कविता भील:

यह तो आप सभी जानते हैं कि जाति क्या है। इस दुनिया में सभी व्यक्तियों की अलग-अलग जातियाँ होती हैं। वैसे तो जातियाँ माननी भी नहीं चाहिए, लेकिन लोग हैं कि समझते ही नहीं हैं। जो बड़े लोग होते हैं, वह समझदार होने के बावजूद भी जाति को मानते हैं। जाति प्रथा के कारण लोगों में भेदभाव, ऊँच-नीच आदि होते हैं। इन तरह के भेदभाव और ऊँच-नीच को मिटाने के लिए कई महापुरुषों ने अनेक आंदोलन किए हैं। जैसे बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर, फुले आदि। हमारे क्षेत्र में अलग-अलग जातियाँ हैं जैसे – भील, मीणा, रावत, मेघवाल, प्रजापत, ब्राहमण, जोगी, धाकड़ और कई अन्य। जाति हमारे समाज का एक मुख्य भाग है।

अब मैं आपको मेरी जाति के बारे में बताती हूँ। मैं कविता हूँ और मेरी जाति भील है। भील जाति, अनुसूचित जनजाति (एस.टी.) में आते हैं, अतः हम आदिवासी भील हैं। राणा पुन्ज्या, वह भी हमारे जैसे भील समाज में से थे। हमारे समाज के विपरीत, जो बड़ी जाति के लोग हैं, वह सबसे ज़्यादा भेद-भाव करते हैं, जैसे- राजपूत। इन जातियों के लोग सोचते हैं कि जो भी छोटी जाति के लोग हैं, वह हमारे सामने कुछ भी नहीं हैं। वह खुद को बहुत बड़ा दिखाते हैं। जाति छोटी होने के कारण वह हमें कमज़ोर समझते हैं। लेकिन ऐसा नहीं कि हमारे मुँह में जुबान नहीं और हम बोल नहीं सकते। जाति के नाम पर समाज के लोग अंधविश्वास करते हैं। लोग अपनी मजबूरी से लाचार हैं, कि उनको अपनी रोज़ी-रोटी तक नहीं मिल पा रही है, खाने के लाले पड़ रहे हैं। उनके काम-धंधे बंद होने के कारण वो दूसरों के घर में नौकर बने रहते हैं और उनका काम करते हैं। गरीब का इस दुनिया में कोई नहीं है, जाति के नाम पर लोग हम जैसे गरीबों को बेवक़ूफ़ बनाते हैं। 

क्या यही है हम सब गरीबों के लिए न्याय? जिन इंसानों में रोटी देने की हैसियत नहीं, वो हम जैसे आदिवासियों को क्या कुछ देंगे? इसलिए सिर्फ एक नाम दे दिया, हम सब को बेवक़ूफ़ बनाने के लिए और ऊपर से ज़ोर डालते हैं कि खाट पर मत बैठो, चप्पल पहन कर मत आओ, और हमें बाई-सा कहके बुलाओ। यह बात बिलकुल गलत है। हमें इन सभी जातियों को लेकर, हर प्रकार के भेदभाव और ऊँच-नीच के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए, यह हमारा पहला फ़र्ज़ है। यह हमने हमारे क्रांतिकारी श्रीमान खेमराज जी बासा से सीखी है। इसीलिए मैं कभी जाति को नहीं मानती, न मानूंगी और न ही मानने दूंगी और हमेशा जाति आधारित भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाऊंगी।

‘जंगल के उसूल वही जानते हैं, जिनकी यारी शेरों के साथ होती है’  – राणा पुंज्या भील 

फीचर्ड फोटो राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के अचलपुरा गांव में शुरू किए गए खाट आंदोलन की तस्वीर है। क्षेत्र की उच्च जातियों द्वारा नीची जातियों और समुदायों के खिलाफ़ हिंसा की कई घटनाओं की सूचना मिलने के बाद आंदोलन शुरू किया गया था। 350 खाटों को एकत्र कर गांव के उच्च जाति के परिवारों के घरों के बाहर रखा गया था। दलित, आदिवासी और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के 2000 से अधिक व्यक्तियों ने एक साथ आकर आंदोलन में भाग लिया।

Author

  • कविता / Kavita

    कविता राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वर्तमान में कविता कक्षा 9 में पढ़ती हैं। लॉकडाउन के बाद से वह अपने गाँव में वृद्धा पेंशन, टीकाकरण और कोविड महामारी के बारे में जागरूकता और से बचाव के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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