सौरभ सिन्हा:

15 मार्च 44 BC* (ईसा पूर्व) को भरे सदन (senate) में कम से कम 60 सांसदों (senators) ने जूलियस सीज़र को चाकुओं से 23 बार वार करके मार डाला, और फिर रोम की सड़कों पर तानाशाह के मारे जाने का जुलूस निकाला। इसमें युवा मार्कस ब्रूटस एक मुख्य ‘साजिशकर्ता’ था। यह प्रचलित है कि मरते हुए सीज़र के आखिरी शब्द – ‘तुम भी, ब्रूटस?’ थे। यह वाक्य इतिहास में लंबे समय से किसी निकटतम मित्र द्वारा अंतिम विश्वासघात किए जाने को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता रहा है।
*(44 ईसा पूर्व) का मतलब ईसा के जन्म से 44 साल पहले यानि कि आज से 2065 साल पहले

सीज़र के अंतिम शब्द असल में शेक्सपियर का आविष्कार था। लैटिन के वाक्य “एत तू, ब्रूट?” का ही हिन्दी अर्थ है “तुम भी, ब्रूटस?”। रोमन इतिहासकार सुएटोनियस ने ग्रीक (यूनान देश की भाषा) में, सीजर के इन्हीं अंतिम शब्दों को “काई सु, टेकोनॉन” के रूप में दर्ज किया, जिसका मतलब होता है “तुम भी, मेरे बच्चे?”। हालांकि, यूनानी इतिहासकार और लेखक प्लूटार्क का कहना है कि सीज़र ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा था, और अपने सिर को ढंकने के लिए सिर पर टोगा (उस समय के रोमन धनी पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला एक प्रकार का कपड़ा) खींचकर ही वह मर गए। आम तौर पर यह माना जाता है कि जब सीज़र ने खुद को हत्यारों के बीच देखा, तो उन्होंने खुद को अपने भाग्य के भरोसे छोड़ दिया।

मार्कस ब्रूटस, लुसिउस जुनिउस ब्रूटस के वंशज थे, जिन्होंने करीब 450 साल पहले रोम के आखिरी राजा टारक़ुइन सुपर्बस के जगजाहिर ज़ुल्म के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। 509 BC के इस विरोध ने ही रोम में राज-तंत्र हटाकर जन-तंत्र की स्थापना की थी। इसके बाद से ही शासन व्यवस्था में एक या उससे ज़्यादा लोगों को ये ज़िम्मेदारी दी जाने लगी कि वो सेनेट के साथ मिलकर प्रशासन के मुद्दे सुलझाएं। इसी विद्रोह के बाद जुनिउस ब्रूटस वहां के एक कौंसल (consul) भी बने थे और रोम के लोगों में इस विद्रोह की यादें ताज़ा थी।

सुएटोनियस के अनुसार, 44 BC में हुई सीज़र की हत्या अंततः कुछ चिंताओं के कारण हुई। सेनेट अपने आप को ज़िम्मेदार मानता था कि वो महान रोम देश की व्यवस्था का रखवाला है, पर सीज़र मानते थे कि सेनेट पूरी तरह से दूषित हो चुका है और रोमन रिपब्लिक उनके हाथों में बर्बाद हो जाएगा। अभी तक रोम का कोई एक सम्राट नहीं होता था, बड़े और अमीर परिवार में से ही किसी को कौंसल (consul) की ज़िम्मेदारी मिलती थी। सीज़र खुद एक साधारण परिवार से आते थे और लम्बे सैनिक जीवन के बाद वो रोम के एक मशहूर लीडर बन पाए थे। 

फोटो आभार: https://en.wikipedia.org/wiki/The_Assassination_of_Julius_Caesar_(Sullivan)#/media/File:Death_of_Julius_Caesar_2.png

कई लोगों को लगता था कि सीज़र खुद को रोम के राजा का ताज पहनना चाहते थे, जिस बात को सीज़र ने खुद कभी नहीं माना, और वो सेनेट के बजाय जनता को अपने साथ रखने के लिए प्रयास करते रहे। कुछ ही महीनों में सीज़र ने संसद का अनादर किया, भ्रष्ट हो चुके पीपल्स ट्रिब्यून्स (आम जनता के न्यायिक मसलों को सुलझाने वाली रोमन व्यवस्था) को हटा दिया और धनी रोमन वर्ग का मखौल उड़ाया। इतिहास के पन्नों में रोम की सबसे मशहूर ‘साजिश’ और आज ही के दिन 2065 साल पहले हुई यह लड़ाई अमर है। जूलियस सीज़र की मौत के बाद 13 साल तक रोम, गृह युद्ध में फंसा रहा और उस खूनी संघर्ष के अंत में अगस्तस, 31 BC में रोम के पहले सम्राट बने। 

