आस्तिकता और नास्तिकता से परे है हमारी संस्कृति

पावनी:

एक बार मेरे पापा के दोस्त हमारे घर आए हुए थे। दूर का सफ़र था इसलिए रात को वो हमारे घर ही रुके। उनके साथ बहुत मज़ा आया। साथ ही हमें पता चला कि वो एक नास्तिक हैं। हमारा एक रूढ़िवादी परिवार है और उसमें मेरे पापा भी अपने आप को एक नास्तिक मानते हैं। (तो हम कहाँ थे?) हाँ… वो अपने आप को नास्तिक मानते थे। 

हमारे यहाँ एक रिवाज़ है। खेर हमारे यहीं ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड में हर जगह यहीं रिवाज़ है कि मेहमान के जाते वक़्त उन्हें तिलक लगाने का। (हाँ, फिर क्या हुआ?) वो अपने घर के लिए निकल रहे थे। मेरी अम्मा (दादी माँ) ने उन्हें तिलक लगाया और उनके सर पर फूल भी रखा। उन्होंने बड़ी इज्ज़त से उनके पैर छुए व उन्हें प्रणाम कहा। तभी मैंने उनसे पूछा, कि आप तो अपने आप को नास्तिक मानते हैं, तो फिर आपने तिलक क्यों लगाया? और तो और मेरी अम्मा को प्रणाम भी बोला। जवाब में उन्होंने बोला कि क्यूँ? तिलक लगाना हमारी संस्कृति है। इसमें आस्तिकता और नास्तिकता की कोई बात नहीं है।  (समझे ? हाँ !)

तिलक लगाना हमारी संस्कृति है और हमें इसमें शर्माना नहीं चाहिए और उससे भी बड़ी बात, तिलक लगाने के बाद, प्रणाम करना मत भूलना हाँ !

ये कहानी मैंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से से लिखी है। ये बात मुझे मोहन दा ने बताई थी। आप उन्हें फेसबुक पेज पर देख सकते हैं। 

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है। फीचर्ड फोटो आभार: फ्लिकर

Author

  • पावनी कक्षा आठ में पढ़ती है और उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले से हैं। वह लोक कथाओं, लोक संस्कृति और लोक संगीत में रूचि रखती हैं।

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