लाल प्रकाश राही: 

मैं अंधेरा बाटता हूँ। 
सुबह से शाम, दोपहर से रात,
हर समय हर जगह, जहाँ देखोगे जिधर देखोगे,
मिलूँगा मैं, सिर्फ मैं।

संसद से लेकर गाँव की चौपाल तक,
राजपथ से लेकर पगडंडी तक, 
व्याप्त है मेरा, सिर्फ मेरा ‘साम्राज्य’। 

प्रेम मेरी परिभाषा नहीं,
इंसानियत मेरा रूप नहीं,
यह दिखावा है सिर्फ दिखावा,
अपने अस्तित्व को बचाने का,
एक सफेद मुखौटा, 
वह भी नकली, सिर्फ नकली ‘मुखौटा’।

क्योंकि मैं जानता हूँ, 
जनता की अज्ञानता में ही,
मेरी हुकूमत निहित है,
इसीलिए मैं बाँटता हूँ अंधेरा, सिर्फ अंधेरा।

मेरा अस्तित्व उस वक्त नहीं था,
जब मानव सभ्यता का विकास हो रहा था, 
मैं आया अस्तित्व में उस वक्त,
जब इंसान में व्यक्तिगत संपत्ति का पदार्पण हुआ,
जनता को मूर्ख बनाना मेरा कर्तव्य और उसका शोषण मेरा धर्म है।

मैं आता हूँ चुपके से बैठ जाता हूँ,
लोगों के अन्तः मन में,
दिखाता हूँ भय उस आखिरी सत्ता के मालिक का,
वास्तव में जो कभी था ही नहीं,
थीरे- धीरे गुलाम बना लेता हूँ अपना ‘सिर्फ गुलाम’,
वह भी मानसिक गुलाम।

मेरे सिवाय कुछ और सोचना उनको पाप सा लगता है,
कारण बन जाता हूं मृत्यु का, 
उनके लिए जो करते हैं खुलेआम मेरा विरोध।

प्रत्येक्ष उदाहरण मिलेगा आपको इतिहासों में,
कभी सुकरात तो कभी गैलीलियो के रूप में,
इनकी मृत्यु मेरे अस्तित्व नकारने के कारण हुई थी।

बदलता रहता हूँ हर वक्त अपना रंग गिरगिट की तरह,
ऐसा करना खुद के लिए भी ज़रूरी है,
क्योंकि अपने अस्तित्व को जो बचाए रखना है।

कभी ब्राह्मणवाद तो कभी पुरोहितवाद,
मध्यकाल का मेरा रूप सामंतवाद और उपनिवेशवाद, 
आधुनिक रूप मेरा है पूंजीवाद और साम्राज्यवाद।

मुझे भय है उनसे सिर्फ उनसे,
लगे हैं जो सत्य की खोज में,
पक्षधर हैं जो मानवतावाद के,
करते हैं माँग जो सिर्फ समाजवाद की।

खतरा बन गये हैं वे मेरे अस्तित्व के लिए,
छिड़ गया है द्वन्द इसलिए मेरे और उनके बीच,
चलता रहेगा निरन्तर द्वन्द उनके और मेरे बीच तब तक,
जब तक हो नहीं जाता फैसला जीत और हार का।

जानता हूं अच्छी तरह मैं आखिरी उस सत्य को,
अथक प्रयत्न कर रहा हूं दुर्बलता छिपाने को मैं अपनी,
धर्म, जाति, साम्प्रदायिकता, लिंग, नस्ल, आतंक, 
असफल प्रयत्न हैं मेरे ये दुर्बलता छुपाने के अपने,
निश्चित है मेरी हार और मेरा विनाश, आज या कल।

क्योंकि उतर चुका है मेरा नकली मुखौटा,
सामने दुनिया वालों के,
पहचानने की कोशिश करने लगे हैं लोग,
मेरा असली चेहरा,
जला दिया जाऊंगा जीते जी मैं ‘सिर्फ मैं’।

मिट जाऊंगा मैं, खत्म हो जाएगा मेरा साम्राज्य,
दुनिया मे होगा एक नया सवेरा, 
जहाँ होगा प्रेम, इंसानियत, सत्य का वास। 

सिर्फ ज्ञान की रोशनी
वह आखिरी सत्य होगा साम्यवाद, साम्यवाद ‘सिर्फ साम्यवाद’।

फोटो आभार: फ्लिकर

Author

  • लालप्रकाश राही, उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह दिशा संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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