अलीराजपुर के आदिवासी शेर मगन भाई को आखिरी क्रांतिकारी सलाम

युवानिया डेस्क:

एक बारह साल के भिलाला आदिवासी लड़के ने स्कूल में दीवार पर टंगा हुआ विश्व का नक्शा देखा। उसे लगा कि नक्शे में ये जगहें देखने से अच्छा है कि असलियत में देखा जाए! और अपने दोस्त के साथ लगभग बीस साल पहले अलीराजपुर ज़िले में अपने घर से वह दुनिया देखने भाग गया। उसके बड़े भाइयों ने उसे स्कूल भेजा था लेकिन वहां उसका ज़रा भी मन नहीं लगता था। भागकर गुजरात के सूरत शहर पहुंचा। सूरत में, बच्चे से बूढ़े तक हज़ारों भील आदिवासी मज़दूरी करते थे, इसलिए मगन और उसके दोस्तों के लिए वहां काम ढूंढना मुश्किल नहीं था। 

मगन की जैसी फितरत थी उसके हिसाब से उसे निर्माण मज़दूर का काम भी रास नहीं आया और वह, सड़क किनारे, एक होटल में बर्तन धोने के काम में लग गया। कुछ नया करने की तीव्र इच्छा रखने वाला वह बच्चा मगन कलेश, अपनी कड़ी मेहनत के कारण जल्द ही मालिक की नज़र में आ गया और उसने मगन को मिठाई बनाने का काम सीखने में लगा दिया।

वह इसमें इतना माहिर हो गया कि मालिक उसे अपनी मुंबई की दुकान में काम करने के लिए ले गया। मुंबई में दिनभर मगन मिठाई दुकान पर काम करता और शाम को शहर के चक्कर लगाता और वहां के शानदार नजारों का मज़ा लेता। 

एक दिन घूमते-घामते अनजाने में, वह हवाई अड्डे के प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुंच गया। वहां उसे सुरक्षाकर्मियों ने पकड़ लिया। दुकान मालिक के नाराज़ हो जाने के डर से उसने गलत पता लिखवा दिया। झूठ पकड़ा गया और उसे किशोर बंदीगृह में बंद कर दिया गया जहां मगन और उसके मित्र ने छह महीने बिताए। किसी तरह उसके दुकान मालिक को पता चला और उसने मगन और उनके दोस्त को छुड़वाया। 

मगन से मालिक इतना खुश था कि उसे हांगकांग की अपनी मिठाई दुकान पर भेज दिया। साथ ही मालिक को शायद लाचार और निपुण मज़दूर को पकड़ कर रखने का मोह भी होगा। लेकिन हांगकांग में, एक महीने के बाद ही उसे मालिक के फ्लैट की सफाई और घर की देख-रेख में लगा दिया गया। मगन को घर से बाहर जाने की इजाज़त नहीं थी, जैसे वह मुंबई में घूमा करता था। यह बंधन उसके लिए बहुत कष्टदायक हो गया और उसने अपने मालिक को उसे वापस भेजने के लिए मजबूर किया। मगन ने धमकी दी की यदि उसे वापस नहीं भेजा गया तो वह डूबकर मर जाएगा। 

मुंबई पहुंचने के बाद मगन ने सोच लिया कि अब बहुत हुआ, वापस गांव जाना चाहिए। पांच साल बाद दुनिया घूमने के बाद वह सन् 2000 में अलीराजपुर में अपने गांव बडदला आ गया।

मगन के परिवार वाले जो उसके ज़िन्दा होने की उम्मीद छोड़ चुके थे बहुत खुश हुए और मगन का ज़ोरदार स्वागत हुआ। इस इलाके में लोगों की आम धारणा है कि मगन जैसे बेलगाम लड़कों को सुधारने के लिए उनकी शादी कर दी जानी चाहिए। इससे पहले कि वह फिर गायब हो जाए, मगन के परिवार वालों ने भी उसकी तुरंत शादी करा दी।

इसके बावजूद काफी समय तक मगन इधर-उधर घूमता रहा। बहुत संभावना थी कि वह गलत संगत में पड़ कर चोरी-चाकरी में लग जाता, लेकिन सौभाग्यवश उसकी मुलाकात खेडुत मजदूर चेतना संगठन के वरिष्ठ आदिवासी कार्यकर्ता श्री शंकरसिंह तड़वला से हो गई। इस मुलाकात ने मगन की ज़िंदगी का रुख एक अलग दिशा में मोड़ दिया। शंकरसिंह की प्रेरणा के कारण मगन के विद्रोही मन को ज़िंदगी का मकसद मिल गया। उन्होंने तय किया कि अपना पूरा जीवन वह भील समाज को शोषण से मुक्ति व न्याय दिलवाने में और आदिवासियों की पहचान की लड़ाई को समर्पित कर देंगे। वे शंकर के साथी बन गए।

