क्यूँ सूने होते जा रहे हैं आदिवासी गाँवों के अखड़े

जोवाकिम टोप्पो:

लोकनृत्य और लोकगीत, आदिवासी जन-जीवन को उल्लासित करने का एक सर्वोत्तम माध्यम हैं। नृत्य, संगीत आदिवासी जीवन के रग-रग में, पल-पल में रचा और बसा है। हर प्रांत के जन-जातीय जीवन में कमोबेश यही स्थिति पाई जाती है।

सामाजिक व्यवस्था में पूर्वजों ने कवी हृदय को झिंझोड़, अपनी भावनाओं को गीतों में व्यक्त किया और कलाकारों ने उन्हें नृत्य में प्रदर्शित किया। सबसे उल्लेखनीय बात तो यह है कि उन्होंने अपनी वेदना और पीड़ा को गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से भुला दिया या कहें कि मात दी। हर प्रकार के काँटों की भरमार होने के बावजूद वे नाच-गा कर अपना मन बहलाया करते थे। यह उनकी सहनशीलता की पराकाष्ठा थी।

गाँव के जवान और शारीरिक रूप से सक्षम पुरुष-महिला, दिन भर खेत-खलिहान और जंगलों में काम कर थक जाते थे। इस दौरान सुस्ताने हेतु थोड़ा समय मिलने पर अपनी पीड़ा को वह गीतों में उड़ेल देते थे। ये गीत मौसम अनुसार बदलते हैं और उनके अनुसार ही नृत्य और गीत के लय-ताल होते हैं। उनके गीतों की लय और ताल से गिरि-कंदरा, जंगल-घाटी गूंजते थे। ऐसे लगता था मानों प्रकृति के संतान, माँ प्रकृति को अपनी व्यथा से अवगत करा रहे हों। इस प्रकार वह अनजाने ही एक समृद्ध संस्कृति के स्वरूप की बुनियाद रख रहे थे, जो आने वाली पीढ़ी के लिए अनमोल धरोहर बनने जा रही थी।

प्रायः आदिवासी गांवों के बीच में एक खुली जगह होती थी, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। इस खुली जगह को अखड़ा कहा जाता है। यह वह जगह है जहाँ गाँव के रहवासी, सामूहिक रूप से खुशियाँ मनाते, खाते-पीते, नाचते-गाते या अन्य कार्यक्रम करते। दिनभर खेत-खलियान, जंगल आदि में काम करने के बाद शाम होते ही लोग इस अखड़ा में जमा होकर सामूहिक नृत्य करते और दिनभर की थकान और अन्य परेशानियों को भूल जाते। गाँव के नायक छौला (टोला) के ढोल की थाप सुनकर, उसके साथियों के पाँव थिरकने लगते थे। युवा-वृद्ध और बच्चे सभी उस सामूहिक नृत्य में भाग लेते थे। युवतियां एक दूसरे का हाथ थामे, पूर्वजों द्वारा रचित गीत गाती घूमती और गोल घेरे में नृत्य करती। युवक उस गोल घेरे के बीच में मांदर, ढोल, नगाड़े, डफली, झांझ-मंजीरा बजाते और ताल-से-ताल मिलाते हुए नृत्य करते। 

रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की घटनाओं पर आधारित यह नृत्य गीत, प्रकृति के वर्णन, हास-परिहास और श्रृंगार रस से परिपूर्ण होते थे। सामाजिक स्थिति को दर्शाने वाले छैलाओं एवं संवेदनशील लोगों द्वारा यह गीत रचे जाते थे, जो सीधे हृदय की गहराई से निकल रहे होते थे। रात ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती, नृत्य का आनंद बढ़ता जाता। चूंकि अगली सुबह से काम में लग जाना होता था, अतः एक निश्चित समय के बाद नृत्य का अंत होता और सब अपने घर या धुमकुड़िया में सोने के लिए चले जाते थे। दिनभर की थकान दूर करने और मनोरंजन का सबसे सुन्दर माध्यम यही सामुहिक नृत्य होते थे। मौसम के अनुसार गीत, नृत्य और ताल हुआ करते थे। झूमर, करम, जेठवारी, टुंटा खद्दी, सरहुल और न जाने कितने प्रकार के नृत्य हुआ करते थे जिनसे अखड़ा आबाद रहता था। 

अखड़ा आज भी अपनी जगह है, परन्तु अपने दुर्भाग्य पर रोता हुआ वीरान पड़ा है। अपने पुराने दिनों की यादों में वह खामोश पड़ा है। उसे गाँव के युवक-युवतियों, बाल-वृद्धों के झूमते-थिरकते क़दमों का इंतज़ार रहता है। वह अखड़ा जो मस्तानी युवा मंडली के मस्ती भरे कदमों की थिरकन से, उनके नपे-तुले कदमो की ताल से लययुक्त होता था, आज मायूस हो गया है। यदा-कदा ही डी.जे. की धुन पर थिरकते युवा क़दमों से उसे कुछ संतोष अवश्य मिल जाता है, पर इसमें वह मज़ा कहाँ? गीत के बोलों के साथ जब ताल से ताल मिलकर झूमते कदम थिरकते थे तो वह गीत गाँव की सरलता, धरातल की छाप, इतिहास की गूँज, और पीड़ा की अभिव्यक्ति भी बन जाते थे। 

पहले घरों में वाद्य यंत्रों की भरमार हुआ करती थी, अब वह सरल-सुलभ बाजे घरों से गायब हो रहे हैं। आज वह गिनती में कुछ ही रह गए हैं। आज गाँव में खामोशी छाई रहती है। ये पता नहीं चलता है कि कब आषाढ़ और कब भादों विदा हो गया। पहले बारिश का स्वागत अखड़ा में नृत्य करके किया जाता था, आज अखड़ा में मरा सन्नाटा पसरा रहता है। 

शादी-ब्याह के मौसम में मंडपों (मडवा) में वैवाहिक रसम अदा होने के साथ-साथ गीतों का आदान-प्रदान भी हुआ करता था। इन गीतों में भी समाज का इतिहास गुंथा होता था। कितने अर्थपूर्ण होते थे वह गीत, परन्तु आज मंडपों में लगभग वीरानी छाई रहती है। अखड़ा से यह संबंध-विच्छेद अचानक कैसे हुआ? युवाओं का अखड़ा से संबंध बड़ा गहरा और पुराना रहा है, आज अखड़ा के प्रति यह बेरुखी क्यूँ? शायद इसलिए क्यूंकी समय के साथ परिवर्तन आता है और नवीनता में आकर्षण भी तो होता है। 

Author

  • जोवाकिम, झारखण्ड के गुमला ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह केंद्रीय जन संघर्ष समिति के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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