पलायन के दौर में बदलती पहचान से जूझ रहे हैं आदिवासी समुदाय

डेज़ी कुजूर:

अपने आस-पास चल रही हलचल से थोड़ी असमंजस हुई कि आखिर दूसरे कमरे में यह किसकी आवाज़ है, थोड़ी जानी पहचानी सी आवाज़ लग रही थी। कमरे से बाहर निकल कर देखा तो गांव से दीदी और दादा दो बड़े-बड़े बैग के साथ आए थे। दीदी थोड़ी अलग दिख रही थी, उसका नया सलवार-सूट उसके शरीर से बड़ा लग रहा था। मैंने बस देखकर अंदाज़ा लगा लिया कि मेरी बुआ ने उसके लिए नया सलवार-सूट खरीदा होगा। 

जब भी मेरे रिश्तेदार घर पर आते हैं, उन्हें देखकर बहुत ख़ुशी होती है और इन दोनों को देखकर भी मैं बहुत खुश हुई। उनको देखते ही आगे-पीछे होने लगी, क्यूंकि मुझे पता था की ज़रूर कुछ खाने को लाए हैं। बस! फिर थोड़ा इशारा करके दादा से पूछ ही ली, “दादा क्या ला दिए हो?” बस इतने में वो समझ गए और उन्होंने अपने थैले से गुड़-रोटी, चीनी-रोटी और निमकी निकाले और मुझे एक बर्तन लाने को बोले। अपने मिठाई के थैले से थोड़ा सा निकाल कर, उन्होंने मेरे बर्तन में रख दिया। फिर मैंने आश्चर्य से पूछा, “दादा थोड़ा सा क्यों निकाल कर दिए? बाकी मिठाई वापस गांव ले जाओगे क्या?” यह बात सुन कर वह ज़ोर से हँसे और बोले कि वह दोनों मुंबई जा रहे हैं। दीदी को मुंबई में किसी बड़े लोगों के घर पर काम करने के लिए बुलावा आया था। काम बस यह रहेगा कि घर का थोड़ा बहुत काम देखना होगा और छह महीने की एक बच्ची को संभालना पड़ेगा। यह काम सुन कर दीदी सोची कि काम बहुत आसान है, गांव में कितने बच्चों को खेला कर के बड़े किए हैं। इस काम के लिए अगर पैसे मिल रहे हैं और मुंबई में रहने को भी मिल रहा है तो अच्छी बात है। 

असल में दीदी की सोच यह भी थी, कि अगले साल जब उसकी शादी होगी तब उसका ख़र्च कौन उठाएगा। शादी से पहले थोड़ा काम करके पैसे जुटा लेना बेहतर उपाय है। अगले दिन दीदी और दादा सुबह जल्दी उठकर तैयार हो गए और माँ ने झट से उनके लिए खाने की तैयारी कर दी। उन दोनों के साथ, मैं और मेरे बाबा, दोनों रेलवे स्टेशन उनको छोड़ने गए। हम समय से पहले ही स्टेशन पहुँच गए थे। दादा ट्रेन की रिज़र्वेशन टिकट नहीं करा पाए थे क्यूंकि सारी सीट भर गयी थी और उन्हें जनरल डब्बे की टिकट करनी पड़ी। जब  ट्रेन आयी तब मेरी नज़र जनरल डब्बे की ओर गयी। जनरल डब्बे में खचा-खच भीड़ थी, लोग सीट पर तो बैठे ही थे, पर ज़मीन पर भी बैठे थे, इतना कि दरवाज़े तक लोग भरे पड़े थे। यह ट्रेन कोलकाता से मुंबई जा रही थी और अधिकतर लोग प्रवासी मज़दूर ही थे। दादा ने धक्का लगा कर के दरवाज़े से घुसने की कोशिश की और दीदी भी उनके पीछे बड़ी मेहनत से अंदर घुसी। दोनों ने टॉयलेट के पास अपने बैग रखे और उसी पे बैठकर अगले दिन मुंबई पहुँच गए।  