शुरुआत में मगन ने आदिवासी संस्कृति के विषय पर भिलाली और हिंदी की किताबों व पत्रिकाओं को बेचने के लिए अलीराजपुर में एक स्टाल लगाने का निर्णय लिया गया। वित्तीय रूप में इसे स्वतंत्र बनाने के लिए कैफे की तर्ज़ पर पुस्तक भंडार के साथ चाय स्टाल भी बनाया गया। होटल प्रबंधन में अनुभवी, मगन ने स्टाल का प्रभार संभाला।

लेकिन मगन की प्रवृत्ति एक जगह बैठे रहने की नहीं थी। इसलिए जल्द ही दुकान बंद हो गई और मगन संगठन के कार्यकर्ता के रूप में गांव में मीटिंग करने घूमने लगा।

इसी समय, अलीराजपुर प्रशासन ने भील जोड़ों के सामूहिक विवाह के एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। खेडुत मजदूर चेतना संगठन ने प्रशासन के इस कदम का यह कहते हुए विरोध किया कि यह भीलों के हिंदूकरण करने और उनकी विशिष्ट संस्कृति को समाप्त करने का एक षड्यंत्र है। इस तरह सभी सामूहिक विवाह कार्यक्रमों का ज़ोरदार विरोध किया गया और इस आंदोलन में मगन कई बार जेल गए और अंततः इनके प्रयासों के कारण सरकार को सामूहिक विवाह के कार्यक्रमों को रोकना पड़ा।

मगन, संगठन के एक कार्यकर्ता के रूप में बहुत मज़बूती से आगे बढ़ते गए। आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाईयां, गांव में मनरेगा के तहत वैकल्पिक विकास की अवधारणाओं पर विकास कार्य करवाना, ग्रामसभा सशक्तिकरण जैसे ग्रामीण जीवन के हर पहलू पर वे पूरे जोश से काम में लगे थे।

अधिकांश कार्यकर्ताओं से भिन्न वे बौद्धिक कामों में भी निपुण थे। सामाजिक विषयों पर लेख, कविताएं व गीत भी लिखते थे। उन्होंने खुद को पूरे दिल से आदिवासियों के संघर्षों में डुबा दिया और आदिवासियों की विशिष्ट पर्यावरणवादी जीवनशैली और संस्कृति के सकारात्मक पहलुओं को मुख्यधारा के समाज के सामने बहुत मज़बूती से रखा।

पिछले दो दशकों में उन्होंने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम, अनुसूचित क्षेत्रों के लिए पंचायत विस्तार (पेसा कानून), शिक्षा का अधिकार अधिनियम, अस्थिर प्रवासी श्रमिक अधिनियम, अतिब्याज उधार अधिनियम पर बहुत काम किया। 

वह गुजरात में स्टोन क्रशर कारखानों में काम करने वाले सिलिकोसिस पीड़ितों के पुनर्वास के संघर्ष में बेहद सक्रिय थे। सुप्रीम कोर्ट में मामले के लिए साक्ष्य जुटाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। सिलिकोसिस बीमारी का कारण बनने वाली कुछ फैक्ट्रियां तो इस सामूहिक संघर्ष के कारण बंद ही हो गई। इस संघर्ष में मज़दूर परिवारों का पता लगाने और फैक्ट्रियों के सर्वेक्षण में मगन भाई ने बहुत सक्रिय भूमिका निभाई थी। एक समय तो ऐसा था कि उन्हें फैक्ट्री मालिकों से बचने के लिए भूमिगत होकर भी काम करना पड़ा था।

दुर्भाग्य से, हमने मगन भाई को समय से पहले ही खो दिया। वे गत एक वर्ष से बीमार थे। वे इस क्षेत्र में खेडुत मज़दूर चेतना संगठन, आदिवासी एकता परिषद और आदिवासियों के संघर्ष का एक चमकदार सितारा थे जो कुछ दिन पहले भंगोरिया में ढोल की थाप पर नाचने वालों के पैरों से उड़ी धूल में मिल गए। 

अलीराजपुर की कड़क, तपती मिट्टी और चमकीली रेत से गढ़े गए तुम्हारे जैसे बहुत कम शेर इस धरती पर उतरते हैं। कॉमरेड तुम्हे क्रांतिकारी सलाम। तुम अब निश्चिन्त आराम करो, संघर्ष जारी रहेगा।

– यह लेख राहुल बनर्जी के फेसबुक पोस्ट का हिन्दी अनुवाद है व जयश्री के साथ मगन भाई की बातचीत के आधार पर अमित ने तैयार किया है।

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