लाखों बुनकरों के रोज़गार पर संकट

आमिर जलाल:

लॉकडाउन के कारण बुनकरों के आय के रास्ते बंद हो गए हैं। देश के बुनकर पहले विद्युत करघों (पावर लूम) के कारण बेरोज़गार हुए तो अब उन्हें लॉकडाउन बेरोज़गार कर रहा है।

भारत में कोरोना वायरस पर काबू पाने की कोशिशों के तहत जारी तालाबंदी, बुनकरों के लिए बड़ी मुसीबत लेकर आई है। लॉकडाउन की वजह से बुनकर तबका भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है और इसके चलते लाखों बुनकर मज़दूर बेरोज़गार हो गए हैं। भारत सरकार द्वारा करीब एक दशक पहले किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, देश में पावरलूम बुनकरों की संख्या 70 लाख थी, हालांकि वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक बताई जाती है। इस पेशे में दो तरह के लोग शामिल हैं, एक वो जिन्होंने अपने घरों में दो-चार-छः पावरलूम मशीनें लगाई हैं और दूसरे वो जो इन पावरलूम में बतौर मज़दूर काम करते हैं। उनके अलावा एक बहुत बड़ी आबादी महिलाओं की है जो कपड़े की तैयारी के अन्य चरणों में हाथ बंटाती है। लॉकडाउन हो जाने से यह सभी लोग बेरोज़गार हो गए हैं और उनके सामने रोजी-रोटी की समस्या पैदा हो गई है।

उत्तर प्रदेश की टाण्डा बुनकर नगरी के कमर अहमद ने बातचीत करते हुए कहा, “लॉकडाउन के कारण आमदनी बंद है, माल नहीं आ पा रहा है। जो बड़े कारोबारी हैं, जिनके पास बहुत सारे पावर लूम हैं, वे किसी तरह से अपना काम चला ले रहे हैं। लेकिन छोटे कारोबारी, जो दो-चार-छः पावरलूम चलाते हैं, उनके सामने बहुत समस्याएं हैं।” कमर अहमद उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर जिले के टाण्डा ब्लॉक में रहते हैं। यहाँ लगभग 80 फीसदी लोग, बुनकर पेशे से जुड़े हुए हैं और यहाँ लगभग 35 हजार पावरलूम हैं।

कमर अहमद बताते हैं कि टाण्डा में सिर्फ 20-30 बड़े कारोबारी हैं, बाकी लोगों के पास सिर्फ दो-चार-छः मशीनें हैं। कमर अहमद के मुताबिक, “ऐसे में सबसे ज्यादा खराब हालत उन छोटे कारोबारियों की है। गरीब बुनकरों के सामने पहले से ही रोजी-रोटी के लाले पड़े थे, लेकिन लॉकडाउन ने तो उनकी कमर ही तोड़ दी है।” बलालु जी के घर पर पावरलूम की 5 मशीनें लगी हैं और घर की औरतें इन मशीनों पर काम करती हैं। इसके साथ ही तैयार कपड़े की तहि, गट्ठी बनाने का काम भी करती हैं। बलालु के बेटे रोशन कहते हैं कि यह एक ऐसा कारोबार है जो सालों साल चलता है। कमर कहते हैं, “लॉकडाउन की वजह से सब कुछ बंद हो गया है। ना तो कपड़ा तैयार करने के लिए कच्चा माल मिल रहा है और ना ही तैयार माल बिक रहा है।” कमर बुनकरों को लेकर सरकार के रवैये पर भी नाराज हैं। देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में हथकरघा उद्योग के महत्व के बारे में जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने जुलाई, 2015 में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस घोषित किया था।

