प्रेरणा:

ऊंच-नीच, छुआछूत और जाति आधारित भेदभाव आज भी समाज में देखने को मिल जाता है। समाज का सारा ठेका इन तथाकथित ऊंची जाति वाले लोगों ने ही ले रखा है। आज भी ये लोग इन्हीं के द्वारा कहे जाने वाले निचली जाति के कमज़ोर और मजबूर लोगों पर अत्याचार करते हुए दिख जाते हैं। कई लोग हैं जो इस तरह की संकीर्ण जातिवादी सोच रखने वाले लोगों के खिलाफ काम कर रहे हैं।  इन्हीं लोगों में से एक हैं नारायणी भील। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले के पालाखेड़ी गाँव में पिछले 25 सालों से, नारायणी भील समुदाय के लोगों के साथ काम कर रही हैं। भले ही वह पढ़ी-लिखी ना हों लेकिन थाने-कचहरी के सभी काम अकेले ही कर लेती हैं। अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं से जुड़े किसी मामले में जब उन्हें थाने जाना पड़ता है तो वह थानेदार से ही एफ़आईआर पढ़कर सुनाने को कहती हैं। भूमि विवाद, जातिगत शोषण, महिलाओं के शोषण जैसे कई गंभीर मामलों में उन्होने सफलता पाई है।  कुछ ऐसी निडर और बेबाक हैं नारायणी।

नारायणी बताती हैं कि आज भी उनके इलाके के कथित ऊंची जाति के लोग भील समुदाय के लोगों को ज़्यादा पढ़ने नहीं देते, न उन्हें धूमधाम से शादी करने देते हैं और कई जगहों पर तो उनके घरों के सामने से उन्हें चप्पलें हाथ में लेकर जाना पड़ता है। जाति की समस्या को समझाने के लिए उन्होने 2-3 महीने पुराना एक किस्सा सुनाया। नारायणी बताती हैं कि छापरी गाँव की एक भील महिला नर्बदा बाई के पति का 8 साल पहले देहांत हो गया था। पति के शांत (मृत्यु) हो जाने के बाद नर्बदा बाई ने अपने दो बेटों के साथ मिलकर पास के हाईवे के किनारे पर एक चाय की दुकान शुरू की। चाय की दुकान ठीक-ठाक चल पड़ी जिससे उनके परिवार का गुज़ारा हो जाता था। उनके तीन बेटों में से सबसे बड़ा बेटा जिसकी उम्र 19 साल है, दुकान चलाने में उनकी मदद करता था।

हिम्मत गूजर ने नर्बदा बाई की दुकान में आग लगा दी और उनके साथ बहुत मार-पीट की

नर्बदा और उनके परिवार का जीवन पटरी पर आ ही रहा था कि पास के नेगड़िया गाँव के सरपंच हिम्मत गूजर ने उन्हें वहाँ से अपनी दुकान हटा लेने की धमकियाँ देना शुरू कर दिया। जब नर्बदा बाई ने उसकी धमकियों को अनसुना कर दिया तो हिम्मत गूजर ने उनकी दुकान में आग लगा दी, उनके साथ मार-पीट की और मोटरसाइकिल से उनका पीछा करते हुए उन्हें काफी दूर तक दौड़ाया। इसके बाद नर्बदा बाई ने नारायणी भील से संपर्क किया। नारायणी ने नर्बदा की जान बचाने के लिए उन्हें पास के एक अन्य गाँव में छुपा दिया और अगले दिन नर्बदा को इलाके के एस.पी. के सामने पेश किया, इसके बावजूद आरोपी पर पुलिस और प्रशासन ने कोई कर्रवाही नहीं की। लेकिन नारायणी ने हिम्मत नहीं हारी और गाँव के लोगों को एक जगह पर इकट्ठा कर 100 नंबर पर कॉल लगाया। लोगों के बढ़ते विरोध को देखकर स्थानीय प्रशासन हरकत में आया और आरोपी पर मुकदमा दर्ज किया गया।

इस पूरे मामले के चलते लगभग 3 महीने तक नर्बदा बाई की चाय की दुकान बंद रही, लेकिन अब उन्होने वापस से इसे शुरू कर दिया है और बिना किसी रोक-टोक के वह इसे चला रही हैं। सामाजिक परिवर्तन शाला के शिविरों में हमने ‘किसकी चलती है’ नाम की एक एक्सरसाइज़ की थी, इससे हमें समझ आया था कि जो लोग शक्तिशाली हैं, समाज में उनकी ही चलती है। लेकिन नारायणी भील इस बात का जीता जागता सबूत हैं कि ‘जिसकी चलती है’ उसके खिलाफ़ भी आवाज़ उठाने से डरना नहीं चाहिए, अगर हम अपने हक़ के लिए लड़ेंगे तो जीतेंगे भी ज़रूर।

Author

  • प्रेरणा, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह भदेसर गाँव में शुरू हुआ स्थानीय स्कूल- आधारशिला विद्यालय में शिक्षिका हैं। प्रेरणा खेतिहर खान मज़दूर संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम भी कर रही हैं।

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One response to “25 सालों से राजस्थान में जातिगत शोषण के खिलाफ संघर्षरत – नारायणी भील”

  1. Lal Prakash Rahi Avatar
    Lal Prakash Rahi

    नारायणी जी से मै मिल चुका हूँ कुशल सामाजिक नेत्री है नारायणी जी जैसे सामाजिक नेत्रियों की सामाज को जरूरत है। प्रेरणा न नारायणी जी के बारे में यह लेख लिखकर नारी सामाज को प्रेरित करने का कार्य किया है। प्रेरणा जी को धन्यवाद

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