शुभम पांडेय:
पिछले कुछ वर्षों में, भारत में महिला सुरक्षा एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। अपराध की दर लगातार बढ़ रही है, और महिलाओं के खिलाफ हिंसा में लगातार वृद्धि हुई है। देश के संविधान के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें लिंगभेद से मुक्ति है, फिर भी हर दिन बलात्कार के कई मामले सामने आ रहे हैं। भारत में ही हर 7 मिनट मे एक महिला का रेप होता है। आज कोई भी लड़की या महिला सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करते समय सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती है। हालाँकि अगर जनता प्रयास करे तो काफी हद तक अपराध की रोकथाम की जा सकती है।
कुछ सरल उपाय महिलाओं की सुरक्षा में काफी सुधार कर सकते हैं, उदाहरण के लिए, अलग-अलग क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइट स्थापित करना, उन्हें आरामदायक महसूस कराने के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों में महिला शौचालय की सुविधा। यदि आप इंटरनेट पर खोज करते हैं, तो भारत के विभिन्न हिस्सों में कई मामले हो रहे हैं, जहाँ महिलाओं को परेशान किया जा रहा है, यहाँ तक कि उनकी हत्या भी की जा रही है। किशोरियाँ स्कूल और कॉलेज में नाम लिखा ले रही हैं पर वो घर वालों के दबाव के कारण प्रतिदिन क्लास नहीं ले पाती। डर का ऐसा माहौल बना हुआ है की हर भाई, हर बाप अपनी बेटी और बहन की निगरानी में लग गया है।
हमारे समाज की बात करें तो लड़के, लड़कियों से बात करने मे भी सहज महसूस नहीं करते, लड़कियों से बात करना या दोस्ती करना कमज़ोरी माना जाता है। ऐसे माहौल के कारण लड़के 20-22 साल की उम्र तक भी, लड़कियों को समझ नहीं पाते, और जो उनकी समझ बनती है उसके अनुसार वो लड़कियों को इन्सान से ज़्यादा सामान समझते हैं। हमारे समाज में रेप जैसी घटनाओं का जिम्मेदार, अपराधी को नहीं बल्कि अपराध झेलने वाली लड़की को बना दिया जाता है। लड़कियों का आचरण, उनके पहनावे से, खान-पान से, दोस्तों से, घूमने-फिरने से, और देर रात काम करने से तय किया जाता है।
हमारे समाज मे हर गाली महिलाओं पर ही होती है, महिला चाहे किसी भी जाति की हो, उससे कोई ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता है। शादी के लिए लड़की को घर के काम आने चाहिए, वो पढ़ी-लिखी होनी चाहिए, उसकी किसी दूसरे लड़के से दोस्ती नहीं होनी चाहिए, उसके जीवन में उसने कभी प्यार या शारीरिक संबद्ध नहीं बनाए होने चाहिए – इन शर्तों पर शादियाँ, दहेज के साथ तय होती हैं। कितने ही ऐसे मामले है जहाँ बेटी का पिता खुद एक ऊँची गद्दी या पद का अधिकारी होता है, पुलिस कमिश्नर होता है या उच्च न्यायालय का न्यायधीश, मगर खुल्लम-खुल्ला दहेज दिया और लिया जाता है।
शादी की बात करें तो कितने ही ऐसे घरेलू हिंसा के मामले हमारे सामने अक्सर आते हैं जहां पति अपनी बीवी का रेप करता है या उसे उत्पीड़ना देता है, मगर पुलिस केस दर्ज करने की जगह सुलह कर देती है और सामाजिक दबाव के कारण औरत की आवाज़ निकलती ही नहीं है।
तेलंगाना में, एक 22 वर्षीय महिला को उसके माता-पिता ने जाति के बाहर के व्यक्ति से शादी करने के लिए मार डाला था। 2012 में, देश की राजधानी दिल्ली में भयानक निर्भया सामूहिक बलात्कार ने न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में सरकार को बलात्कार विरोधी कानूनों से आगे निकलने के लिए मजबूर किया। हालांकि, इन कानूनी संशोधनों ने महिलाओं के उत्पीड़न को कम नहीं किया है। आज भी, महिलाओं के खिलाफ हिंसा हमारी सड़कों, सार्वजनिक परिवहन, आदि में जारी है। भारत रीति-रिवाजों, धर्मों, मानदंडों, लोक कथाओं, आदि की भूमि है, जहां पार्वती, दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी देवी के रूप में पूजा की जाती है। दूसरी ओर, महिलाओं को कई प्रकार की शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता है।
