क्या बाज़ार के दांव-पेच सीख रहे हैं आदिवासी समुदाय?

डॉ. गणेश मांझी:

अक्सर, आदिवासी समाज बाज़ार से भागता रहा है, लेकिन बाज़ार ने इनका पीछा कभी नहीं छोड़ा। वस्तुओं के आदान-प्रदान और परस्पर सहयोग से जीने वाला समुदाय, बाज़ार के दांव-पेंच नहीं जानता है। लेकिन, क्या आदिवासी समुदाय बाज़ार का हिस्सा होने की कोशिश कर रहा है? क्या वह बाज़ार के दांव-पेंच सीख रहा है? क्या बाज़ार, आदिवासी समाज के हंसी-ठिठोली वाले मोल-तोल से ऊपर है? हमारे देश भारत को स्वतंत्र हुए 70 साल गुज़र चुके हैं और मेरी समझ से यह बाज़ार की मार झेल-झेल कर बाज़ार को ही थपेड़े मारने की ओर भी बढ़ रहा है।

क्या है आधुनिक बाज़ार का सिद्धांत?

अर्थव्यवस्था की दुनिया में 1776 एक महत्वपूर्ण वर्ष है, जब स्कॉटलैंड के अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने “An Inquiry into the Nature and Causes of the Wealth of Nations (देशों की संपत्ति की प्रवृत्ति और उसके कारण की एक जाँच)” लिखा था। इस दौर को इंग्लैंड और यूरोप में ”औद्योगिक क्रांति” की लहर और आधुनिक अर्थव्यवस्था की शुरुआत के तौर पर देखा जाता है। इसी किताब में एडम स्मिथ ने ‘इनविजिबल हैंड (अदृश्य हाथ)’ की बात की है। मतलब बाज़ार में उतार-चढ़ाव और अंततः साम्य (संतुलन की) अवस्था में खरीद-बिक्री के पीछे इसी अदृश्य हाथ की भूमिका होती है। 

इस अदृश्य हाथ को आप काल्पनिक ईश्वर की संज्ञा दे सकते हैं, जिस पर आप विश्वास करते हैं और कहते हैं कि उनके इशारे के बिना तो पत्तियां भी नहीं हिलती। मतलब, पूरे बाज़ार का कारोबार इसी ‘अदृश्य हाथ’ से होता है। दरअसल उस अदृश्य हाथ को आप व्यापक रूप में इस कथन से समझ सकते हैं – “It is not from the benevolence (kindness) of the butcher, the brewer, or the baker that we expect our dinner, but from their regard to their own interest.” मतलब, बाज़ार व्यवस्था के अनुसार ‘हम – कसाई, शराब बनाने वाले, या बेकर के परोपकार (दयालुता) के कारण नहीं बल्कि उनके अपने स्वार्थ (या फायदे) की वजह अपने रात के खाने की उम्मीद करते हैं। विक्रेता लाभ कमाना चाहता है, अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करना चाहता है, इसलिए अपनी दुकान सजाता है, वो उसका अपना स्वार्थ है। दूसरी ओर, तमाम उपलब्ध अवसरों, वस्तुओं की कीमत और उससे होने वाले शारीरिक और मानसिक फायदे के अनुसार उपभोक्ता बाज़ार में अपनी खरीददारी करता है। खरीदने वाले को पसंद हो और उस वस्तु की कीमत दे सकता है, तो खरीदे अन्यथा नहीं ख़रीदे, यही बाज़ार का सिद्धांत है। 

यहाँ दोनों पक्ष अपने-अपने स्वार्थ की पूर्ति कर रहे हैं, और अपने स्वार्थ की पूर्ति करने के क्रम में वह ‘अदृश्य हाथ’ भी काम कर रहा है। इसमें तीसरा पक्ष कहीं नहीं है। मतलब, एक प्रकार से सरकार या किसी तीसरे व्यक्ति की ज़रूरत बाज़ार को नहीं होती है, जब तक कि विक्रेता और खरीददार के बीच में अनुबंध (या आपसी समझ) समुचित हैं। अनुबंध में किसी प्रकार की कमी-ज़्यादा होने की स्थिति में सरकार या किसी तीसरे व्यक्ति के दखल की ज़रूरत होती है। सामान्य स्थिति में किसी तीसरे व्यक्ति के दखल से उत्पादक या उपभोक्ता या दोनों को ही हानि हो सकती है। सरकार की या किसी तीसरे पक्ष द्वारा विनियमन (नियंत्रण) की ज़रूरत भी तभी पड़ती है जब उत्पादक जमाखोरी करता है (ताकि अनावश्यक रूप से वस्तुओं की कीमतें ज़्यादा कर सके), या उत्पादक किसी प्रकार का गैर-कानूनी काम करता है जिससे कीमत प्रभावित होती हो। उदाहरण के लिए कोरोना काल में काफी सारे व्यापारी ऑक्सीजन सिलेंडर और रेमडेसिविर जैसे दवाओं की कालाबाज़ारी में लिप्त हैं। कुछ तो रेमडेसिविर की नकली दवाई भी बनाने लग गए हैं। कुल मिलाकर, सरकार बाज़ार को नियमित करती है। 

आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह भी है, ‘सरकार, कभी-कभी बाज़ार के परिणाम को दुरुस्त करती है।” वैसे, बाज़ार भी बहुत किस्म के होते हैं जिसके अनुसार विक्रेताओं का व्यवहार अलग हो सकता है, जैसे – पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में बहुत सारे विक्रेता और खरीददार होते हैं, ऐसे स्थिति में कीमत पर किसी का नियंत्रण नहीं होता है, वहीं दूसरी ओर अगर किसी वस्तु की बिक्री पर विक्रेता का एकाधिकार है, तो वह मनमाने दाम वसूल सकता है और अलग-अलग उपभोक्ताओं से अलग-अलग कीमत भी वसूल कर सकता है, जैसे – रेमडेसिविर विक्रेता।

इस बाज़ार में कहाँ हैं आदिवासी?

इस बाज़ार व्यवस्था में आदिवासी कहाँ हैं? क्या वह बाज़ार के अनुरूप अपने आप को ढाल पाए हैं? क्या उन्हें बाज़ार की समझ है? क्या आदिवासी जिस समाज में जी रहा है वहाँ वह बाज़ार के सिद्धांतों के बीच कहीं झूल रहा है?

आदिवासी समाज, व्यवसाय और बाज़ार को निकृष्ट समझता आया है। अब, जब काफी आदिवासी शहरीकरण और औद्योगीकरण के चपेट में आ गए हैं, तो वह अपने आदिवासी समुदाय को ही एक सामाजिक पूंजी के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। जैसे – अपने ही आदिवासी समाज को संसाधन और उपभोक्ता दोनों के रूप में देखना। मतलब, जब आप सामाजिक पूंजी को अपने उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनाते हैं तो समाज को भी उस पूंजी से आय की उम्मीद होती है। फलस्वरूप, व्यावसायिकता में कमी होने लगती है क्योंकि आपका व्यवहार रिश्ते से प्रेरित है न कि बाज़ार के सिद्धांत से। ऐसी स्थिति में उत्पादक और उपभोक्ता दोनों एक दूसरे से पैसे निकालने की कोशिश कर रहे होते हैं, जबकि पैसा किसी के पास होता नहीं है। हालाँकि इसे सामाजिक व्यवसायीकरण के दृष्टिकोण से बेहतर बनाया जा सकता है, जिसका वर्णन संछेप में अंत में किया गया है। 

बाज़ार की कम समझ और सिर्फ खुद की सामाजिक पूँजी के बल पर आगे बढ़ पाने की सम्भावना बहुत कम है। आईये इसे एक समकालीन उदाहरण से समझते हैं – रसिका टीम द्वारा बाहा मैगज़ीन, और आदिवासी महिलाओं की सौंदर्य प्रतियोगिता के आयोजन की शुरुआत। सिर्फ आदिवासी महिलाओं पर केंद्रित ‘सौंदर्य प्रतियोगिता’ कितनी लंबी चल सकती है? क्या ये व्यवसाय आदिवासी एकांत में फल-फूल सकता है? क्योंकि आदिवासी समुदाय अभी भी व्यापार, व्यवसाय, बाज़ार में पीछे हैं, इसलिए इस प्रकार की ‘सौंदर्य प्रतियोगिता’ में वित्तीय पूँजी की कमी हमेशा बनी रहेगी, ऐसा मैं समझता हूँ क्योंकि वित्तीय पूँजी के लिए हमने अभी तक कोई ढंग के पेड़ नहीं लगाए हैं। ऐसी स्थिति में सामाजिक पूँजी (प्रतिभागी आदिवासी मॉडल्स) अपनी कमाई का हिस्सा मांगती हैं, और संगठन भी अपने हिस्से को और अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए सामाजिक पूँजी के आय में कटौती को लेकर कटिबद्ध हैं, तो इससे टकराव की ही स्थिति उत्पन्न होगी। अगर दोनों समूह बेहतर व्यावसायिक निर्णय लेने के काबिल हों, तो टकराव की स्थिति को बेहतर अनुबंध और सशक्त मोल-तोल से ठीक किया जा सकता है। 

