आखिर हम लोग ऐसे क्यों हैं?

कोरोना महामारी के समय भी कालाबाज़ारी!

अमित:

आजकल एक बात बहुत चल रही है सोशल मीडिया में कि हमारे देश के लोग ऐसे क्यों हैं कि इतनी बड़ी विपदा के समय मुनाफ़ा कमाने की सोच रहे हैं – ऑक्सीजन ब्लैक में बेच रहे हैं, निजी अस्पताल खूब फ़ीस ले रहे हैं, दवाइयों की काला बाज़ारी हो रही है आदि। ऐसे स्वार्थी कैसे हो गये हम, इतनी महान और प्राचीन संस्कृति के बावजूद? 

यदि आप लोग अपने नाना-नानी या दादा-दादी से पूछोगे तो बहुत संभावना है कि आपको ऐसी कोई कहानी मिल जाये जिसमे आपके परिवार के बुज़ुर्गों नें किसी कठिन समय में कर्ज लिया हो और इसे चुकाने के लिये कर्ज़ देने वाले ने भैंस, गाय या अन्य कोई जानवर ले लिया हो या ज़मीन देनी पड़ गई हो और या फिर गिरवी रखी चाॅंदी उसने ले ली हो या फिर कर्ज़ चुकाने के लिये सेठ के यहाॅं या आज के ज़ामाने में खदान, ईंट-भट्टे या खेत पर बंधुआ मज़दूर बन गये हों। हमारे देश के बहुत से लोग इस तरह से गरीब बने हैं। आज भी यह काम बेहिचक गरीब वर्ग के बीच चल रहा है। जहाॅं अधिकांश लोग मजबूरियों में फंस कर अपनी संपत्ती से हाथ धो बैठे और गरीब हो गये हैं वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में छोटे-छोटे कस्बे हैं, वहाॅं के कुछ लोग इसी तरीके से अमीर हो गये हैं। अमीर ही नहीं बहुत अमीर हो गये हैं। एक बार चाॅंदी के गहनों से भरा ट्रक सेंधवा – इन्दौर के रास्ते में पलट गया था, ये चाॅंदी उस इलाके के आदिवासियों द्वारा गिरवी रखी हुई थी।

किसान आज छः महीनों से सड़कों पर हैं तो किसलिये? कि जब उन्हे फ़सल बेचने की मजबूरी होती है तो फ़सल के दाम कम हो जाते हैं। मजबूर इसलिये, क्योंकि फ़सल बेच कर कर्ज़ चुकाना होता है। जब उसे बीज लेना होता है तो मजबूरी में बढ़े हुए दाम पर लेना होता है। यह तो एक व्यापारी का खेल नहीं है यह तो मुक्त बाज़ार का सप्लाई-डिमांड का सिद्धांत है। लेकिन सिद्धांत कहने से यह सही थोड़े ही हो जाता है। तो मुक्त बाज़ार की व्यवस्था टिकी ही है किसी की ज़रूरतों से कमाने और असीम निजी मुनाफ़ा एकत्रित करने के सिद्धांत पर। तो जो आर्थिक व्यवस्था हमने चुनी है वह भी इस भावना को खुले आम बढ़ावा देती हैं और बाकायदा मैनेजमेन्ट के नाम पर इस बात की पढ़ाई करवाई जाती है कि कैसे आप कम्पनियों को अधिक मुनाफ़ा कमाने में मदद करोगे तो आपको भी मोटी पगार मिलेगी। तो जीवनरक्षक दवाइयों के दाम लागत से चार सौ गुना अधिक होना भी इसी सि़द्धांत के तहत सही करार दे दिया जाता है। ये भी मुनाफ़ा कमाने का ही एक और साधन है।

यदि आप बाज़ार की जगह सरकार में हैं तो किसी की मजबूरी का फ़ायदा उठाने का नाम रिश्वत हो जाता है। रिश्वत जिसने न दी हो वो अजूबा है। सभी को मालूम है कि छोटे से छोटे काम को करवाने के लिये रिश्वत दी जाती हैं। बड़ी कम्पनियाॅं तो इसे सर्विस फ़ीस के नाम से हिसाब-किताब के ब्योरे में चढ़ा देती हैं। पिछले चुनावों में देखा गया है कि रिश्वतखोरी कोई बड़ा मुद्दा नहीं है लोगों के लिये।

