युवानिया डेस्क:

29 नवंबर, 2020: 26-27 नवंबर, 2020 को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) द्वारा दिये गए ‘चलो दिल्ली’ के आह्वान के साथ, किसान पंजाब, हरयाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सहित भारत के विभिन्न राज्यों से राजधानी की ओर मार्च कर रहे हैं – नए किसान बिलों को वापस करवाने के दृढ़ संकल्प के साथ। 

किसानों द्वारा उठाई गई चिंताओं को समझने या संबोधित करने की कोशिश करने के बजाय, श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने इन विरोध प्रदर्शनों को ‘गुमराह ’या ‘प्रभावित’ होने, और देश के विकास को पीछे ले जाने की साजिश के रूप में प्रचारित किया है। सरकार ने पूरे पेज के विज्ञापन दिये जिसमें किसानों को झूठ से सावधान रहने के लिए कहा गया है! किसानों के लिए प्रतिबद्ध सरकार के लिए यह विडंबना है कि उन्हें यह अध्यादेश लाने के लिए संसद के मानदंडों और स्थापित नियमों को मोड़ना पड़ा। किसानों के विरोध के साथ-साथ विपक्षी दलों के नेतृत्व में आंदोलन को जबरदस्त प्रतिरोध के साथ पूरा किया गया है – और इसके जवाब में सरकार द्वारा विरोध के मूल अधिकार पर भारी अंकुश लगाया गया है।

इस देश के किसानों ने पिछले वर्षों में नियमित रूप से विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकार किसानों की गिरती आय और उनकी कठिनाइयों पर पर्याप्त ध्यान दे। किसानों की उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक 2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा विधेयक 2020, किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) विधेयक, और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020 जैसे गैर-संकल्पित विधान संघर्ष को पूरी तरह से अलग स्तर पर ले गए हैं। लेकिन केंद्र सरकार भी अपने झूठ पर अड़ी है और सभी को बता रही है कि यह तीन कानून देश में कृषि को बदलने और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से लाए गए हैं। सरकार का कहना है कि यह प्रावधान कृषि उपज में बाधा मुक्त व्यापार को सक्षम करेंगे और किसानों को उनकी पसंद के निवेशकों के साथ जुड़ने में सक्षम बनाएँगे।

कृषि विशेषज्ञों ने क़ानूनों के बारे में अपना चिंताएँ व्यक्त की हैं। इन विधेयकों ने बहुत संदेह पैदा किया है क्योंकि यह अध्यादेश मार्ग से पारित किए गए थे। नए बिल में कहा गया है कि बिना किसी सुरक्षा उपाय के खाद्यान्न का व्यापार निजी व्यापारियों के हाथों में होगा। भारत के अधिकांश किसान छोटे और सीमांत हैं। वे आम तौर पर अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए फसल का इंतजार करते हैं। उनके पास सुदूर स्थानों पर व्यापार करने की क्षमता नहीं है। इसलिए, किसानों को बेचने की स्वतंत्रता का दावा सही नहीं है। निजी व्यापारियों को बिना किसी नियमन के खाद्यान्न व्यापार की स्वतंत्रता देने से अंततः एकाधिकार, ओलिगोपोलिस या कार्टेल सिस्टम का उदय होगा।

86% भारतीय किसानों के पास पाँच एकड़ से कम भूमि है, और 67% किसानों के पास ढाई एकड़ से कम भूमि है। साथ ही यह गंभीर आर्थिक संकट के भी शिकार हैं। ये छोटे किसान अपनी उपज अन्य बाजारों में कैसे बेच सकते हैं? यदि छोटे किसान उनमें भाग नहीं ले सकते तो नए बाजारों का क्या उद्देश्य है? नए निजी बाजार कैसे संचालित होंगे? इन नए बाजारों का कोई विनियमन नहीं होगा और उनसे राज्य सरकारों को भी कोई कर प्राप्त नहीं। राज्य सरकारें केवल पहले से चल रहे बाजारों को ही नियंत्रित कर पाएँगी।

विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे किसानों को, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों द्वारा पैदा की गई एक के बाद एक अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ा है, और संभवतः केंद्र सरकार भी उन्हें रोकने के लिए हर संभव साधनों का उपयोग करने की फिराक में है। उनके रास्ते में कई बैरिकेड, भारी कंटेनर, रेत से भरे ट्रक, कांटेदार तार की बाड़, सड़कों के पार विशाल पत्थर, रख दिए गए हैं। किसानों के काफिले पर वाटर कैनन, आंसू गैस के इस्तेमाल के साथ-साथ आश्चर्यजनक रूप से राजमार्गों और सड़कों पर गहरी खाई भी खोदी गई है। यह सब उन नागरिकों को रोकने के लिए किया गया जो मिट्टी से खाना पैदा करते हैं। यह वो लोग हैं जो केंद्र सरकार के सामने अपनी शिकायतों के साथ पूरे देश सहित राजधानी दिल्ली में भी शांति से हमारी प्लेटों में भोजन लाते हैं! 

उत्तर भारत इस समय कड़ाके की सर्दी की चपेट में है, ऐसे समय में इन किसानों को कड़ी ठंड और एक कठिन यात्रा को तय करने के लिए मजबूर किया गया है। राष्ट्रीय राजधानी में कृषि कानूनों  पर अपने मन की बात कहने के लिए, किसानों को ही इतना कुछ सहना पड़ रहा है। सनद रहे कि स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई उनका भी अधिकार है।

तमाम रुकावटों और कठिनाइयों के बावजूद हजारों किसान देश की राजधानी क्षेत्र की सीमाओं तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं। किसान संगठनों के विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्लेटफार्मों के नेतृत्व में कई अन्य, और संयुक्त किसान मोर्चे दिल्ली चलो कार्यक्रम के लिए धीमे-धीमे ही सही लेकिन आगे बढ़ने के लिए कायम हैं। किसानों और खेतिहर मजदूरों की आवाज़ों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है, अध्यादेशों को तैयार करने या संसद में अधिनियम के रूप में पारित करते समय उनकी चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया। पूरे भारत में किसानों और उनके संगठनों द्वारा कई बार इस मुद्दे पर सरकार को पूछे गए सवालों के एवज में उनके प्रतिनिधियों को कोई जवाब नहीं मिले हैं। 

इस तरह के देशभर में किसानों के खिलाफ हुई हिंसा और दुर्व्यवहार से पैदा हुए व्यापक आक्रोश के बाद सरकार छिपने से बाहर आई है और स्थिति को समेटने की कोशिश कर रही है। लेकिन वह फिर से किसानों को संगठित करने वाले लोगों के खिलाफ बोलकर और देश और विकास के एजेंडे पर बेफ़जुल बयानबाजी के लिए बिकी हुई मीडिया का उपयोग ही कर रही है।

किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध भूमि अधिकार आन्दोलन, उन सभी प्रदर्शनकारी किसानों – युवा, वृद्ध, पुरुषों, महिलाओं, कृषि श्रमिकों, प्रवासी श्रमिकों, वनवासियों और आदिवासियों के साथ मजबूती से खड़ा है, जिन्होंने मिलकर अपने विरोध प्रयासों को संगठित किया है और एक साथ उनके संवैधानिक अधिकारों की मांग करने के लिए एकजुट हुए हैं। हम 02 और 03 दिसंबर, 2020 को किसानों और कृषि श्रमिकों के साथ एकजुटता में देश भर में सामूहिक कार्रवाई और विरोध का आह्वान करते हैं।

हम इस देश के लोगों से केंद्र सरकार के जनविरोधी और कॉर्पोरेट समर्थक एजेंडे को खारिज करने का भी आह्वान करते हैं और राज्य सरकारों से संघीय ढांचे को खत्म करने के प्रयासों का विरोध करने के लिए एकजुट होने की अपील करते हैं। हम न्यायपालिका से सक्रिय रूप से आगे आने और यह सुनिश्चित करने की मांग करते हैं कि किसी भी विरोध करने वाले किसान के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जाए और बिके हुए मीडिया चैनलों और अन्य राजनीतिक नेताओं द्वारा किसान संगठनों और उनके नेताओं के खिलाफ बेबुनियाद खबरों को फैलाने से रोका जाए।

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