छत्तीसगढ़ के पिथोरा से बंधुआ मजदूरी पर रिपोर्ट

सिद्धार्थ:

5 नवंबर-2020, गाँव- चिरौदा, तहसील- पिथौरा, जिला- महासमुंद

5 नवंबर 2020 को छत्तीसगढ़ के साथी राजिम दीदी और देवेन्द्र भाई के साथ हम पिथोरा के चिरौदा गाँव पहुंचे। चिरौदा में हम संगठन की पुरानी साथी सुशीला और उनके परिवार से मिलने जा रहे थे, जिन्हें कुछ समय पहले ही पूना (महाराष्ट्र) से 40 कि.मी. दूर पढ़वी में स्थित एक गुड़ फैक्ट्री से बंधुआ मज़दूरी से बचाकर लाया गया था। आज के दिन हम उनकी पूरी कहानी सुनने वाले थे। 

गुड़ फैक्ट्री से बचाए गए मज़दूर

जब हम सुशीला के घर पहुंचे तो पूना की उक्त गुड़ फैक्ट्री से बचाए गए 11 लोग मौजूद थे, साथ ही 4 आदिवासी युवक भी थे जो इन 11 लोगों से कुछ वक्त पहले ही वहाँ से लौटकर आए थे। इन 11 लोगों में से एक लीलावती विश्वकर्मा गांव कैलाशगढ़ की रहने वाली है और सुशीलादेवी की बेटी भी हैं, उन्होने बताया कि लॉकडाउन के बाद उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। कोई रोज़गार नहीं था, दिहाड़ी कर गुज़ारा करने वाले उनके परिवार के समक्ष अनाज और खाने का गंभीर संकट आ गया था। राशन कार्ड ना होने के कारण उन्हे सरकारी मदद भी नहीं मिल पा रही थी। ना कहीं मज़दूरी का काम मिल पा रहा था और ना ही खेतों में ही काम मिल रहा था, ऐसे में जैसे-तैसे उनके परिवार ने लॉकडाउन का समय निकाला। 

इसके बाद जब उनके गाँव के कुछ लोग जो पढ़वी की गुड़ फैक्ट्री में काम कर रहे थे, उन्होने वहाँ काम मिलने की बात कही। साथ ही यह भी बताया कि वहाँ करीब 2 से 3 महीने का काम है, पैसा अच्छा मिलेगा साथ ही फैक्ट्री मालिक उनके आने-जाने की व्यवस्था भी करेंगे। खाने के घोर संकट और मुफ़लिसी से मुक्ति पाने के लिए उन्होने वहाँ जाने के लिए हामी भर दी। 1 सितंबर को वह, उनके पति, सुशीला देवी और उनके पति समेत कुल 12 लोग पढ़वी के लिए निकल गए। 2 सितंबर को वह पढ़वी पहुंचे और 3 सितंबर से उन्होने वहाँ काम करना शुरू कर दिया। 

फैक्ट्री मालिकों ने उन्हें महीने में रोज़ 12 घंटे काम करने के ऐवज में 12000 रुपये देने की बात कही थी, जिसमें से 1000 रुपये उनके रहने और खाने के लिए काट लिए जाने थे। यह सभी लोग इसके लिए तैयार थे लेकिन फैक्ट्री मालिक और सुपरवाईज़र की मंशा ऐसी कतई नहीं थी। सुशीलादेवी, लीलावती और अन्य लोगों ने बताया कि वहाँ पर उनके रहने की व्यवस्था बहुत खराब थी और पीने के पानी तक की व्यवस्था भी नहीं थी। पास के एक गड्ढे में जमा बारिश के पानी को ही वह पीने के लिए इस्तेमाल करते थे। 

उन्होने आगे बताया कि 12 घंटे का कहकर उनसे रोज़ 15 घंटे काम कराया जाता था, अतिरिक्त समय के लिए उन्हें कोई ओवर टाइम नहीं दिया जाता था। बीच में खाना खाने के लिए भी उन्हें केवल 15 से 20 मिनट का ही समय दिया जाता था, जबकि स्थानीय मज़दूरों को खाना खाने के लिए पूरा समय मिलता था और उनसे काम भी 12 घंटे ही लिया जाता था। छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों से आए मज़दूरों के साथ दुर्व्यवहार और मार-पीट लगभग रोज़ की बात हो गई थी। जब भी वह फैक्ट्री सुपरवाईज़र से ज़्यादा काम लिए जाने की शिकायत करते या अन्य किसी परेशानी के बारे में बताते तो उनको मारा-पीटा जाता था। गुड़ फैक्ट्री के काम के लिए लाए गए इन मज़दूरों से हर तरह के काम करवाए जाते थे कई बार तो इन्हे अन्य जगहों पर भी काम करने के लिए भेज दिया जाता था, जिसका उन्हें कोई पैसा नहीं दिया जाता था। 