इसी इतिहास का एक पक्ष यह भी है कि सीज़र ने जानबूझ कर सेनेट के लोगों को नाराज़ किया ताकि वो उनकी हत्या कर दें, और उनकी मौत पर ही शायद जनता, सेनेट के खिलाफ विद्रोह करती। सीज़र, रोम की सेना के महान नायक थे जिन्हें रोम, उसकी सेना और उसकी जनता का प्यार प्राप्त था। युद्ध से वापस आकर उन्होनें रोम में बहुत कोशिश की थी कि रिपब्लिक की मूल धारणाओं को मज़बूत किया जाए, पर सेनेट में जमे हुए कुछ बेहद अमीर परिवारों ने लगातार किसी भी तरह के बदलाव को अपने देश के आदर्शों की अवहेलना बताई, और रोम की मर्यादा बचाने के नाम पर एक 55 साल के बूढ़े आदमी को कायरों की तरह मार डाला। 

अगर सच में ऐसा था कि जूलियस सीज़र ने खुद ही सेनेट को अपनी हत्या करने का न्यौता दिया, तो ब्रूटस ने क्या अनजाने रूप से सीज़र की ही मदद की थी? पर सीज़र की मौत के बाद हुए रोम के रिपब्लिक की पुनर्स्थापना से भी वहां सबको सामान अधिकार मिले? आज का लोकतंत्र जिन मानवाधिकारों के आधार पर बना है, क्या उन मूल्यों को तब के लोग समझते थे? क्या सेनेट आम लोगों की लड़ाई लड़ रहा था, या सिर्फ अमीरों के अधिकारों की रक्षा? 

हमें ये तो समझना होगा कि रोम के पूरे इतिहास में लाखों लोगों ने रोमन साम्राज्य को बढ़ाने के लिए युद्ध लड़े और कई लाखों लोग इसके ग़ुलाम बने। कई देशों और समुदायों को रोम के इतिहास ने असभ्य और बर्बर बताया, ताकि उनके ऊपर हुकूमत की जा सके। जब हम 2 हज़ार साल बाद सीज़र के मौत या उनके आगे-पहले की कहानियों को देखते हैं, तो क्या उनसे मज़लूमों और मेहनतकशों की कहानी दिखती है – या इतिहास हमें सिर्फ योद्धाओं और शासकों की कहानियां ही बताने के लिए है?

अगर प्राचीन दुनिया के सबसे समृद्ध और बड़े साम्राज्य दासता पर आधारित थे, तो हम अपने देश या क्षेत्र के इतिहास को कैसे देखेंगे? हमारी प्रचलित कहानियाँ किनके बारे में है? क्या इनमें गरीबों के शोषण की कहानी होती है या उनके खून से सनी सम्राटों की गौरव-गाथा ही हमारी कहानी है? 

ये ज़रूरी है कि हमारी मुख्य लड़ाई भूलने के खिलाफ हो। चाहे किसी भी समय या जगह पर हुआ हो, हम समझ सकें कि आज की दुनिया का आधार किन अन्यायों पर आधारित है – और कैसे लोकतंत्र के इस 2000 हज़ार साल पुराने संघर्ष को हम आज के समय में समझें। इतिहास का औचित्य ही ये है कि हम फिर से वो गलतियाँ ना करें जिससे सत्ता के लोभी हमें लड़ाकर खुद अपनी मूर्तियाँ बनवाएं – और हम भी रोम की जनता की तरह भीड़ बनकर ना रह जाएँ। 

बहरहाल, आज के दिन के बहाने ही हम दुनिया के खूनी इतिहास में ‘साजिश’, ‘देशद्रोह’ और ‘प्रजा-तंत्र’ के नाम पर किए गए कृत्यों को समझने का प्रयास करें। इसे आज के समय में जोडें। अगर सीज़र आज होते और उनके हत्यारे लोकतंत्र या देश बचाने के नाम पर उनकी खुलेआम हत्या कर देते, तो हम और आप उसमें कहाँ होते?

शायद सम्राटों की कहानियों में ही सही, आम लोगों को खुद के लिए कोई सीख मिल जाए।

फीचर्ड फोटो आभार: https://en.wikipedia.org/wiki/Assassination_of_Julius_Caesar#/media/File:Vincenzo_Camuccini_-_La_morte_di_Cesare.jpg

Author

  • सौरभ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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