आपको सबसे पहले अपनी जाति के बारे में कब पता चला?

आशीष कुमार, अवध पीपल फॉरम, अयोध्या (फैज़ाबाद) (उत्तर प्रदेश)

जब मैं 14 साल की उम्र का था तब मैं अपनी छत पर पतंग उड़ा रहा था।  तभी पतंग कट गई।  एक लड़के ने मेरी डोर तोड़ ली तो मुझे गुस्सा आ गया। मैंने उस लड़के को दो थप्पड़ लगा दिया। दूर से उसका चाचा देख रहा था। वह अपनी बंदूक लेकर मुझे मारने के लिए दौड़ा। मैं अपनी जान बचाकर भागा। भागकर मैं अपने घर में छुप गया। घर पर मौजूद मेरी चाची ने उस शख्स का सामना किया जिसका नाम महेश था। वह यादव बिरादरी का था। उसने मुझे जाति सूचक खूब गालियां दी और मुझे यह अहसास कराया की मैं दलित हूँ। उस दिन जानकर पहली बार मुझे पता चला की मैं किस जाति का हूँ।

फुलेश्वर, जनजागरण शक्ति संगठन, अररिया (बिहार)

मेरा नाम फुलेश्वर है। 13 साल का था तभी मैं 8वीं पास करके 9वीं कक्षा के लिए नाम लिखवाने गया तो हाईस्कूल के अध्यापक बोले आपका जाति क्या है? यदि जाति नहीं है तो आपका नाम विद्यालय में नहीं लिखा जायेगा। तो हम वहाँ से लोट आये ओर मम्मी पापा से पूछा कि हम किस जाति के हैं? पापा ने बताया कि हम मुसहर जाति के हैं। जिन्हें ऋषिदेव भी कहते है। तभी मैं प्रखण्ड गया तो वहा मुझे प्रखण्ड अधिकारी ने बताया कि जो आपकी ज़मीन (पावती) नकल होगी, उस पर आपकी जाति भी लिखी होगी। मैं घर आया और अपने परिवार की ज़मीन रकसद लेकर गया। तब जा कर मेरा जाति प्रमाण पत्र बना और विद्यालय में मेरा एडमिशन हुआ। 

मेरा भाई एक यादव के घर पर काम करता था। एक दिन वह यादव घर से भाग गया। तो यादव हमारे घर आया और मेरे भाई के स्थान पर मुझे काम करने के लिऐ ले गया। जब घर से चले तो 10:00 बज चुके थे और यादव के घर पहुंच कर काम करने मे दोपहर के 12:00 बज गए थे। सभी खाना खा रहे थे। मुझे भी खाने को कहा गया। लेकिन अपने लिए अपने भाई की थाली मंगवाई गइ। वह थाली पुरानी सी थी व गायों के बाड़े मे रखी थी, और उसमे गोबर लगा था क्योकि वह थाली उस जानवरों के बाड़े में गोबर उठाने का बर्तन था। मैने थाली धोई और उसमे मुझे खाना दिया गया। तब मुझे पहली बार जात-पात, ऊंच नीच -नीच का भेदभाव पता चला।  मुझे इससे बहुत बुरा लगा और बहुत गुस्सा भी आया।

फीचर्ड फोटो आभार: अखिलेश

फोटो के बारे में जानकारी – अखिलेश बताते हैं कि ये सब बच्चे महादलित परिवार से हैं। इनके घर के आस-पास सड़क नहीं होने के कारण, कई पीढ़ियों से जब भी कोई बीमार पड़ता था, तो रोगी या बीमार व्यक्ति को उस समय इसी तरह से लादकर मुख्य सड़क तक लेकर आते थे। निःसंदेह बच्चे अपने आस-पास जो कुछ भी देखते-सुनते-महसूस करते हैं उससे ही सीखते हैं।

Authors

  • आशीष, फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह अवध पीपुल्स फोरम के साथ जुड़कर युवाओं के साथ उनके शिक्षा, हक़-अधिकारों, आकांक्षाओ, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं।

  • फुलेश्वर, बिहार के अररिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह जन जागरण शक्ति संगठन के साथ जुड़कर अपने क्षेत्र में सामाजिक मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

Leave a Reply