मंजिल की राहें

बाबूलाल बेसरा:

ज़िंदगी एक सफर है,
कठिन है राह, कम है समय, 
सामना कर मंजिल की ओर बढ़ना है,
न कोई है मेरे साथ, 
अकेला हूँ मैं, आशाओं के साथ॥

दूर है मंजिल लंबा है सफर,
अंधेरी है राहें, न कोई मेरे साथ,
न जाने क्या होगी ज़िंदगी, 
किस पर मैं भरोसा करूं पता नहीं, 
मंजिल की तरफ जाऊँ कैसे ?

सही गलत का अंदाज नहीं,
मन ही मन में डर है कहीं,
करना है ज़िंदगी का सफर, 
मंजिल हासिल करनी है मुझे, 
अपने भविष्य को उज्जवल बनाना है हमें,
अपने आदिवासी भाई-बहनों को,
जागृत करना है हमें ॥

मन कहता है आकाश को छू लूँ, 
अपने सपनों को साकार बनाऊँ,
अब पता चला संगठन है मेरे साथ, 
अपनी अनमोल ज़िंदगी की राहों में, 
कभी पीछे हटूँगा नहीं ॥

बनकर रहूँगा कामयाब इंसान, 
रौशन करूंगा नाम अपना, 
अर्थ बनूँगा सभी का, 
शिक्षा मिलेगी किसी को मेरे से, 
सफल बनेगा जीवन सबका, 
आगे बढ़ेगा गाँव हमारा ॥

फीचर्ड फोटो आभार: महिपाल ‘मोहन’

Author

  • बाबूलाल बेसरा, बिहार के बांका ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। अपने क्षेत्र के संगठन- आदिवासी मजदूर किसान मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

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