लीलावती ने बताया कि फैक्ट्री के लोग यह मार-पीट अक्सर उनके बच्चों के सामने या अन्य मज़दूरों के सामने करते थे, जिससे सभी में गहरा डर बैठ गया था। जब इन लोगों ने फैक्ट्री मालिक से वापस जाने की बात कही तो उन्हें फिर से धमकाया गया और प्रति व्यक्ति 7 से 8 हज़ार रुपये की मांग की गई। फैक्ट्री मालिक के अनुसार फैक्ट्री का काम पूरा नहीं हुआ था और मज़दूरों के वापस चले जाने से उसे नुकसान होगा जिसकी भरपाई वह मज़दूरों से करना चाहता था। ज़्यादा शिकायत करने पर इन सभी के मोबाइल या तो तोड़ दिये गए या छीन लिए गए। इन्हें रोज़ तय समय से ज़्यादा काम करने के लिए धमकाया जाता और किसी से शिकायत करने पर जान से मारने या ‘गायब’ कर देने की धमकी भी दी जाती थी। 

जिन 4 आदिवासी युवकों का ज़िक्र शुरुआत में हुआ था, इन चारों ने 9 अगस्त से गुड़ फैक्ट्री में काम करना शुरू किया था। यह चारों जब इन अमानवीय परिस्थितियों में बंधुआ मज़दूरों की तरह काम कर परेशान हो गए तो उन्होने अपने घर वालों से 7 से 8 हज़ार प्रति व्यक्ति मँगवाए और फैक्ट्री मालिक को देकर अपने ही खर्चे पर वापिस छत्तीसगढ़ आ गए। करीब डेढ़ महीना काम करने के बाद इन्हें कोई मज़दूरी नहीं मिली, मिला तो बस दुर्व्यवहार, अपमान और मार-पीट। उन्होने बताया कि इनके साथ एक और आदिवासी युवक था जिसके परिवार के पास फैक्ट्री मालिकों को देने के लिए पैसे नहीं थे। एक रात को वह वहाँ से चुपचाप बिना किसी पैसे के निकल गया, आज तक उस युवक का कुछ पता नहीं चल पाया है। 

यह पूछे जाने पर कि लीलावती, सुशीला और उनके बाकी साथी वहाँ से बचकर कैसे आ पाए, सुशीला बताती हैं कि संगठन से जुड़े होने के कारण उनके पास राजिम दीदी का नंबर था। सभी लोग किसी तरह से एक मोबाइल छुपाकर रख पाए थे, उस मोबाइल से ही उन्होने राजिम दीदी से संपर्क किया और अपनी स्थिति के बारे में बताया। लेकिन इसका पता फैक्ट्री मालिक को लग गया और उसने उनका वह मोबाइल भी तोड़ दिया साथ ही सुशीला देवी के साथ गाली गलौज़ और मार-पीट भी की गई। सुशीला बताती हैं कि अब उनकी सारी उम्मीदें टूट चुकी थी, क्यूंकी अब तो राजिम दीदी से भी संपर्क नहीं किया जा सकता था। उन्हें और सभी लोगों को लग रहा था कि शायद पढ़वी से ज़िंदा बचकर वो नहीं जा पाएंगे।

पढ़वा की गुड़ फैक्ट्री का एक उत्पाद 

लेकिन अगले ही दिन स्थानीय एसडीएम, पुलिस के कुछ लोग और अन्य अधिकारी, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ उक्त फैक्ट्री में पहुंचे और इन लोगों को वहाँ से छुड़वाया। सुशीला बताती हैं कि राजिम दीदी ने उनसे बात होने के बाद तुरंत अपने महाराष्ट्र के कुछ दोस्तों से बात की जिन्होंने तत्काल स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों से बात की और हमें वहाँ से बचाया। साथ ही गुड़ फैक्ट्री से छुड़ाए गए सभी लोगों को उनकी मज़दूरी भी दिलाई गई और उनके घर तक पहुँचने की व्यवस्था भी की गई। 

सुशीला देवी जब यह पूरी घटना बता रही थी तो उनकी आवाज़ में एक कंपन आसानी से सुना जा सकता था। समय-समय पर उनका गला भर आता और आँखों के किनारों पर पानी भी दिखता। आधुनिक भारत में बंधुआ मज़दूरी की यह कहानी काफी कुछ कह जाती है। जब मैंने सुशीला देवी और बाकी लोगों से पूछा कि उन्हें क्या सरकारी अधिकारियों या पुलिस ने फैक्ट्री मालिक पर कोई कानूनी कार्यवाही करने की बात कही, तो उनका जवाब ना था। ऐसी अमानवीय हरकत करने वाले लोगों की करतूत सामने आने पर भी उन पर किसी कानूनी एक्शन का ना होना भी तो बंधुआ मज़दूरी जैसी सच्चाई ही है। प्रशासन का रवैया भी बस नाम खराब होने से बचने वाला और खानापूर्ति का ही नज़र आता है। इन लोगों में से किसी को भी बंधुआ मज़दूरी के खिलाफ बचाव या रेसक्यू सर्टिफिकेट तक नहीं दिया गया, आरोपी के खिलाफ कानूनी एक्शन तो दूर की बात है।       

Author

  • सिद्धार्थ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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