आदिवासी और जंगल की अर्थ व्यवस्था से दूर क्यूँ हैं शिक्षा के सिलेबस?

आमिर जलाल:

हर समाज की अपनी एक अलग पहचान होती है। वो चाहे शहर हो, गाँव हो या जंगल हो। इंसान का बसेरा हर जगह है। किसी की ज़रूरतें कम हैं तो किसी की ज़्यादा हैं। अगर हम आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र गुमला की बात करें तो यहाँ परांपरागत तौर पर अधिकतर आदिवासी समुदाय खेतीहर रहे हैं। इन्हीं भूभागों में उन्होंने खेती के लिये उपयोगी ज़मीन तैयार की और जीविका के साथ-साथ रीति-रिवाज, धर्म-संस्कृति और जीवनदर्शन का निर्माण किया और यह सिलसिला सदियों तक चलता रहा।

झारखण्ड के गुमला जिले के रायडीह प्रखण्ड में लोगों की ज़रूरतें उनके खेत-जंगल से ही पूरी हो जाती हैं। कोंडरा पंचायत की पार्वती देवी भी खेत व जंगल से जो पैदा होता है, उसी से अपके 7 लोगों के परिवार की सभी ज़रूरतें पूरी कर लेती हैं। वह लाह (लाख), चिरौंजी, इमली, महुवा, सखुआ आदि वन्य उपज जंगल से लेकर आती हैं, खेतों में धान, उड़द और मडुवा भी लगाती है। इस तरह पार्वती, लगभग 70 हज़ार रुपया सालाना जंगलों व खेतों की उपज से कमा लेती हैं। सबसे अच्छा दाम लाह से ही मिलता है। इस बार उन्होने 15 हज़ार रुपये का लाह बाजार में बेचा है, पिछले सीजन में 10 हज़ार का लाह बाज़ार में बेचा था। लाह को सबसे ज़्यादा बारिश, बिजली की कड़कड़ाहट और चूहों से बचाना पड़ता है। इस बार फसल भी अच्छी हुई और आमदनी भी।

गांव में मोबाइल का नेटवर्क नहीं रहता है। गाँव मे एक ही सरकारी स्कूल है, जिसमें कक्षा 8 तक ही पढ़ाई होती है। ज़्यादातर लोग कक्षा 8 तक पढ़ाई करके छोड़ देते है। मैट्रिक व इंटरमीडिएट व उच्च शिक्षा के लिए 40 से 50 कि.मी. दूर जाना पड़ता है। कोंडरा पंचायत में एक ही प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर है। जिसमें कोई खास इलाज की उम्मीद नहीं रहती है। कोंडरा पंचायत के लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर 35 से 50 कि.मी. दूर ही जाना पड़ता है।

पीबो पंचायत की बिरसो देवी जी भी जंगलों से होने वाली फसलों- महुवा, तूंत, सब्जी और लाह पर निर्भर हैं। पशुधन में बैल-बकरी और मुर्गी भी पालती है। बकरी, मुर्गी, लाह और महुवा को नज़दीकी साप्ताहिक बाज़ार में बेचकर ज़रूरत के सामान ले लेती हैं और इन्हीं पैसों से बचत भी करती हैं। बिरसो देवी की सालाना आमदनी लगभग 55 हज़ार है। इस बार इनकी लाह की खेती ठीक हुई है। 6 हज़ार रुपए का लाह इस बार बाज़ार में बेचा है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रायडीह 8 कि.मी. या जिला हॉस्पिटल गुमला 25 कि.मी. लेकर जाना पड़ता है। गाँव मे एक प्राइमरी स्कूल है जो कि इनके घर से 1 कि.मी. की दूरी पर है।

जरजट्ठा पंचायत की बूटो देवी भी लाह की अच्छी खेती कर रही हैं, पिछले साल की सालाना आमदनी 13 हज़ार रुपए थी, इस बार भी 11 हज़ार का लाह बाजार में बेचा है। 4 लोगों का परिवार है। वह सुबह में बकरी, बैल लेकर जंगल की तरफ चराने के लिए निकल जाती हैं। जंगलों से महुवा चुनकर इकट्ठा कर लेती हैं, जंगल में इमली के भी पेड़ हैं, तो वह भी इकट्ठा करती हैं। लेकिन इस बार लॉकडाउन की वजह से इमली व महुवा के सही दाम नहीं मिल पाए। महुवा 20 रुपया/कि.ग्रा. व इमली 15 रुपया कि.ग्रा. के दाम पर ही बिक पाया। इनके गाँव मे सब्जी की पैदावार कम है, कारण पानी के स्रोत का दूर होना है और जहां पानी है वहां ज़मीन पथरीली है। 

