा:

छत्तीसगढ के सूरजपुर ज़िले के प्रतापपुर गॉंव में एक गढ़ के अवशेष के रूप में पत्थरों से बनी हुई दिवाल और बाँध आज भी दिखाई देते हैं। कहा जाता है कि यह क्षेत्र एक ज़माने में गोण्डवाना राजा का राज्य हुआ करता था। दुलदुलीपारा ब्लॉक के ग्राम पंचायत घुइ का यह गॉंव, रमकोला गढ़ के अंतर्गत आता है। यह गॉंव चारों ओर जंगलों से घिरा हुआ है। 

इस गॉंव की कुल जनसंख्या 1152 है जिसमें 584 पुरूष और 568 महिलाएं हैं। इस गॉंव में आदिवासी और यादव समाज के लोग निवास करते हैं जैसे गोण्ड, पण्डो, कोरवा, खैरवार आदि। छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे बड़ा वन अभ्यारण, तमोर पिंगला है जिसका क्षेत्रफल 608.52 वर्ग कि.मी. है। इसी तमोर पिंगला वन अभ्यारण के दूसरी ओर एक घुटरा है जिसे जोगी बॉध घुटरा के नाम से जाना जाता है। यह घुई ग्राम से दस किलोमीटर दूर है। इस जंगल में विभन्न प्रकार के कंद, मूल, फल, फूल, और जंगली जानवरों का रैन बसेरा भी है। यहाँ हाथियों का कॅारीडोर भी छत्तीसगढ़ शासन द्वारा बनवाया गया लेकिन इतना सब होने के बाद भी इस जंगल में एक ऐसा आदिवासी कबीला है जो गुफा में रहने वाला समुदाय है। 

आइये विकास की परिकल्पनाओें का आंकलन करते हैं। चलिये ले चलते हैं आप लोगों को ग्राम पंयाचत घुई के दुलदुलीपारा गॉंव। यहॉं एक ऐसा आदिवासी समुदाय है जो आज भी जंगलों में रहने पर ही परम सुख का अनुभव करता है। इनकी हालत ऐसी हो गई कि ये वनों में रहने के लिये मजबूर हो गये हैं। इनके पास रहने के लिये घर नहीं होने के कारण ये मार्च 2021 से वनों में रह रहे हैं और वनों से प्राप्त होने वाले कंद-मूल, फल-फूल और जड़ी-बूटी को खाकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। और अपने बाल बच्चों का भरण पोषण कर रहे हैं। इस आदिवासी समुदाय का नाम पण्डो है।

इस पण्डो समाज के जीवन की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने व उन्मुखीकरण के नाम से जिला व जनपद स्तर पर सरकार लाखों रूपये खर्च करती है। लेकिन इन सब रूपये से पण्डो समाज के जीवन की बौद्धिक क्षमता व उन्मुखीकरण का दूर-दूर तक कोई संबंध नही है। राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहे जाने वाला यह पण्डो समुदाय, विकास के नाम से आज भी अनभिग्य है। वर्तमान सरकार के कोई भी अधिकारी, कर्मचारी, नेता, मंत्री, डी.डी.सी या बी.डी.सी आज तक इन पण्डो समुदाय की खबर लेने नहीं पहुँचे है। इनका कहना है कि हमारे पास जगह व ज़मीन नहीं होने के कारण हम लोग जंगल में अपने परिवार और अपने गाय, बैल, मुर्गीे, बकरी के साथ जंगल में ही रहना उचित समझते हैं। क्योंकि यहॉं पर किसी प्रकार की परेशानी उत्पन्न नहीं होती है।

कोरोना काल के समय से यह पण्डो समुदाय जंगलों मे रह हैं, इनसे बात करने पर पता चला कि छोटी छोटी बीमारियां उत्पन्न होती है तो ये लोग जंगलों से प्राप्त औषधी, जैसे पेड़ की पत्ती या छाल को पीसकर पी लेते हैं या अन्य जड़ी बूटी के माध्यम से बीमारी को ठीक कर लेते हैं। बहुत ही गंम्भीर बीमारी होती है तो उस स्थिति में ही अस्पताल जाते हैं। 

समुदाय से हुई बातचीत और उनके आसपास की स्थिति को आप इस विडियो इंटरव्यू के द्वारा समझ सकते हैं

प्रस्तुत है इस जनजाति के कुछ सदस्यों से बातचीत के कुछ अंश – 

रामधनी जी का कहना है कि जंगलो मे विभिन्न प्रकार के कंद मूल, जड़ी बूटी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था, लेकिन आज से दस साल पहले बाहर के लोग आते थे और हमारे गॉंव मे निवास करने वालों को मजदूरी देकर जंगलों से मिलने वाली विभिन्न प्रकार की औषधी को ले जाते थे। तब से ये औषधी कम हो गई और आज मिलती नहीं है। आज की स्थति में जंगलो की बहुत सारी जड़ी बूटी, कंद मूल फल फूल समाप्त हो रही है।

वृक्षकुमार जी का कहना है कि यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े वन अभ्यारण के अन्तर्गत आता है, जिसे तमोल पिंगला के नाम से जाना जाता है। जिस दिन से हम लोगों ने इस घनघोर जंगल मे अपना घर बनाया है, उस दिन से लेकर आज तक किसी प्रकार का कोई भी बड़ा से बड़ा जानवर से मुलाकत नहीं हो पाया और ना ही किसी भी प्रकार का कोई भी जंगली जानवर हमारे पास आते हैंं लेकीन जंगली जानवरों की आहट हमारे कानों में गूंजती रहती है और हम लोगों का जिंदगी कब इन जंगली जानवरों के हाथ में लग जायेगी  इसका कोई ठिकाना नहीं है। 

