कविता भील:

मेरे गाँव का नाम पीरखेड़ा है जो ग्राम पंचायत फाचर अहिरान में आता है। हमारी तहसील का नाम निम्बाहैड़ा है और हमारा ज़िला चित्तौड़गढ़ है। मेरा गाँव निम्बाहैड़ा से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। निम्बाहैड़ा एक बड़े शहर जैसा है। 60 परिवारों के मेरे गाँव में भील समाज के लोग रहते हैं, यहाँ एक प्राथमिक विद्यालय और एक आंगनवाड़ी केंद्र है। गाँव में एक छोटी माइन है और पास ही में सीमेंट फैक्ट्री भी। दोनों का ही प्रभाव सबसे ज़्यादा मेरे गाँव वालों को झेलना पड़ता है, क्यूंकि हम इसका कुछ कर ही नहीं सकते हैं। गाँव के अधिकतर लोग माइंस में मज़दूरी, जैसे पत्थर निकालने का काम करते हैं और इसलिए आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं।  

सबसे पहले हम यहाँ स्कूल में थे, तब हमारी पढ़ाई भी चल रही थी। तभी एक कोरोना वायरस नाम की बीमारी आई, यह एक बहुत बड़ी बीमारी है जो खूब तेज़ी से फैलने लग गयी थी। इसी के चलते हमारे स्कूल में भी छुट्टियाँ घोषित कर दी थी और हम सभी अपने-अपने गाँव वापिस चले गए थे। गाँव लौटने के बाद दिन बीतना शुरू हुए और कुछ ही दिनों के अन्दर देशभर में लॉकडाउन लग गया। ये सब होने के कारण हमारी पढ़ाई-लिखाई रुक गयी थी और हम खुद से भी पढ़ नहीं पा रहे थे। 

लॉकडाउन के दौरान, एक दिन प्रेरणा दीदी मेरे घर आई थी। मिलते ही उनका पहला सवाल था कि मैं पढ़ाई कर रही हूँ या नहीं! मैंने उनसे नज़रें छिपाने लगी और कुछ बोली ही नहीं। फिर हिम्मत कर के उनसे बोली कि दीदी आप खुद ही बताओ घर पर रह कर पढ़ाई हो पाती है क्या? ये सुनते ही दीदी मेरे तरफ देखी और फिर अपने झोले से उन्होंने पढ़ाई करने के लिए मुझे कुछ सामान निकाल कर दिया। साथ ही वो बोली, “तुझे अपनी पढ़ाई तो करनी ही है कविता, साथ में तुझे गाँव के छोटे बच्चों की पढ़ाई भी करवानी है।” बातचीत के दौरान दीदी से मिलने के लिए गाँव की बाकी लड़कियां भी मेरे घर पर आ गई थी। प्रेरणा दीदी ने सभी बच्चों को कॉपी, पेंसिल, रबर, शार्पनर, कलर्स आदि दिए और सभी बच्चों को आश्वासन देते हुए बोली, “तुम सब को रोज़ यहाँ पढाई करने के लिए आना है और अगर कभी कोई भी ज़रूरत हो तो मुझे फ़ोन कर देना।” पढ़ाई के महत्व पर आगे बात रखते हुए उन्होने सबको मेरी बात मानने को कहा और जमकर पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया। 

दीदी से मिलने के अगले दिन से ही मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। 2-4 दिन की इस पहल के बाद मुझे समझ आया कि अगर बच्चेंपढ़ने आ रहे हैं, तो उनका स्कूल के जैसे एक टाइम टेबल होना चाहिए जिसमें उनके आने का समय, पढ़ाई का समय, खेलने का समय और दिन की छुट्टी कितने बजे होगी, जैसे समय निर्धारित करना भी आवश्यक है। 

मैंने सब बच्चों को अगले दिन फिर इकठ्ठा किया और उनके साथ एक चर्चा के ज़रिये बात शुरू की। बातचीत में सब स्कूल बंद होने के बारे में बताया और इसके चलते ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाने की समस्या के बारे में बात की। तमाम तरह की कठिनायों पर चर्चा करने के साथ-साथ मैंने उनको स्वयं रोज़ पढ़ाई करने के संकल्प के बारे में बताया और उनको भी पढ़ाई-लिखाई पर गंभीरता से मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित किया। साथ में हमने कोरोना वायरस बीमारी के बारे में भी बात की। 

