झारखंड के गुमला और कोल्हान क्षेत्र से और ओडिशा के सुंदरगढ़ से – कोरोना रिपोर्ट

एलीन लकड़ा; पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम और सराईकेला खरसवा, झारखंड :

नेत्रा गाँव (ज़िला सराईकेला खरसवा) के मेघराई सोरेन और कुमीर गाँव (पूर्वी सिंहभूम) के जयदेव महतो से कोरोना महामारी दूसरी लहर के बीच झारखंड राज्य के कोल्हान क्षेत्र की स्थिति के बारे में बातचीत हुई। पूर्वी सिंहभूम जिला चूंकि पश्चिम बंगाल से सटा हुआ है, इसलिए यहाँ के लोग बेहतर इलाज़ की सुविधा के लिए पश्चिम बंगाल राज्य में आने वाले स्वास्थ्य केंद्रों पर ही निर्भर करते हैं। यह इसलिए भी है क्योंकि उनके अपने जिले के पंचायत उपस्वास्थ्य केन्द्रों की हालात काफी जर्जर है और डॉक्टर उपस्थित नहीं रहते हैं। लेकिन इस बार का परिदृश्य काफी अलग है, क्योंकि बंगाल के सटे हुए क्षेत्रों में कई बड़ी चुनावी राजनीतिक रैलियां और मतदान हुए हैं और उधर जाना खतरे से खाली नहीं है।

वर्तमान में हालात ऐसे हैं कि इलाके के लगभग हर गाँव में कई लोग सर्दी, खांसी और बुखार से ग्रसित हैं। मौसम का हवाला देते हुए, लोग जेनेरिक दवाईयों से काम चला रहे हैं। कोरोना टेस्ट के लिए कभी-कभार कैंप लग जाता है, परंतु गाँव के लोग डर से नहीं जाते हैं। टीकाकरण 60 वर्ष आयु वाले ज़्यादातर लोगों का हो गया पर खबरों और अफवाहों के कारण कई लोग वैक्सीन लेने के लिए तैयार नहीं हैं। फिलहाल 18 वर्ष से अधिक के आयु वालों के लिए बातचीत चल रही है।

शहरी इलाकों में ही कुछ कोरोना के केस दिखाई दे रहे हैं, और लोग सावधानी बरत रहे हैं। गुमला ज़िले के पालकोट प्रखण्ड के बगेसेरा नवडीह से लंगड़ू उरांव और मुनु उरांव से बात करने से पता चला कि हर गाँव में ज्वर और सर्दी-खाँसी चल रही है। वहाँ के लोगों का भी मानना है कि मौसम बदलने के कारण ही लोग बीमार हैं। स्थानीय झोलाछाप डॉक्टर से ही छोटी-मोटी दवाइयाँ ले लेते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी (आशा वोर्कर और सहिया) अभी गाँव में नहीं आते हैं। बुखार के लिए भुईनीम (चिराइयता) उबालकर उसके पानी का सेवन किया जा रहा है। टीका लेने की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है क्योंकि गिने-चुने लोग ही टीका लगवाएँ है। मन में डर है कि टीका वाला सुई लेने से लोग मर रहे हैं।

एमलॉन तिर्की; सुंदरगढ़ ओडिशा:

कोरोना महामारी की दूसरी लहर काफी तेज़ी से गाँव-गाँव में फैल रही है। महामारी के चलते तमाम शहरों से लॉकडाउन की खबरें आ रही है और साथ ही कई दफ्तर और काम करने की जगहें बंद हो चुकी हैं। मेरा कार्यस्थल भी इसी कारण कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया है और मैं दिल्ली से वापस मेरे गाँव ओडिशा  आ चुका हूं। 

दिल्ली से ओडिशा वापस आने के बीच जो मेरा अनुभव रहा उसके बारे में मैं कुछ बताना चाहता हूं। मैं दिल्ली से फ्लाइट लेकर झारसुगुड़ा एयरपोर्ट पहुंचा वहाँ पर जब मेरा कोरोना का एंटीजन (रैपिड) टेस्ट हुआ तो उसमें मेरा रिज़ल्ट पॉजिटिव आया। घर जाने के लिए मैंने गाँव से ही एक गाड़ी वाले को बुलाया था, जब उसे मैंने बताया कि मेरा कोरोना बीमारी का टेस्ट पॉजिटिव आया है तो उसने मुझे साथ ले जाने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि अगर मैं आपको लेकर गया तो गाँव के लोग मुझे बहुत भला बुरा कहेंगे। 

