अमित:

कान्ता मवासी, ग्राम डाणी टोला, पंचायत पटना खुर्द व राजकुमार यादव, मझगवॉं द्वारा सुनाई गई बात के आधार पर।

आदिवासी गरीब कैसे हुए? मैं छप्पन वर्ष का हूँ। कुछ सुनी हुई बात बता रहा हूँ। राजा-महाराजा के समय की बात तो नहीं देखी लेकिन कुछ अपने बूढ़ों से सुना है। हमारे इलाके में कई जात के आदिवासी रहते थे – गोंड, कोल, मवासी आदि। ये सब बहुत ईमानदार होते थे। वे यदि कोई वचन कह देते थे तो भले प्राण चले जायें वचन नहीं बदलते थे। अब पता नहीं कैसे हुआ कि जो लोग इनके आस-पास रहते थे और जिन पर आदिवासी विश्वास करते थे, अच्छा मानते रहे, उन्होने ही काला नाग बनकर उन्हें डस लिया।

आदिवासी की ज़मीन ऐसे गई कि कहीं से उन्हे भगाया गया, शोषण किया गया। भाग-भाग के एक गॉंव से दूसरे गॉंव गया, दूसरे से तीसरे गॉंव गया। वहॉं भी वही लोग उन्हे मनाने गये कि काका पुराने गॉंव में जो तुम्हारी ज़मीन है, मकान है वो सब तुम हमें दे दो। तो हमारे लोगों ने वो खेत और मकान दान कर दिये। इस तरह हमारे आदिवासी गरीब हो गए।

सतना ज़िले के मझगवॉं तहसील के चित्रकूट नगर पंचायत के पास एक और गॉंव है थरपहाड़। यह गुप्त गोदावरी के पास में है। थरपहाड़ में आदिवासी बसे रहे थे – कुछ गोंड थे और कुछ मवासी थे। चौबेपुर में राजा रहते थे और थरपहाड़ के नीचे ही ब्राह्मण ज़मीन्दार रहते थे। कुछ लोग उस समय इनके खेतों और घर पर काम करते थे। कुछ आदिवासियों की अपनी ज़मीनें भी थी, जिन पर वे स्वयं खेती करते थे और ज़मीन्दार को उसका लगान दिया करते थे।

एक पण्डित वहॉं आता-जाता रहा, उनकी देख-रेख करता रहा। पहले राजा का राज था, राजाओं के राज में भाग प्रथा चलती थी। ज़मींदार ज़मीन का मालिक होता था। गॉंव के लोग उस ज़मीन पर खेती करते थे और उपज का कुछ हिस्सा ज़मीन्दार को देते थे। सन् साठ-उनसठ के करीब जब सरकार नें ज़मीनों का बंदोबस्त किया तो सबको ज़मीन का पट्टा मिलना था। बंदोबस्त के समय गॉंव के आदिवासी पण्डित के पास गये और कहा कि हम तो तुम्हारे ही खेतों पर काम करते हैं, काम से फु़र्सत नहीं है और अभी हमारे पास पैसे भी नहीं हैं देने के लिए, तो तुम हमारी ज़मीनों का भी बंदोबस्त का काम करवा दो।  हम लोग पैसे बाद में दे देंगे। शायद इस काम के लिये दूर जाना पड़ता होगा, जिस कारण से भी लोगों ने यह काम पण्डित को सौंप दिया। उन्हे पंडित पर विश्वास था। 

उस पण्डित ने ज़मीन, गॉंव वालों के नाम न करवा कर, पूरी ज़मीन अपने ही नाम पर करवा ली। साढ़े तीन सौ एकड़ ज़मीन जिस पर ये लोग खेती करते थे, उसने अपने नाम करवा ली! जितने दिन वो पण्डित जीवित रहा तब तक वो नहीं बोला कि ज़मीन अपने नाम करवा ली है। उसके जीवित रहते हुए आदिवासी ही खेती कर रहे थे उस ज़मीन पर, लेकिन यह किसी आदिवासी को जानकारी नहीं दी गई कि ज़मीन पंडित ने अपने नाम करवा ली है। 

एक बार जिन लोगों की स्वयं की ज़मीन थी, लेकिन कागज़ात नहीं थे उनसे भी उसने तीन-तीन सौ रुपये इकठ्ठे किए और सबको तहसील दफ्तर ले गया ज़मीनों के कागज़ बनवाने के लिये। सब लोगों का किसी कागज़ों पर अंगूठा करवा लिया और बाहर बिठा दिया। स्वयं अंदर जाकर ज़मीन अपने नाम करवा ली।

जब पण्डित मर गया तो उसकी औलादों ने कहा कि यह ज़मीन तो हमारे पुरखों की है और आदिवासियों को ज़मीन से भगा दिया। सभी लोगों को बदमाशों से बहुत पिटवाया गया। उस ज़माने में बड़े लोगों के सामने बोलने की भी किसी की हिम्मत नहीं होती थी। लोग इधर-उधर अपने नाते-रिश्तेदारों के पास जाकर रहने लगे। इनमें से कई लोग आज चित्रकूट ब्लॉक के गॉंवों में ही रह रहे हैं और कुछ मझगवॉं ब्लॉक के गॉंवों में रह रहे हैं। थरपहाड़ में सारी ज़मीनें इनसे छिन गई। जिन नए गॉंव में ये लोग गये वहॉं से भी स्थानीय लोगों नें इन्हे कई बार भगाया। कई जगहों पर तो इनकी झोंपड़ियॉं भी जला दी गई। बहुत मुश्किलों से फिर से उजाड़ ज़मीनों को खेती लायक बनाया और आज वे वहॉं जी रहे हैं। पुराने लोग विश्वास पर जीते थे लेकिन इसी विश्वास करने के कारण वे धोखा खा गए और उनकी ज़मीनें दूसरे लोगों ने अपने नाम करवा ली। ज़ोर-ज़बरदस्ती भी बहुत होती थी, ज़मीन्दार से कौन कुछ बोल सकता था। 

ऐसी कहानियॉं और भी गॉंवों में सुनते हैं तो लगता है कि यह एक आदिवासी या एक गॉंव की कहानी नहीं है। यह तो पूरे इलाके की कहानी है।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल – आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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3 responses to “हम गरीब कैसे बने? – 1 : चित्रकूट ज़िले के मवासी आदिवासियों की ज़मीन कैसे छिन गई?”

  1. सुरेश डुडवे Avatar
    सुरेश डुडवे

    बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सच्ची कहानी लगी, क्योंकि यह वास्तविता है कि आदिवासी समाज के भोलपन और लोगों पर विश्वास कर लेने के गुण के कारण उनके साथ विश्वास घात होता आया है। इसलिए समय के साथ आदिवासी समाज को जागरूक होना ही होगा।

  2. Lal Prakash Rahi Avatar
    Lal Prakash Rahi

    यह कहानी नहीं हकीकत है मेरे पूर्वजों के साथ भी कुछ इसी तरह से हुआ था हमारे ग्रैंड फादर के पिता जी के जमाने में हमारे ग्रैंड फादर वह कहानी अक्सर सुनते थे जो आज भी याद है उन्हीं के मद्दत से मैने अपनी सात पीढी पिछे की वंशावली लिख डाली है।

    1. Yuvaniya Avatar

      उनसे पूछ कर लिखिए । ये सच्ची कहानियाँ सबको जानना ज़रूरी है।

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