ओमप्रकाश वाल्मीकि:

दलित साहित्य के अग्रणी लेखकों, विचारकों और कवियों में से एक ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म 30 जून, 1950 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के बारला गाँव में हुआ था। उन्होने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने गाँव और आगे की शिक्षा देहारादून में रहकर प्राप्त की थी। एक गरीब दलित परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन से ही उन्हें जाति व्यवस्था की कड़वी सच्चाइयों का अनुभव हो चुका था। युवा ओमप्रकाश ने कुछ समय महाराष्ट्र में रहकर काम किया था, इसी दौरान वह महाराष्ट्र के कुछ दलित लेखकों के संपर्क में आए जिन्होने उन्हें बाबा साहब अंबेडकर के विचारों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उनकी आत्मकथा जूठन उनकी प्रमुख रचनाओं में से एक है, इसके अलावा बस! बहुत हो चुका, सदियों का संताप (कविता संग्रह), सलाम (कहानी संग्रह), अब और नहीं, और घुसपैठिए उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। हिन्दी साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें 2009 में साहित्य भूषण, 1995 में परिवेश सम्मान और 1993 में डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

:तब तुम क्या करोगे:

यदि तुम्हें,
धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए
पानी तक न लेने दिया जाए कुएं से
दुत्कारा फटकारा जाए चिल-चिलाती दोपहर में
कहा जाए तोड़ने को पत्थर
काम के बदले
दिया जाए खाने को जूठन
तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें,
मरे जानवर को खींचकर
ले जाने के लिए कहा जाए
और
कहा जाए ढोने को
पूरे परिवार का मैला
पहनने को दी जाए उतरन
तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें,
पुस्तकों से दूर रखा जाए
जाने नहीं दिया जाए
विद्या मंदिर की चौखट तक
ढिबरी की मंद रोशनी में
काली पुती दीवारों पर
ईसा की तरह टांग दिया जाए
तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें,
रहने को दिया जाए
फूस का कच्चा घर
वक्त-बे-वक्त फूंक कर जिसे
स्वाहा कर दिया जाए
वर्षा की रातों में
घुटने-घुटने पानी में
सोने को कहा जाए
तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें,
नदी के तेज बहाव में
उल्टा बहना पड़े
दर्द का दरवाजा खोलकर
भूख से जूझना पड़े
भेजना पड़े नई नवेली दुल्हन को
पहली रात ठाकुर की हवेली
तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें,
अपने ही देश में नकार दिया जाए
मानकर बंधुआ
छीन लिए जाएँ अधिकार सभी
जला दी जाए समूची सभ्यता तुम्हारी
नोच-नोच कर
फेंक दिए जाएं
गौरव में इतिहास के पृष्ठ तुम्हारे
तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें,
वोट डालने से रोका जाए
कर दिया जाए लहू-लुहान
पीट-पीट कर लोकतंत्र के नाम पर
याद दिलाया जाए जाति का ओछापन
दुर्गन्ध भरा हो जीवन
हाथ में पड़ गये हों छाले
फिर भी कहा जाए
खोदो नदी नाले
तब तुम क्या करोगे?

यदि तुम्हें,
सरे आम बेइज्जत किया जाए
छीन ली जाए संपत्ति तुम्हारी
धर्म के नाम पर
कहा जाए बनने को देवदासी
तुम्हारी स्त्रियों को
कराई जाए उनसे वेश्यावृत्ति
तब तुम क्या करोगे?

साफ सुथरा रंग तुम्हारा
झुलस कर सांवला पड़ जाएगा
खो जाएगा आंखों का सलोनापन
तब तुम कागज पर
नहीं लिख पाओगे
सत्यम, शिवम, सुन्दरम!
देवी-देवताओं के वंशज तुम
हो जाओगे लूले लंगड़े और अपाहिज
जो जीना पड़ जाए युगों-युगों तक
मेरी तरह?
तब तुम क्या करोगे?

फीचर्ड फोटो आभार: विकासपीडिया

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