जैसे मैं पहले कह रहा था, बाज़ार में तीसरे पक्ष की ज़रूरत नहीं होती है और यहाँ भी ज़रूरत नहीं है। बस सामाजिक पूँजी को लेकर सामाजिक धोखाधड़ी के आरोप-प्रत्यारोप होंगे लेकिन इसका कोई निश्चित हल नहीं होगा। टकराव की स्थिति में पारम्परिक न्याय प्रक्रिया कुछ काम नहीं आएगी, क्योंकि यह बाज़ार की समस्या है। अंत में, मुर्गा लड़ाई में दोनों मुर्गे एक दूसरे को घायल कर लेंगे और दोनों मुर्गो का जीवन (व्यवसाय) समाप्त हो जाएगा। जनता (आदिवासी समाज) भावनात्मक रूप से इस लड़ाई में वाम और दाम हो सकती है लेकिन बाज़ार के निर्णय आप बाज़ार को लेने दें, अगर कोई गैर-न्यायिक निबंधन हुआ है तो व्यावसायिक न्याय प्रक्रिया इस पर निर्णय लेगी। हरेक उद्योग के अपने तौर-तरीके हैं, फैशन उद्योग के भी अपने गुण और अवगुण हैं, आप अपना बेहतरीन निर्णय लें और आगे बढ़ें।  

सामाजिक व्यवसाय कैसे सफल होगा उसे हम अमेरिकी गणितज्ञ और नोबल पुरुसकर विजेता जॉन नैश के शब्दों से समझने की कोशिश करते हैं। अँग्रेज़ी फिल्म, ‘ए ब्यूटीफुल माइंड’ में ‘जॉन नैश’ की भूमिका निभाने वाले अदाकार ‘रसेल क्रो’ कहते हैं – “What did Adam Smith says – “Best result come…..from everyone in the group doing what’s best for himself… incomplete …, Adam Smith was wrong — because, because the best result will come ….from everyone in the group doing what’s best for himself and the group.” यानि कि एडम स्मिथ कहते हैं ‘किसी भी क्रिया का बेहतरीन परिणाम तब आता है जब समूह के सभी सदस्य अपने फायदे लिए पूरी मेहनत करते हैं,  … जॉन नैश कहते हैं कि यह अपूर्ण है, क्योंकि, किसी भी क्रिया का बेहतरीन परिणाम तब आता है जब हरेक व्यक्ति खुद के और समूह के फायदे के लिए बेहतरीन काम करता है।’ कुल मिलाकर समूह व्यवहार के बारे में बहुत खूब लिखा है जॉन नैश ने, जो न सिर्फ आदिवासी सामूहिक जीवन के सन्दर्भ में सच है बल्कि अन्य समूह व्यवहार में भी।

सामाजिक पूंजी के रूप में आप आदिवासी समाज का इस्तेमाल करें या न करें, लेकिन आपको सभी प्रकार के उपभोक्ताओं से मुख़ातिब होना पड़ेगा। बाज़ार का दृष्टिकोण व्यापक होता है, संकीर्णता से बड़ा व्यापार होना संभव नहीं है।

Author

  • डॉ गणेश मांझी, झारखण्ड के सिमडेगा जिले के युवा स्कॉलर हैं। वे अभी गार्गी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर (अर्थशास्त्र) के रूप में कार्यरत हैं। उन्हे आप इस ईमेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं : gmanjhidse@gmail.com

One comment

  1. आदिवासियों के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक बेहतरीन लेख।लेखक को हार्दिक बधाई।हमें बाजार के दांव पेंच सीखना होगा, तभी हम जीवित रह सकते हैं।अन्यथा यह उपभोक्ता वादी दूनियांं हमारा समूल नष्ट कर देगी।

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