अगले दिन सुबह जब बच्चे पढ़ने के लिए आये, तब मैं सो रही थी। हँसते हुए बच्चों ने मुझे उठाया और मुझे चिढ़ाने लगे, “मैडम तो अभी तक सो रही है।” उस दिन मैंने सभी को वापस घर भेज दिया और अगले दिन से स्कूल आने के लिए कहा। पिछले दिन से सबक लेते हुए मैं जल्दी उठ गई और अगली सुबह स्कूल के लिए एक टाइम टेबल बनाया। दिन की शुरुआत 08:00 बजे स्कूल पहुँच कर, प्रार्थना, गीत, कविता गाने से करना तय किया गया। इसके बाद 10 मिनिट का ब्रेक देकर फिर दिन की कक्षा-पढ़ाई होगी जो कि दोपहर 01:00 बजे तक चलेगी। इसके बाद तय हुआ कि मैं भी सब बच्चों के साथ जुड़कर खेल खेलूँगी।  इसी प्रकार से मैंने बच्चों को टाइम-टेबल अनुसार पढ़ाना शुरू किया। पढ़ाई करने के बाद खेलने वाला सत्र हम सबको इतना पसंद था कि रोज़ ही खेलते-कूदते 2:00 बजे से ज़्यादा हो जाता था। 

इस पहल के द्वारा मैंने अपने गाँव के लगभग 35 बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। संख्या 35 तक ही रह पायी क्यूंकि एक तो मेरा गाँव छोटा है तो बहुत ज़्यादा बच्चे तो नहीं हैं।  ऊपर से बड़े बच्चों को मैं नहीं पढ़ा सकती थी क्यूंकि मैं स्वयं ही 9वीं कक्षा में हूँ और खुद भी सीख-पढ़ रही हूँ। इसी प्रकार पूरा लॉकडाउन का समय और बाद तक भी मैंने अपनी और छोटे बच्चों की पढ़ाई होती रहे ये सुनिश्चित करने का प्रयास किया। मेरा मनोबल बढ़ाने और साथ ही सहायता के लिए प्रेरणा दीदी मुझे समय-समय में स्कूल की सामग्री जैसे पेंसिल, रबर, शार्पनर, कॉपी-किताबें देती रहती थी और समय-समय पर वीडियो कॉल करके हम सबसे बातचीत भी करती थी। कभी-कभी मैं भी दीदी को सबकी पढ़ते हुए की फोटो खींच कर भेजती थी ताकि दीदी भी आश्वासित रहें कि हम सब बच्चे अच्छे से अपनी पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं। 

दीदी जब भी गाँव और मेरे घर पर आती थी, तो वो कोरोनो वायरस बीमारी से बचाव के लिए नए-नए नियम, सुझाव, इत्यादि की जानकारी हमसे साझा करती थी। मिलने के समय पर वह न केवल दूरी बना कर बैठ कर बातचीत करने के बारे में बोलती पर स्वयं का उदाहरण देते हुए मुँह पर मास्क लगा कर रखने के लिए भी बोलती थी। शनिवार के दिन हम सब लोग मिलकर चित्रकला भी बनाते थे जिसको फिर मेरे घर पर बने एक-कमरे की कक्षा में हम लटकाते। 

कुछ समय बाद मैंने स्कूल बंद कर दिया। तब गाँव की औरतें मेरे घर आकर मुझे बोलने लगी कि मैंने स्कूल क्यूँ बंद किया? बच्चों को पढ़ाना क्यूँ छोड़ दिया? क्या हुआ किसी ने कुछ बोला है क्या तुझे तो तू हमें बता? उन्होंने यह तक बोला कि अगर स्कूल की मैडम ने तुझे स्कूल बंद करने के लिए बोला हो तो, हम इसका अभी ट्रान्सफर करवाते हैं, लेकिन बेटा तू हमारे बच्चों को पढ़ाना मत छोड़ना। महिलाओं की यह सब बात सुनकर मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने वापिस स्कूल शुरू किया कुछ दिनों में। आज मेरा पूरा गाँव मेरे साथ है और मैं अपने गाँव की मिसाल ज़रूर बनूँगी।  

Author

  • कविता / Kavita

    कविता राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वर्तमान में कविता कक्षा 9 में पढ़ती हैं। लॉकडाउन के बाद से वह अपने गाँव में वृद्धा पेंशन, टीकाकरण और कोविड महामारी के बारे में जागरूकता और से बचाव के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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