दशमत जी का कहना है कि हम लोग कई बार सरपंच सचिव से बोले हैं कि हमारा नाम आवास मित्र के लिये जोड़ दिया जाये और पूरी कोशिश भी किया गया कि संरपच/सचिव ग्राम पंचायत के ग्राम सभा में भी लिखवाये लेकीन हम लोगों की बात कोई भी सुनने को तैयार नहीं होते हैं। इसीलिये हम लोग जंगलो में रहने के लिये मन बना लिये हैं, और जंगल में रह रहे हैं। रात भर हम लोग उठ बैठ कर सोते हैं। हम लोग परेशान हैं। हम जैसे गरीबांेे की बात को कोई भी नहीं सुनता है। किसी तरह से हम लोग अपना पेट पाल रहे। क्या करें हम लोगों के पास ज़मीन जगह भी नहीं है। रात में आये दिन यहॉं पर हाथियों और बाघ और वनभैंसा का आवागमन लगा रहता है। इसके बाद भी हम अपनी जान हथेली पर रख कर वनों में रहने के लिये मजबूर हो गये हैं। 

रमेशरी जी का कहना है कि हमारे रहने के जमीन और घर नहीं है इसीलिये हम लोग गाय, बकरी और मुर्गी लेकर जंगलो मे रहने को मजबूर हैं। जंगल मे रहने पर गॉंव जैसा सुविधा तो नहीं होता है। रात मे जाग जाग कर सोना पड़ता है कहीं कोई जंगली जानवर कहीं से हमला तो नहीं कर रहा है। हमेशा डर बना रहता है लेकिन रहते रहते अब तो आदत हो गई। अब किसी प्रकार का डर नहीं लगता है, लेकिन आखिर जंगल तो जंगल है, गॉंव जैसे सुख-सुविधा नही मिलता है। किसी प्रकार से यहाँ पर रह रहे। क्या करें, कहॉं जायें, कुछ समझ में नही आ रहा है। किसके पास जायें, कोई हम लोग की बात सुनने के लिये तैयार नहीं है। इसीलिये हम लोग यहॉ जोगी बांध घुटरा में रह रहे है।  

पण्डो समुदाय की आर्थिक स्थिति को देखकर ऐंसा लगता है जैसे वास्तव में आदिम युग के मानव से मुलाकात हो गई है। समाज बहुत साहसी और हिम्मत वाला है लेकिन खाना कंद मूल और कुछ भी जो जंगलों से मिल जाये उसे खाकर अपना पेट भर लेते हैं और पानी लगभग तीन किलो मीटर दूर नहरों, नदी, झरनों से लाकर पीते हैंं। किसी तरह से अपनी  ज़िंदगी काट रहे हैं। इनका कहना है कि जंगल से ही हमारे पूर्वजों ने अपना जीवन जिया तो हम लोग भी अपना जीवन जंगल को घर एवं गॉंव मानकर ही काट लेंगे।

लेकिन सोचने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि भारत दुनिया में बहुत टेक्नॉलोजी में उपलब्धी हासिल किया है और विश्वगुरू बनने जा रहा है। ऐसे वैज्ञानिक युग होेने के बाद भी आज आदिवासी समाज के जीवन पर क्या कहर टूट रहा और यह ऐसा समुदाय है जो विलुप्त प्रजाति की श्रेणी में आते हैं। सब कुछ सुविधा होने बाद भी इन पण्डो समाज की आवाज़ को सुनने व जानने और वास्तविकता को समझने के लिये तथा दयनीय स्थिति से गुजर रही इनकी हालत को देखने के लिये आज तक शासन प्रशासान के कोई भी अधिकारी कर्मचारी नेता विधायक सासंद नहीं आये। आखिरकार क्यों जंगलों की ओर पलायन होने पर मजबूर हो रहे हैं?

आजादी के चौहत्तर साल बीत जाने के बाद ऐसा क्यों है कि पण्डो समुदाय आज भी एक ऐसा समुदाय है जो आदि मानव की तरह जंगलों में जीवन जी रहे हैं? और चौहत्तर साल में  बहुत सारी ऐसी चीजों का आविष्कार/ विकास हुआ जिसका हम अंदाजा ही नहीं लगा सकते थे। क्या वास्तव में विकास इसी का नाम है? लेकीन आज तो स्थिति यह उत्पन्न हो गई है कि विकास के नाम से सरकार आदिवासियों (कोयतुर) का विनाश करते जा रही है। और आज तक आदिवासी समाज के लोग विकास के नाम से कोसों दूर हैं। इनको तो आज तक मालूम ही नहीं है कि विकास होता क्या है? इतना ही दिख रहा है कि विकास के नाम पर आदिवासियों की संस्कृति को योजनाबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है। 

जहाँ-जहाँ पर विकास हुआ वहां पर आदिवासियों की संस्कृति को ही समाप्त कर दिया गया है। जैसे नगर पंचायत बना दिया जाता है तो वहां पर आदिवासियों की संस्कृति समाप्त हो जाती है। दुनिया में जितने भी देशों ने विकास किया वे सिर्फ आदिवासियों की संस्कृति को विनाश कर के ही किया गया है। कुछ हद तक गाँवों में आदिवासियों में सांस्कृतिक संचरना दिखाई देती है लेकिन अब माइनिंग और जंगल उजाड़ने के लिए कई कानून बना दिए गए  है जिससे आदिवासियों को नष्ट किया जा सके और उनके जल, जंगल, जमीन को छीन कर कार्पाेरेट के हाथों दिया जा सके।

Author

  • गुलाब नाग खुरसेंगा, छत्तीसगढ़ के बलरामपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह गाँव गणराज्य संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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