ये घटनाएँ न केवल महिलाओ की दुर्गति करती हैं, बल्कि उनके विकास मे भी अवरोधक हैं। दिल्ली हो या मुंबई आज छोटे शहरों के अभिभावक अपनी बेटियों को बड़े शहरों से बचाना चाहते हैं। जैसे वो शहर बेटियों को खाने को मुंह-बाएँ तैयार हो। बड़े शहरों की बात तो दूर अभिभावक ये तक नहीं चाहता कि उनकी बेटी मोहल्ले में किसी से दोस्ती करे या उसका किसी के घर आना-जाना हो। परेशानी तो यह है कि ऐसे व्यवहार से ये महिला-पुरुष के बीच सामाजिक अंतर और बढ़ता जा रहा है। लड़के-लड़कियां एक दूसरे को समझने की जगह एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। अभी के समय मे किशोर भी इतने डरे हुए हैं कि किसी भी लड़की से मिलते हैं तो उसे बहन या दीदी बोल देते हैं, जिससे कोई उनके रिश्ते पर शक न करे या उन्हें कोई जवाब न देना पड़े। ये माहौल काफी खतरनाक है, जहां सहनशीलता ओर मज़ाक की जगह छेड़-छाड़ और बदतमीज़ी ने ले ली है।
भारत में, लिंगभेद पीढ़ियों से मौजूद है। लैंगिक समानता एक विश्वास है कि पुरुषों और महिलाओं दोनों को समान अधिकार और अवसर प्राप्त होना चाहिए, जो नहीं होता है। भारतीय परिवार में एक महिला के रूप में जन्म लेने के कारण, उसे सभी स्तरों पर लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। भोजन तैयार करना महिलाओं का कर्तव्य है, महिलाओं को रोज़ाना उठना पड़ता है और घर का काम करना पड़ता है।
बलात्कारलैंगिक समानता को प्राप्त करने के लिए महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हानिकारक प्रथाओं को खत्म करने की आवश्यकता होती है, जैसे कि एसिड अटैक, जबरन वेश्यावृत्ति, यौन हिंसा आदि। एक सर्वेक्षण के अनुसार, मुंबई एक असुरक्षित शहर है; हालाँकि, गोवा सबसे सुरक्षित शहर है। पुलिस को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस स्टेशन महिलाओं की शिकायतों का स्वागत कर रहे हैं। भारत में बलात्कार, महिलाओं के खिलाफ चौथा सबसे आम अपराध है।
बलात्कार के अलावा सबसे ज्यादा कुंठा महिलाओ के गर्भधारण से संबंधित है, जहां बच्चा कब होगा, कैसे होगा, कितने बच्चे होंगे, बच्चे के जन्म मे कितना अंतराल होगा आदि फैसले घर के मर्द करते हैं। 2019 मे उत्तरप्रदेश में ही 18000 औरतों की मौत इसलिए हो गई क्यूंकि उनका समय से इलाज और सही टीकाकरण नहीं हुआ था। कई अस्पतालों मे महिलाओं को चीर-फाड़ कर बच्चे की जान बचाई जाती है, सिर्फ इसलिए क्यूंकी बच्चा लड़का होता है। ऐसी मानसिकता महिलाओ के मन को इतना कमज़ोर बना देती है कि वो अपने जीवन से समझौता कर लेती है और हम दावा करते हैं कि महिलाएं खुश व स्वस्थ हैं। न उनका मानसिक स्वास्थ देखा जाता है न ही उनकी इच्छा पूछी जाती है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2013 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2012 में पूरे भारत में 24,923 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए थे। इनमें से 24,470 पीड़ितों के अपराधी (मामलों का 98%) ज्ञात थे। बलात्कार के मामलों में कमी नहीं आ रही है, 2018 में 30,000 से अधिक बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट की गई और 4 में से केवल 1 अपराधी को दोषी ठहराया गया। जम्मू-कश्मीर के कठुआ के पास रसाना गांव में आठ साल की बच्ची के अपहरण, बलात्कार और हत्या का भयानक मामला सामने आया। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल एसिड हमले का अपराध करने वाले राज्यों की सूची में सबसे ऊपर हैं।
हमारे युवाओ को, उनके अभिभावकों को, कर्तव्यवाहकों को, अध्यापकों को ये समझना बहुत ज़रूरी हो गया है कि इंसान के जीवन मे शिक्षा का बड़ा महत्व है और शिक्षा ही एकमात्र ऐसा साधन है जो लैंगिक भेदभाव, लैंगिक हिंसा, ओर लैंगिक अपराध को रोक सकता है। हमे अपने समाज को जटिल नहीं, बल्कि सहज बनाना है जहां युवाओं को बात करने का अवसर मिले। भिन्न लिंग आपस मे सहजता से दोस्ती करें ओर एक दूसरे को समझे। हम लड़कों को, लड़कियों से काटकर कभी एक सक्षम देश नहीं बना पाएंगे। हमारे युवाओं की सोच खुल रही है, हमे उनका दिलखोल कर स्वागत करना चाहिए और अपने डर और मान्यताओं को बदलने का प्रण लेना चाहिए।


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