हमें मज़बूत प्रजातंत्र तो चाहिए लेकिन मज़बूत बच्चे क्यों नहीं?

डा. गणेश माँझी:

आज की परीक्षा का रद्द होना, कल के लिए बड़ी समस्या है। मानते हैं कि कोरोना बहुत बड़ी महामारी है, लेकिन ये हम सभी के लिए ही है, इससे हम सभी को चालाकी और सावधानी से लड़ना है। आज की अर्धशिक्षा कल रोज़गार और उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। मेरी समझ से एक सम्पूर्ण ज्ञान निर्माण करने में परीक्षा की बड़ी भूमिका होती है, जो कुछ समझ से और कुछ याद करके आप लिखते हैं। साल 2009-10 से ही हमारे देश में बच्चों को नहीं फेल करने वाली नीति आई है जो शिक्षा की गुणवत्ता को पहले ही ध्वस्त कर चुकी है। मतलब पहली क्लास से लेकर आठवीं तक के बच्चे को फेल नहीं करना है। अब बच्चे को भी पता है कि वो फेल नहीं करेगा, इसलिए पढ़ता नहीं है। इस प्रकार 8 साल पहले बच्चे की बौद्धिक स्थिति जैसी होती है, 8 वीं क्लास से उत्तीर्ण होने पर भी वही रहती है और बहुत सारे शोधों से ये पता भी चल चुका है की 5वीं क्लास के बच्चे जोड़ना, घटाना, गुना, भाग इत्यादि नहीं कर पा रहे हैं। 

परीक्षा रद्द करने के बजाय सरकार को कुछ बेहतर प्रयास करने चाहिए। मेरी समझ से परीक्षा को रद्द करने की बजाय टाला जाना चाहिए, जैसे बंगाल का चुनाव में हुजूम जमा करने से बेहतर था कि उसे टाल देते, तो कोरोना की विभीषिका से हम कुछ हद तक बच जाते। टालने के बाद कुछ तरीके रणनीतिक रूप से अपनाये जाने चाहिए।

पहली रणनीति, वहाँ परीक्षा की घोषणा करना जहाँ-जहाँ कोरोना के केसेस कण्ट्रोल में आ गए हैं। अगर परीक्षा नहीं तो पर्याप्त समय देते हुए होमवर्क देकर मूल्याङ्कन कर लेते। अगर सम्पूर्ण रूप से ही एग्ज़ामिनेशन की घोषणा करते हैं तो एक बार में 50 प्रतिशत बच्चों की ही परीक्षा लेते। दूसरी रणनीति, जो बच्चे पहले बार में कोरोना की वजह से परीक्षा नहीं दे पाए उनको मौका दिया जाता, साथ ही जैसे-जैसे दूसरे राज्यों में कोरोना कण्ट्रोल में आता वैसे-वैसे वहां भी परीक्षा या होमवर्क दे देते। गौर करने वाली बात ये है कि पहली परीक्षा की घोषणा के समय ‘दुबारा’ मौका दिया जाएगा जैसी कोई घोषणा नहीं होती, और अगर घोषणा होती भी तो ये की परीक्षा सिर्फ ‘हरा जोन’ में होगा, फिर बाकी जब ‘लाल जोन’, ‘हरा जोन’ में तब्दील हो जायेगा तो वहां परीक्षा करवा लेते, या ‘होमवर्क’ द्वारा मूल्याङ्कन कर लेते।

हमारा देश को प्रजातंत्र की चिंता है इसलिए चुनाव करवा तो लिए जाते हैं, लेकिन उसी प्रजातंत्र को मजबूत करने वाले शिक्षित नौजवान क्यों नहीं चाहिए, जो भविष्य की हर प्रकार की मुसीबत के लिए तैयार हों? शिक्षा ऐसी हो कि कोरोना जैसी मुसीबत क्या, हमारे नौजवान हर प्रकार की मुसीबत के लिए तैयार हों। 9वीं, 10वीं, 12वीं, वो दौर होता है जब एक नौजवान दबाव में जीने की शुरुआत करता है और मजबूती से भविष्य की ओर कदम बढ़ाता है। 

परीक्षा जरूर टालें, कोई दिक्कत नहीं, लेकिन परीक्षा से वंचित न करें। लॉकडाउन में पढ़ाई जैसे-तैसे हो ही गयी है। असाइनमेंट और होमवर्क भी ट्यूशन मास्टर के भरोसे या खुद की पढ़ाई से हो ही गई है। परीक्षा के लिए आसान और प्रायोगिक सवाल दिया जाएँ, और तरीके ढूंढें जाएँ कि परीक्षा खुद छात्र दे रहा हो न कि ओपन बुक एग्जामिनेशन हेल्प प्राइवेट लिमिटेड से। दुर्भाग्यवश, होमवर्क और असाइनमेंट के लिए एक सामानांतर बाज़ार तैयार है। ये बाज़ार हर वक्त हर समय आपदा में अवसर की तरह आपके मुसीबत का उत्तर लिए खड़ा है। बस पैसा दीजिये उत्तर मिल गया और पप्पू-फेंकू-चप्पू सब पास। 

कॉलेज स्तर पर भी हम शिक्षक सोच रहे हैं ऑनलाइन पढ़ाई बढ़िया चल रही है, परीक्षा और असाइनमेंट के लिए पर्याप्त समय दे रहे हैं ताकि विद्यार्थी सारे सवाल कर पाए, इधर-उधर किताब के सहारे ही सही। परीक्षा को लेकर, ग्रामीण इलाकों में समस्या ज़रूर है, लेकिन वहां पर स्कूल के शिक्षकों से संपर्क करके असाइनमेंट का विकल्प दिया जा सकता है।   

समस्या आती-जाती रहेंगी, महामारी भी आती-जाती रहेंगी, बस मनुष्य, मनुष्यता, मन और शरीर मजबूत होना चाहिए, ताकि हर मुसीबत से सहर्ष लड़ा जा सके। ऐसे शिक्षित नौजवान खोजी और अन्वेषक होंगे और भविष्य में आने वाली तमाम मुसीबतों के लिए हर वक्त तैयार रहेंगे और हम सब  मजबूत राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनेंगे, अन्यथा भाई-भतीजावाद, विचारधारा-वाद आदि देश को दीमक की तरह चट करने को तैयार है।

फीचर्ड फोटो आभार: एआईएफ़

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  • डॉ गणेश मांझी, झारखण्ड के सिमडेगा जिले के युवा स्कॉलर हैं। वे अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) के रूप में कार्यरत हैं। उन्हे आप इस ईमेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं : gmanjhidse@gmail.com

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