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सर्दियों में अब ना अम्मा की बुनाई दिखती है, न ऊन के गोले

अफ़ाक उल्लाह: मुझे आज भी याद है कि जैसे ही सर्दियाँ आती थी, हम लोग बड़े बक्से से अपने गर्म कपड़े, स्वेटर, टोपी, मफलर और भी बहुत कुछ जो सर्दियों में काम आता है, उसको पूर जोश और  खुशी से निकालते थे। छत पर ले जाकर उसको डालते थे। तो शुरुआती सर्दियों की वो हल्की…

महिलाविरोधी रूढ़ियों से तंग हैं महाराष्ट्र के ‘कंवर’ समाज की महिलाएं 

मनीषा शहारे: हमारे समाज में हर समुदाय के लोग रहते हैं, हर समुदाय की अलग-अलग रूढ़ियाँ होती हैं, और पुराने लोगों से चली आती ये रूढ़ियाँ, आज भी कई परीवारों में दिख जाती हैं। ज़्यादातर ये आदिवासी समाज में दिखाई दे रही हैं। गाँव की लड़कियों से बात करते समय मासिक पाली (माहवारी या मासिक…

क्या हम आज़ाद हो गए ?

विश्वजीत नास्तिक: एक ही दुनिया में कहीं सुबह है तो कहीं रात,कहीं विकसित देश है तो कहीं विकासशील राज्यकहीं सब चीजों से संपन्न शहर है तो,कहीं गांव से बाहर घर के ऊपर छत भी नहीं! कोई अरबो के महल में रह रहे हैं तो,कोई गगन से हो रहे झांझावत में सिकुड़ते हुए | एक ही…

शोषण और असमानता से भरे हमारे समाज में संविधान जरूरी है क्या ?

आलोक मौर्य: प्राचीन जंगल में शासकों ने स्वयं के कल्याण हेतु तथा आम जनता का शोषण करने के लिए विभिन्न प्रकार की विधियों का निर्माण किया। जबकि सन्त महात्मा एवं पादरियों ने समय-2 पर धर्म की ओट (पर्दा) में ऐसी विधियों का निर्माण किया या ऐसी परम्पराओं का सृजन किया, जिसमें पारलौकिक भय के कारण…

आखिर ये झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग आते कहाँ से हैं?

गोपाल लोधियाल:  सवाल यह है कि ये झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग, आखिर कहाँ से आते हैं? क्या यह बारिश के साथ आसमान से टपकते हैं? या फिर यह नदियों और नालों के साथ बहकर यह लोग आते हैं? या फिर बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह जहाँ-तहाँ उग आते हैं? यह सवाल सब को समझना चाहिए…

खरसांवा के शहीद

अरबिंद भगत: हमने भी मांगा था नया साल उनसे, पर उन्होंने दी गोलियों की सौगात । हमने ने  भी दुआ की थी खुशहाल नए साल की, पर हमें मिला उनसे मौत का तोहफ़ा । हम भी चाहते थे , हमारे जल, जंगल, जमीन पर हमारा नाम, पर उन्होंने हमें दिया लहूलुहान शरीर का दान ।…

संविधान हमारे लिए ज़रूरी हैं क्यूंकि संविधान से देश चलता है

महेश हेंब्रम:  संविधान हमारे लिए ज़रूरी हैं, संविधान से देश चलता है। संविधान गरीब वर्ग के लिए है। धर्म से देश नहीं चलता है। धर्म एक आस्था है, धर्म अलग-अलग समुदाय में अलग-अलग माना जाता है । देश में अनेक समुदाय, जातियाँ हैं, सबके धर्म-परम्पराएँ अलग-अलग हैं। धर्म आस्था है, मन की शांति के लिए…

आज न वो घुघुती रही और न आसमान में कौवे

महिपाल: उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र में मकर संक्राति के दिन मनाये जाने वाले त्यौहार ‘उत्तरैणी’ और ‘मकरैणी’ का खासा महत्व है। गढ़वाल में इस त्यौहार को ‘मकरैणी’ के नाम से और कुमाऊँ में ‘उत्तरैणी’ या ‘घुघुतिया’ के रूप में मनाया जाता है। इसे उत्तरैणी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन के बाद…

बरकरार रहेगा 2023 में युवानिया का सफर

युवानिया डेस्क: साल 2022, में निरंतरता को बरकरार रखते हुए युवानिया 2023 में प्रवेश करने जा रही है, इस मौके पर हमारे पाठकों और सहयोगियों ने कुछ संदेश भेजें हैं जो इस पोस्ट में आपके साथ साझा कर रहे हैं। उम्मीद है कि इस नए साल में भी लिखने और पढ़ने वालों का सहयोग हमें…

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