कालाबाज़ारी के बारे में भी हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। मेरे पिताजी नें भारत-चीन के युद्ध में चीनी खानी छोड़ दी थी, क्योंकि इसकी कमी होने से यह बहुत महॅंगी हो गई थी। हालाॅंकि यह आम बात है लेकिन प्याज़ की कालाबाज़ारी नें तो राजनीतिक पार्टियों को चुनाव भी हरा दिया था।

अब इस नज़र से, ‘आपदा में अवसर’ के स्लोगन को देखें तो यह क्या कहता सुनाई देता है? आपदा में अवसर ढूॅंढना है, मतलब क्या करना है? चाहे जिस भी भली मन्शा से यह नारा दिया गया हो, अब तो जिसको जो अवसर दिख रहा है वह उससे फ़ायदा ले रहा है – किसी को दवाइयों, वैक्सीनों से कमाने का अवसर दिख रहा है तो किसी को मज़दूरी, खेती संबन्धित कानून बदलने का अवसर दिख गया या फिर पुराने सरकारी भवनों को तोड़ कर हज़ारों करोड़ की लागत का सेन्ट्रल विस्टा बनाने का अवसर मिल गया। लोग तो लाॅकडाउन में घरों में बंद है। बिना विरोध के डर से कुछ भी करने का अवसर मिल गया।

तो दोस्तों यह मजबूरी का फ़ायदा उठाने की बात कोई नई नहीं है। पश्चिमी देशों में शायद टुच्चापंती वाले फ़ायदे उठाने के उदाहरण न दीखते हों जैसे अपने यहाॅं नंगेपन से दिखते हैं, लेकिन पूॅंजीवाद के सरगना सब उधर ही दरिया पार बैठे हैं। वे ही इस खेल के चैम्पियन हैं और उन्होने ही यह सारी दुनिया को सिखाया है। वे छोटे-मोटे काम नहीं करते। वे देशों में भुखमरी, अंतर्राष्ट्रीय कर्ज़ का फ़ायदा उठाकर वहाॅं की आर्थिक नीतियों में, कानूनों में बदलाव करवा लेते हैं। इतना ही नहीं कभी-कभी तो वहाॅं के शासकों को ही बदलवा देते हैं। अभी बीच में एक ख़बर निकली थी कि फ़ाइज़र कम्पनी नें तो वैक्सीन देने के बदले हथियार बेचने के सौदे और देश में सैनिक अड्डे बनाने की माॅंग भी कर डाली थी।

यह सब एक दो साल में नहीं हुआ। मदद और सहयोग पर आधारित समाजों की व्यवस्थाओं को जानबूझ कर तोड़ा गया है, लालच और प्रतिस्पर्धा का यह खेल स्थापित करने के लिये। इसके लिये देशों को गुलाम बनाना, यु़द्व करना, सब चलता है। चलते-चलते एक और छोटी सी बात याद आ गई – कहीं पढ़ा था कि कोविड आपदा से जूझती मानव सभ्यता के बीच इस एक साल में भारत की ही कुछ कम्पनियों की सम्पत्ति मेें अरबों रुपये बढ़ गये हैं।

हमें तो अब यह सोचना चाहिये कि अपने विचारों और संगठनों को मज़बूत करने के लिये इस अवसर का फ़ायदा कैसे उठाएँ..!

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

2 comments

  1. बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को आपने अच्छे से समझाया। वाकई में हम सभी को वर्तमान स्थिती को देखकर चिंतन करने की आवश्यकता है।

  2. आपणे जिन बातोंका जिक्र किया है,वे बहोत ही महत्वपूर्ण हैऔर हमारे देशमे कोरोना महामारी के दौरान एक दुसरे को मदत करणेवाले ,उनके दुखदर्द मे सहभागी होणेवाले लोग भी देखे है. इस महामारी को अवसर समझकर फायदा उठानेवाले व्यक्ती, पक्ष,सरकार और कई लोग है.जिनके बारेमे लोग भी जानते है मगर उसके खिलाफ बोलणे लिखणेकी हिम्मत नहीं रखते इतनाही.
    दशरथ जाधव
    श्रमजिवी संघटना मराठवाडा विभाग

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