उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में पारंपरिक अनाजों से मनाई जाती है दिवाली

सिद्धार्थ:

किसी त्यौहार को एक कहानी से जोड़ देना और उन्हें एक ही तरीके से मनाना ऐसा खासतौर पर शहरों में ही देखने को मिलता है, लेकिन ऐसा हमेशा से नहीं रहा है। अभी कुछ ही दिनों में दिवाली आने वाली है, हमारे देश के अलग-अलग इलाकों में दिवाली त्यौहार को भी अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता रहा है। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में आने वाले 6 पर्वतीय जिलों में भी दिवाली को मनाने के अलग-अलग तरीके रहे हैं। मेरे माता-पिता दोनों ही टिहरी गढ़वाल ज़िले से हैं, तो मैंने उनसे इस बारे में विस्तार से पूछा कि उनके इलाकों में दिवाली कैसे मनाते थे।

मेरे पिता बताते हैं, “हमारे बचपन में तो पटाखे वगैरह नहीं होते थे, लेकिन त्यौहार का उत्साह खूब रहता था। दिवाली का पर्व 3 दिन तक चलता था। असल में यह फ़सल की कटाई की ख़ुशी मनाने का मौका होता था। खेतों में झंगोरा (एक तरह का मोटा अनाज जो चावल की तरह खाया जाता है), कोदा (मंडुआ), जौ, ये सब तैयार हो जाते थे, और इसके बाद गेहूं की बुआई होनी होती थी। फिर रात-रात जग के पानी लगाना वगैरह तो ठण्ड में और मुश्किल हो जाता था। इसलिए दिवाली एक ब्रेक की तरह भी लगता था। अच्छे पकवान मिलते थे खाने को। रात को खेल और नाचना भी होता था तो मजा आता था। 

हमारी पट्टी बडियारगढ़ में दिवाली की तैयारी तो हफ़्ता-दस दिन पहले से ही शुरू हो जाती थी। हम घर की सफ़ाई करते थे। रंग रोगन होता था, चौक की लिपाई होती थी। इसकी भी बड़ी कहानी है भाई! हमारे गाँव से 3 से 4 किलोमीटर दूर (पहाड़) के ऊपर एक गाँव था जहाँ पानी के सोते के पास सफ़ेद मिट्टी की खान थी। उससे बोरों में भर के सफ़ेद मिट्टी लाते थे जिससे घर (की ऊपर की मंजिल की) की पुताई होती थी। लाल मिट्टी और गोबर से नीचे की दीवारों और फ़र्श की लिपाई करते थे। तीन दिन के इस त्यौहार में पहला दिन धनतेरस का होता था, इस दिन हम पशुओं की पूजा करते थे, उन्हें झंगोरा पका के खिलाते थे। कोदे के आटे के पिट्ठे बना के खिलाते थे। उन्हें तेल लगाते थे। ऐसे होता था पहला दिन। पशु ही हमारा धन होता था। कोई चाँदी का सिक्का लाना या बर्तन खरीदना, ये सब नहीं होता था। बाद में पंजाबी और देसी (मैदानी इलाकों के लोग) लोगों को देख के हमारे गढ़वाल के लोगों ने भी ये सब करना शुरू कर दिया, हम भी अब करते हैं। 

दूसरे दिन जिसे छोटी दिवाली बोलते हैं, उस दिन बस अच्छा खाना बनता था – पकौड़ी, अड़से (चावल और गुड़ से बनाई जाने वाली एक तरह की मिठाई) और मीठे रोट बनाते थे। खुद भी खाते थे और गाँव में और लोगों को बाँटते थे। फिर दिवाली के दिन लक्ष्मी की पूजा होती थी। राम जी के घर आने वाली कहानी हमारे यहाँ प्रचलित नहीं थी। अच्छी फ़सल की कामना के लिए गाँव के देवता और लक्ष्मी की पूजा करते थे। कोई मूर्ति-फोटो तब तो होती नहीं थी। एक किसी पत्थर को ही लक्ष्मी मान लेते थे। लेकिन असली मज़ा तो रात को आता था। गाँव के सब लड़के जंगल से कुळैं (चीड़) की लकड़ी के अंदर का सूखा हुआ लीसा (रेज़िन जिससे तारपीन का तेल भी बनता है) ले आते थे। इसका एक से डेढ़ फ़ीट लम्बा एक गट्ठर बना के उसे भीमल (पीपल जैसा एक स्थानीय पेड़) की टहनियों की हरी छाल से बनी रस्सी से बाँध दिया जाता था, इसे हम भैलू बोलते थे। भैलू खेलना इस दिन का मेन प्रोग्राम होता था। भैलू खेलने के लिए इसे दोनों तरफ से जला देते थे फिर रस्सी के एक सिरे से पकड़ के घुमाते थे। और अंत में इन्हें पूरा जलने के लिए छोड़ देते थे। आस-पास के गाँवों में भी रात को ये जलते हुए दिखते थे। एक तरह का कॉम्पटीशन हो जाता था कि किसके गाँव के भैलू देर तक जलते हैं। भैलू खेलने के बाद गाँव के चौक में सब इकठ्ठा हो के दिवाली के गीत लगते थे और झुमैलो (लोकनृत्य) नाचते थे। ऐसे मनाते थे हम दिवाली।” 

मेरे पिता ने एक और रोचक बात यह भी बताई कि उत्तरकाशी, जौनपुर और जौनसार इलाकों में जहाँ स्थानीय जनजाति समुदाय के लोग ज़्यादा हैं, वहां दिवाली मंगसीर (मार्गशीर्ष) महीने की संक्रांत (पहली तिथि) से 11 दिनों तक मनाई जाती है। मनाने के तरीके समान ही होते हैं बस समय बदल जाता है।

मेरी माँ बताती हैं, “हमारी पट्टी सिल्काखाल में भी धनतेरस के दिन पशुओं की पूजा करते थे। बहुत उत्साह से घर को सजाते थे। फिर दिवाली के दिन बरत (एक स्थानीय घास) का एक मोटा रस्सा बनाया जाता था और गाँव के लोग, दो टीम बनाकर रस्साकस्सी खेलते थे। रात के समय सब अपने घर से भैलू बना के लाते थे और जलाते थे। युवा लड़के उनसे करतब भी करके दिखाते थे। हमारे यहाँ कुळैं (चीड़) के पेड़ ज़्यादा नहीं हैं, इसलिए हम हीसर और किन्गोड़ (स्थानीय झाड़ियां, जिनके फल खाए भी जाते हैं) से भैलू बनाते थे। हमारे यहाँ पे भी लक्ष्मी की पूजा होती थी, और राम के घर आने की कथा भी लोग जानते थे। जिनके घर के लोग दिल्ली में नौकरी करते थे वो लोग पटाखे भी लेकर आते थे। लेकिन मुख्य रूप से घर को दीयों से सजाना, पशुओं की पूजा करना, रंगाई-लिपाई करना, भैलू खेलना और गीत लगा के झुमैलो नाचना ही दिवाली पे किया जाता था।”

फीचर्ड फोटो आभार: जागरण

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  • सिद्धार्थ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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