आओ सीखें कैसे करते हैं मशरूम की खेती

महेश हेम्ब्रम:

बांका (बिहार) के रहने वाले महेश हेंब्रम, एक लंबे समय से सामाजिक कार्यों से जुड़े हैं, साथ ही स्थानीय संगठन आदिवासी मजदूर किसान वाहिनी के भी सदस्य हैं। महेश स्थानीय स्तर पर रोजगार के विकल्प तलाश करने में खास रुचि रखते हैं, और लगातार गैर-पारंपरित तरीकों के ज़रिये स्वरोज़गार की संभावनाएं तलाश करते रहते हैं। इस साल की शुरूआत में ही महेश ने घर पर ही मशरूम उगाने के प्रयोग पर काम करना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें ज़रूर कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा लेकिन धुन के पक्के महेश ने इस प्रयोग में आखिर सफलता हासिल कर ही ली। व्हाट्सऐप पर जब उन्होने मशरूम उगाने की प्रक्रिया के विडियो हमारे साथ साझा किए तो हमें लगा कि उनके इस प्रयास को युवानिया में जगह मिलनी ही चाहिए। उनके साथ इस विषय पर हुई बातचीत के कुछ अंश और उनके साझा किए गए विडियो हम यहाँ आप सभी के साथ साझा कर रहे हैं।         

सामाजिक परिवर्तन शाला के एक शिविर में भाग लेने के लिए जब हम झाजा (जमुई जिला, बिहार) गए थे तो एक दिन फील्ड विज़िट पर हमें केड़िया गाँव जाने का मौका मिला। वहां पर काफी लोग जैविक कृषि कर रहे हैं, वहीं पर सबसे पहले हमने, लोगों को मशरूम की खेती करते हुए देखा। हमने जब उनसे मशरूम उगाने के बारे में जानकारी मांगी तो उन्होने विस्तार से पूरी प्रक्रिया की जानकारी दी। इसके बाद हमें लगा कि यह तो हम भी कर सकते हैं, और इसे आर्थिक रूप से सशक्त होने का जरिया बना सकते हैं। इसके बाद हमने यह पता लगाने की कोशिश की, कि मशरूम का बीजा कहां मिलता है, पता चला कि इसके लिए भागलपुर जाना पड़ेगा जो हमारे यहाँ से काफी दूर है।   

हमारी जिज्ञासा बढ़ रही थी तो हम लगातार खोजते रहे कि पास में कहां पर मशरूम का बीजा मिल सकता है।   फिर कुछ समय बाद पता चला कि बांका में ही विनीता मशरूम नाम की एक दुकान है जहां पर 100 रु./किलो के भाव से मशरूम का बीजा मिलता है। वहाँ से हम 4 किलो बीजा लेकर आए और उनसे मशरूम उगाने का अपना प्रयोग शुरू कर दिया। शुरुआत में मशरूम उगाने के बाद बिक्री के लिए बाज़ार की खोज करना एक चुनौतीपूर्ण काम था, क्योंकि हमारे इलाके के आर्थिक रूप से कमज़ोर आदिवासी लोग यह नहीं खरीदते हैं। दूसरा कारण यह भी है उनके लिए मशरूम मौसमी खाद्य वस्तु है जो कुदरती रूप से होता है। इसलिए हमने गाँव के नजदीक के छोटे शहरों/कस्बों में जाकर लोगों को व्यक्तिगत रूप से संपर्क करके पहली दफा का उपज को बेचा। शुरुआत में बहुत ज़्यादा फायदा तो नहीं हुआ लेकिन उगाने की लागत और बेचने के लिए बाज़ार जाने में हुए पैट्रोल खर्च के ऊपर थोड़ा फायदा भी हुआ।   

हम अब भी इसे नया-नया करना शुरू किए हैं, थोड़ा समय में जब अच्छे से सीख जाएंगे तो उपज भी बढ़ेगा। अभी ग्राहकों की पहचान भी हो गई है, अब जब कभी बाज़ार जाते हैं तो लोग बुला-बुला कर पूछते हैं कि मशरूम लेकर कब आएंगे। हम यह भी सोच रहे हैं कि आने वाले समय में संगठन के काम के साथ-साथ संगठन के क्षेत्र में महिलाओं को स्वयं सहायता समूह के माध्यम से मशरूम की खेती करने के लिए बढ़ावा देंगे ताकि हमारे आदिवासी समुदाय के लोग आर्थिक रूप से सशक्त बने।

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  • महेश, बिहार के बांका ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। अपने क्षेत्र के संगठन- आदिवासी मजदूर किसान मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

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