अरविन्द अंजुम :

जाति का निर्माण – एक ऐतिहासिक परिघटना:

जाति व्यवस्था के अध्ययन इस सरलीकरण की धारणा से बहुत आगे बढ़ चुके हैं कि जातियां अलग-अलग प्रजातीय इकाइयां हैं। जातियों के उद्भव के लिए ब्राह्मण लेखकों तथा वैदिक ग्रंथों में प्रतिपादित चार वर्णों का सिद्धांत सामाजिक विभेदीकरण की सांकेतिक व्याख्या लगता है। यह संभव नहीं दिखता है कि जातीय समाज जैसी जटिल सामाजिक व्यवस्था का आरंभ  इतने सरल विभाजन- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र और अछूतों की पांचवीं श्रेणी के साथ हुआ। संभवत स्तरीकरण दर्शाती हुई वर्ण व्यवस्था, फिर भी इस स्तरीकरण का एक आदर्शीकरण थी। इस व्यवस्था को जातियों के रूप में देखें तो जातीय समाज में अन्य बातों को महत्व दिया गया लगता है।

जातियां स्थान, वातावरण, तकनीक, साधनों की सुलभता, सामाजिक नियमों के पालन में अंतर और धार्मिक शुद्धता के सिद्धांत जैसे कारकों की आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया से विकसित हुई है। एक जातीय समाज की विशेषता ऐसे वंशानुगत समूहों का श्रेणीबढ़ क्रम है, जो विवाह और बंधुत्व के विशेष संबंधों से जुड़े होते हैं और अक्सर एक-दूसरे को सेवाएं प्रदान करते है।

रोमिला थापर -इतिहास की पुनरव्याख्या- पुस्तक से।

इतिहासकारों एवं समाजशास्त्रियों ने जाति के निर्माण के संदर्भ में कई व्याख्याएं की हैं। उन्होंने जाति निर्माण के अलग-अलग  कारणों पर अपनी धारणाओं* व पृष्ठभूमि के अनुसार विशेष ज़ोर दिया है। इसका मतलब यह नहीं है कि वही एकमात्र कारण है। जाति जैसी सामाजिक परिघटना* का अस्तित्व में आना और हज़ारों सालों से हज़ारों समूहों में बंट कर कायम रह जाना, एक पेचीदा और बेहद उलझा हुआ मसला है। इसे किसी एक फार्मूले के साथ बांधना एकांगी* परिणाम देगा।

रोमिला थापर ने अपने शोधपूर्ण आलेख में उन सभी कारकों को चिन्हित किया है, जिनके सम्मिश्रण* से जाति की पेचीदा संरचना बनी है। इसमें रक्त शुद्धता का सिद्धांत है, तो यह सामाजिक सुरक्षा को घेरेबन्दी भी प्रदान करता है; इसका अवलंब* वंशानुगत पद्धति और सजातीय विवाह है, तो पेशे का प्रशिक्षण भी इसमें शामिल है।

समाज में कोई भी व्यवस्था तभी टिकाऊ होती है जब उसको सैद्धांतिक तौर पर स्थापित कर लिया जाता है। इसलिए जाति को शास्त्रों की सम्मति* प्रदान की गई है, और यह काम उस समय के सिद्धांतकारों अर्थात ब्राह्मणों ने किया। जाति को शास्त्र सम्मत* बनाने का काम भले ही ब्राह्मणों ने किया हो, पर आम लोगों ने भी इसे स्वीकार कर लिया है। अगर सभी लोग इसे मान्य नहीं करते, तो आज तक यह व्यवस्था नहीं टिक सकती थी। कोई भी व्यवस्था चाहे वह शोषण की ही क्यों न हो, तब तक बनी रहेगी, जब तक समाज का अधिकांश हिस्सा उसका हिमायती बना रहेगा। जिस दिन वे अपना समर्थन और सहमति वापस ले लेंगे, उस दिन वह ढांचा चरमरा जाएगा, ढह जाएगा। अगर रहेगा भी, तो सिर्फ खंडहर की तरह। 

*धारणा: सोच या विचार | परिघटना: लंबे समय से होती आ रही घटना जिसे देखा जा सकता है। एकांगी: अकेला या एक सा| सम्मिश्रण: मिलने से| अवलंब: सहारा| सम्मति: सहमति

फीचर्ड फोटो आभार: ancient-origins.net

Author

  • श्रुति से जुड़े झारखण्ड के संगठन विस्थापित मुक्ति वाहिनी को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अरविन्द भाई, अभी जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के अंशकालिक कार्यकर्ता हैं। अध्ययन, अनुवाद, प्रशिक्षण जैसी वैचारिक गतिविधियों में विशेष सक्रियता के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रिए स्तर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सवालों पर विशेष रुचि और समय-समय पर लेखन का काम करते हैं।

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