कमर अहमद आगे बताते हैं कि तमाम सरकारी ऐलानों के बावजूद बुनकरों की हालत में कोई सुधार नहीं हो सका है। यह हालत सिर्फ टाण्डा तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि देश के अन्य बुनकर क्षेत्रों में भी हालत ऐसे ही हैं। महाराष्ट्र के भिवंडी में भी यही हाल है। भिवंडी में पावरलूम पर कम से कम 6,00,000 लोग काम करते हैं। इनमें असम, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के मज़दूर शामिल हैं। दिन में 12 घंटे काम करने के बाद भी मज़दूर, 300 से लेकर 500 रुपये तक ही कमा पाता है, लेकिन वहां भी पावरलूम बंद हैं।

लॉकडाउन के पहले और उस दौरान बुनकरों की स्तिथि समझने के लिए उनसे बातचीत

नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी के कारण पावरलूम उद्योग की कमर टूट गई। बुनकर चाहते हैं कि जैसे किसानों को बिजली सब्सिडी मिलती है, वैसे ही बुनकरों को भी मिले। बुनकरों को अभी 1 हार्स पावर पर 130 रुपये महीना देना पड़ता है, लेकिन कब तक देना है ये लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकार की मंशा बिजली को भी निजी हाथों में देने की दिख रही है। इस वक़्त लोगों के मन मे बिजली सब्सिडी को खत्म करने को लेकर एक भय बना हुआ है। नई पीढ़ी बुनकरी में नहीं आना चाहती, बल्कि अब परिवार ही नहीं चाहता कि युवा बुनाई करें। बाज़ार में कपड़े को लेकर ज़बरदस्त प्रतियोगिता है। पहले तैयार कपड़े पर टैक्स नहीं लगता था, अब लगता है। बाहर से जो कपड़ा आता है, उनको टैक्स कम देना पड़ता है। जबकि अपने यहाँ कच्चे माल से लेकर तैयारी तक, हर स्तर पर टैक्स देना पड़ता है। कई बार तो जितनी लागत कपड़े की तैयारी पर आती है, उससे कम दाम पर बेचना पड़ता है। बस किसी तरीके से लोग अपना खून पसीना बहाकर रोजी-रोटी चला रहे हैं। ऊपर से बिजली सब्सिडी खत्म होने का डर लोगों को सता रहा है। 

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जून 2006 से बुनकरों के फ्लैट रेट के पासबुक में संशोधन का विचार चल रहा है। सरकार, डी.बी.टी. (डाइरैक्ट बैनिफिट ट्रान्सफर) के माध्यम से सब्सिडी की धनराशि बुनकरों के खाते में जमा करने की योजना बना रही है। बुनकरों को दी जाने वाली राशि और “एक जनपद एक उत्पाद” योजना का कार्य भी हथकरघा विभाग को सौंपा गया है। इस योजनाओं के कारण बुनकरों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है।  

टाण्डा में पिछले 7-8 सालों में लोगों के पलायन में जबरदस्त उछाल आया है। लोग अन्य प्रदेशों में रोजी-रोटी की तलाश में निकल रहे हैं। बुनकर लोग अपना 3-4 पावरलूम मशीन बेच कर खाड़ी के देश या गल्फ कंट्री (विदेश) में मज़दूरी करने जाने पर मजबूर हैं। टाण्डा का बुनकर उद्योग हाशिये पर खड़ा खून के आँसू रो रहा है। 

बुनकरों की समस्या भी राजनीतिक बहस हो

आज़ादी के बीते 70 सालों में देश के लाखों बुनकरों की समस्याएं और उनकी ग़रीबी दूर होने की बजाय बढ़ती ही चली जा रही है। सरकार की ओर से मिलता है तो बस आश्वासन। देश के जिन हिस्सों में बुनकरों की संख्या ज़्यादा है वहाँ आप जाएँ तो पाएंगे कि विकास की राह में यह इलाके कितना पीछे छूट गए हैं। दूसरों के तन ढंकने के लिए कपड़ा बुनने वाले बुनकर, नंगे बदन काम करते हुए दो जून की रोटी को तरस रहे हैं। गंदगी और बीमारियों के साथ तालेमल बिठाते हुए काम कर रहे इन लोगों ने शायद यह मान लिया है कि उनके हिस्से में इससे ज़्यादा कुछ भी नहीं। ना तो न्यूनतम मज़दूरी मिलती है और ना ही लोककल्याणकारी राज्य की सुविधाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी आदि भी इनके हिस्से नहीं आता है। हर रोज़ रोटी की चिंता में हाड़तोड़ परिश्रम करने में सारा परिवार जुटा रहता है, ऐसे में वह बच्चों को स्कूल भेजने की भी सोच नहीं पाते। जब बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सब मिलकर काम करते हैं तो मुश्किल से गुज़ारा होता है। घर में किसी के बीमार होने या बेटी कली शादी के बाद मकान तक बेचना पड़ रहा है।