दीदी जब मुंबई में रहने लगी तब मैं बीच-बीच में उसे फ़ोन करने की कोशिश करती थी, लेकिन वह मेरा कॉल उठाती ही नहीं थी। फिर वह, रात को चुपचाप से मुझे कॉल करके कहती, “बेवकूफ, तुझे कितनी बार बोली हूँ कि कॉल मत किया कर, मुझे बहुत काम रहता है और फ़ोन आने पर घर के मालिक मुझ पर गुस्सा करते हैं। मैं समय मिलने पर तुझे खुद ही कॉल किया करुँगी।” बस यह कह कर के वह फ़ोन रख देती थी और मैं बड़ी परेशान हो कर, हर बार चुप रह जाती थी। देखते ही देखते एक साल बीत गया पर दीदी एक बार भी घर नहीं आयी थी। 

दादा थोड़ा घबराए हुए थे दीदी के बारे में सोच कर और तय किए कि उसे वापस ले आएंगे। इसी सिलसिले में दादा ने दीदी के घर मालिक को फ़ोन लगाया और बात करी कि घर पर दीदी की ज़रूरत है और उसे वापस आना पड़ेगा। यह सुन कर घर मालिक ने गुस्से में कहा, “अभी यह लड़की वापस नहीं जा सकती है क्यूंकि उसके कुछ उधार पैसे बाकी है।” यह सुनते ही दादा और भी परेशान हो गए और दीदी को वापस लाने की पूरी कोशिश में जुट गए। इस प्रयास में एक महीने का समय लगा, पर वह दीदी को घर वापिस ले आए। दीदी पहले से थोड़ी कमज़ोर नज़र आ रही थी, लग रहा था की कहीं कुछ दिक्कत हैं। उनसे मैंने बस पूछा, ” दीदी कैसे रहते थे मुंबई में? जिनके घर पर थे, वह लोग कैसे पेश आते थे आप से?” यह सुनते ही दीदी रो पड़ी और बस इतना बोली, “ मैं कभी भी बाहर कहीं काम करने नहीं जाना चाहती है।”  

गांव लौटने के बाद, दीदी घर का काम ज़्यादा नहीं कर पाती थी, क्यूंकि वह काफ़ी दुर्बल हो गयी थी। गांव वाले आपस में बात करने लगे कि, “देखो तो फलानि की बेटी मुंबई से काम कर के लौटी है, पता नहीं किस तरह का काम करती थी। उसका शरीर तो एकदम तार के जैसे पतला हो गया है।” यह सब बातें जब दीदी के कान में पड़ी तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्होंने जंगल से लकड़ी लाना बंद कर दिया, खेत भी जाना बंद कर दिया और वह पास के कुवें में शाम को ही नहाने जाती थी, जब वहां कोई नहीं रहता था। पहले तो जब भी गांव में शादी या कोई त्यौहार होता था, तब दीदी ही सब काम में आगे रहती थी, लोगों को नचवाने में भी आगे ही रहती थी। पर अब तो मानो दीदी का अस्तित्व ही गांव में ख़त्म हो गया था।  

इस बदलते दौर में, एक आदिवासी महिला होने के नाते यह सोचना समझना-बहुत ज़रूरी है कि हम कौन सी पहचान ले कर आगे चलते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि आदिवासी समाज अब इस तरह से बदल रहा है कि अपने मूल्यों को धीरे-धीरे वह समाप्त कर रहे हैं। इसी सन्दर्भ में यह किसी रिझवार (खुशमिज़ाज) आदिवासी युवती से लेकर मुंबई से काम कर लौटी प्रवासी मज़दूर तक की पहचान में बदलाव आना, बहुत बड़ी और गंभीर समस्या को जन्म देता है।

फीचर्ड फोटो आभार: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस

Author

  • डेज़ी, ओडिशा के सुंदरगढ़ ज़िले से हैं। उन्होंने टीआईएसएस मुंबई से सोशल वर्क में पोस्ट ग्रेजुएशन की है। वर्तमान में डेज़ी जन साहस के साथ जुड़कर काम कर रही हैं।

2 comments

  1. 1) Very pathetic situations of our people who leave home and go outside of village.
    2) pay is hand to mouth or nothing sometimes.
    3) Very well articulate .

  2. बिल्कुल, आदिवासी समाज के लड़कियों को अपने गांव में ही छोटे मोटे रोजगार तलाश कर अपने जीवन यापन करने की आवश्यकता है, क्योंकि बड़े बड़े शहरों में उनके साथ किस किस प्रकार की घटनाएं घटती हैं जो सभी के लिए दु:खदायी होती है।

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