कोजांग गाँव में सरकार की तरफ से 3 वाटर लिफ्टिंग परियोजनाएं पास हुई हैं। वाटर लिफ्टिंग परियोजना लगने के बाद गाँव मे सब्जी व सेमी लता की खेती अच्छी होने लगेगी। गांव में 1 जूनियर स्कूल है, जिसमें बच्चों के अनुपात में शिक्षकों की कमी है। स्वास्थ्य संबंधी समस्या आने पर 15 कि.मी. दूर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रायडीह आना पड़ता है। बरसात के मौसम में यहां का रास्ता बहुत खराब हो जाता है, जिससे परिवहन व मानव संसाधनों का अभाव हो जाता है।

इस तथ्य को इनकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले कुछ दशकों में विकास की गति में इस कदर परिवर्तन हुआ है कि जिन बदलावों के लिये कई सौ साल लगे हों, वही कुछ ही दशकों में संभव हो गए हैं। कृषि को ही लें, आधुनिक कृषि, पारंपरिक खेती-बाड़ी की तुलना में बहुत ही वैज्ञानिक हो गई है, और पूर्णतः शोध और अनुसंधान पर आधारित हो गई है। बढ़ती हुई आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये छोटी जोतों से अधिक पैदावार लेने की विधि लगातार तैयार की जा रही है, जिसमें संसाधनों के सीमित उपयोग द्वारा अधिक फसल पैदा की जा सके। पारंपरिक खेती आदिवासियों के लिये भले ही श्रेष्ठ रही हो, लेकिन बदलते परिवेश में बढ़ती आवश्यकताओं के लिये वही कारगर हो, यह संभव नहीं है। आदिवासी समुदायों की संपन्नता, मुख्यधारा की तुलना में कम करके आंकी जाने लगी है और इस खयाल के चलते आदिवासी समुदाय हाशिये में आ गए हैं। उन्हें अपने जीविकोपार्जन के लिये अन्य स्रोतों पर निर्भर होने की आवश्यकता पड़ने लगी है।

एक दृष्टिकोण से आदिवासियों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार का सही स्वरूप नहीं होने के कारण शिक्षा का सही प्रभाव नहीं पड़ा। ज़ाहिर है कि मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था जिस प्रकार का सिलेबस तैयार करती है, उससे आदिवासियों की कृषि और जंगल आधारित आर्थिक व्यवस्था को सीधे रूप से कोई फायदा नहीं मिल पाता है। ऐसे में शिक्षित आदिवासियों को जीविका के लिये पलायन करना ही पड़ता है। इस शिक्षा व्यवस्था ने गांव को केन्द्र में रखकर विकास की अवधारणा नहीं रखी। गांव की व्यवस्था में मौजूद मानव, पशु, जल, जंगल ज़मीन, पहाड़, नदी आदि के बेहतर प्रबंधन की दिशा में सोच जा नहीं पाई। इस कारण पढ़ा-लिखा आदिवासी अपने लिये एक बेहतर कल अपने समाज से बाहर ही देखने की कोशिश करता रहा। इसका सीधा असर आदिवासी सामाजिक व्यवस्था पर देखा जा सकता है। अपने क्षेत्र के संसाधनों को ध्यान में रखते एक नए दृष्टिकोण से विकास की बात नहीं होगी तो इसका दूरगामी परिणाम समाज के पूरी तरह से विखंडित हो जाने के रूप में सामने आएगा।

इस गंभीर खतरे के निदान के लिये आदिवासी समाज को जीविका के नये विकल्पों को अपने ही इलाकों में तलाशने की जरूरत होगी, तभी समुदाय की प्रकृति और विरासत बच पाएगी।

Author

  • आमिर, पेशे से बुनकर, उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह झारखंड के गुमला ज़िले में निर्माण संस्था से जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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