इसके बाद मैंने स्थानीय पुलिस से मदद ली और उन्होंने मेरे लिए एक टैक्सी का प्रबंध किया जिससे मैं अपने घर तक पहुंच पाया। एयरपोर्ट से निकलते ही मैंने मेरी गाँव की आशा कर्मी (एएनएम) को फोन करके उन्हें मेरे कोरोना पॉजिटिव होने के बारे में जानकारी दी। आशा कर्मी ने मुझे सुंदरगढ़ के एक ज़िला अस्पताल में भर्ती होने के लिए कहा, लेकिन एयरपोर्ट के लोगों ने मुझे यह बताया था कि मेरे कोरोना बीमारी के लक्षण काफी कम है इसलिए मैं मेरे घर पर ही आइसोलेशन कर सकता हूं। सुंदरगढ़ के ज़िला अस्पताल में जाना मुझे इसलिए भी ठीक नहीं लगा क्योंकि वहां पर बैड उपलब्ध नहीं थे और साथ ही कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या भी काफी ज़्यादा थी। पिछले 3 दिनों से मैं घर से अलग एक कमरे में आइसोलेशन में हूं और सभी सावधानियों का खयाल रख रहा हूँ। 

मेरे गाँव का नाम खमारी मुंडा है जो ओडिशा राज्य के सुंदरगढ़ जिले के बाली संकरा ब्लॉक में आता है। मेरे गाँव के लगभग सभी घरों में किसी ना किसी को सर्दी, खांसी या बुखार की शिकायत सुनने में आ रही है, लेकिन कोई भी कोरोना का टेस्ट नहीं करा रहा है। लोग सर्दी, खांसी या बुखार के लक्षण दिखने पर जेनेरिक दवाओं जैसे पेरासिटामोल या क्रोसिन आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं, साथ ही काढ़ा या फिर भाप लेने जैसे देसी इलाज का इस्तेमाल कर खुद ही ठीक होने का प्रयास कर रहे हैं। इस समय में अफवाहों का फैलना काफी आम हो गया है जो स्थिति को और ज्यादा खतरनाक बना रहा है। गाँव के लोगों को जैसे ही पता चला कि मैं कोरोना पॉजिटिव हूं तो उनके बीच एक डर का माहौल बन गया। मेरे कोरोना पॉजिटिव होने की खबर भी एक अफवाह की तरह गाँव में फैल गई और कई लोगों को तो यह भी खबर मिली कि मैं बहुत गंभीर रूप से बीमार हूं। कुछ इस तरह से ही गाँव में अफवाहें फैल रही हैं।

यहां मुझे साफ रूप से दिख रहा है कि गाँव में जानकारी का घोर अभाव अभाव है, जिस वजह से लोग टेस्ट नहीं करा रहे हैं और ना ही तबीयत खराब होने पर अस्पताल जा रहे हैं। यह एक आम अफवाह फैली हुई है कि अगर खांसी या बुखार है या ज़ुकाम है तो अस्पताल जाने पर उन्हें कोरोना पॉजिटिव बता दिया जाएगा। इससे लोग काफी डरे हुए हैं और देसी नुस्खों से ही अपना काम चला रहे हैं।

अन्य जगहों की तरह यहां के भी ग्रामीण इलाकों में वैक्सीन को लेकर कई तरह की अफवाहें चल रही हैं। इनमें एक आम अफवाह यह है कि वैक्सीन लेने के बाद पुरुष की संतान उत्पत्ति की क्षमता खत्म हो जाती है। इसके अलावा कहीं कहीं से यह भी खबरें सुनने में आई कि वैक्सीन लेने के बाद लोगों की तबीयत खराब हो गई या उनकी मौत हो गई। इस तरह की अफवाहों या खबरों की वजह से लोगों के बीच वैक्सीन लेने को लेकर एक बड़ा ही नकारात्मक माहौल बन रहा है और लोग वैक्सीन नहीं ले रहे हैं। आसपास के अस्पतालों की हालत भी काफी खराब है। मैं जब झाड़सुगुड़ा एयरपोर्ट से अपने गाँव आ रहा था तो मैंने सुंदरगढ़ में जिला अस्पताल में जाकर एक बार वहां का जायज़ा लिया, वहां पर मैंने देखा कि एक तो बेड उपलब्ध नहीं है साथ ही वहाँ का प्रबंधन बिल्कुल भी बीमारी की गाइडलाइंस के अनुसार नहीं है, लोग फर्श पर यहाँ-वहाँ कहीं भी बैठे या लेटे हुए थे। काफी सारे लोगों की स्थिति वहां पर गंभीर दिखाई दी, यह सब खबरें गाँव में भी पहुंच रही हैं इस वजह से लोग जिला अस्पताल या सरकारी अस्पतालों में जाने से कतरा रहे हैं। स्थानीय अखबारों और लोकल मीडिया में सरकारी अस्पतालों की खराब व्यवस्था की काफी खबरें आ रही हैं, साथ ही यह भी खबरें भी आ रही हैं कि अस्पताल में मरीजों को समय पर (और अच्छा) भोजन नहीं मिल पा रहा है, इसको लेकर प्रशासन ने संज्ञान लिया है और इंतजामों को ठीक करने का आश्वासन  भी दिया है।

फीचर्ड फोटो आभार: फ्लिकर (यह फोटो प्रतीकात्मक है)

Authors

  • एलीन, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रही हैं। 

  • एमलॉन, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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