उत्तर प्रदेश में कई बुनकर परिवार कर्ज़ और ग़रीबी के चलते इस धंधे को छोड़ चुके हैं और जो बचे हुए हैं वे अब आत्महत्या करने पर मजबूर है। चुनाव आते ही हजारों करोड़ की ऋण माफ़ी और अन्य योजनाओं की घोषणा कर दी जाती है, लेकिन राहत के नाम पर ग़रीब बुनकरों को एक फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई। वर्तमान में अधिकांश बुनकर पावरलूम चलाकर कपड़ा तैयार करते हैं। उनकी समस्याएं भी हथकरघा बुनकरों से कम नहीं हैं। बावजूद इसके विद्युत करघा (पावरलूम) चलाने वाले बुनकरों को बुनकर क्रेडिट कार्ड का लाभ नहीं मिल रहा है। पूछने पर अधिकारी कहते है कि बुनकर क्रेडिट कार्ड, हथकरघा बुनकरों के लिए हैं। 

कागजों पर तो हर साल केन्द्र की ओर से महत्वकांक्षी बताई जाने वाली कई योजनाएं बनाई जाती है। पिछले कुछ वर्ष पहले भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा पावरलूम सर्विस सेंटर के माध्यम से देश भर में ‘एकीकृत कौशल विकास योजना’ का हल्ला मचाया गया था। इस योजना के तहत बेसिक वीविंग, शटललेस वीविंग, जॉबर व फिटर, फैब्रिक प्रोडेक्शन एवं एडवांस ट्रेनिंग इन फैशन एण्ड डिजाइन टेक्नोलॉजी समेत पांच विधाओं में बुनकरों को प्रशिक्षित कर व्यापार की मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही गयी थी। लेकिन महीनो बीते जाने पर भी वह योजना धरातल पर कहीं दिखाई नहीं पड़ती हैं।

भारत में खेती के बाद असंगठित क्षेत्र में सबसे बड़ा रोज़गार उपलब्ध करने वाला क्षेत्र बुनकरी है। बिहार के भागलपुर, यूपी में वाराणसी, भदोही, आज़मगढ़, चंदौली, मऊ, टाण्डा, मऊरानीपुर, ललितपुर, इलाहाबाद और पिलखुआ, हरियाणा के सोनीपत और पानीपत, राजस्थान के कोटा, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, असम, पश्चिम बंगाल, तमिल नाडू, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश राज्यों सहित देश भर में तक़रीबन 70 लाख बुनकर हैं, जबकि वास्तविक स्तिथि कुछ और है। सवाल उठता है कि आबादी के हिसाब से बुनकर समुदाय की समस्याएं कभी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा क्यों नहीं बन पाती हैं? कोई राजनीतिक दल इनके पक्ष में खड़ा क्यों नहीं दिखाई पड़ता है?

Author

  • आमिर, पेशे से बुनकर, उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह झारखंड के गुमला ज़िले में निर्माण संस्था से जुड़ कर काम कर रहे हैं।

One comment

  1. इस बार युवनिया के लेखक साथियों ने बहुत बेहतरीन लेख और रपट लिखी है, सभी लेखक साथियों को मै बहुत धन्यवाद देता हूँ निरंतर अपने लेखों,रपटों, कविताओं अपनी स्थानीय संस्कृतियों से हमें परिचित कराते रहे

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