वन विभाग से त्रस्त हैं उत्तराखंड की सानिया बस्ती के लोग

महिपाल सिंह:

(2019 की फील्ड विज़िट रिपोर्ट के अंश)   

5 सितंबर 2019 की सुबह 6 बजे, ऋषीकेश से गोपाल भाई और मैं, उधम सिंह नगर ज़िले के नेपाल की सीमा से लगे खटीमा ब्लॉक में स्थित सानिया बस्ती नामक गाँव के लिए निकले। शाम को तकरीबन 8 बजे हम दोनों बनबसा हाईवे के पास पहुंचे जहां से वन रावत समुदाय के दो लोग हमें लेने आए। उनके साथ हम लोग उदय जी के घर पहुंचे और रात को उनके ही घर पर रुके। आर्मी से रिटायर्ड उदय सिंह, काफी हंसमुख और शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं और अपनी पत्नी के साथ सानिया बस्ती में रहते हैं। उनका दो कमरों का एक छोटा सा घर है, जिसमें दो बकरी भी साथ रहती हैं। 

सानिया बस्ती, वन रावत बस्ती, झाड़ी नौला और विलहरी नौला उत्तराखंड के उधम सिंह नगर ज़िले के खटीमा ब्लॉक की विलहरी ग्राम सभा के अंदर आते हैं। इन गांवों में लगभग 318 परिवार रहते हैं जिनमें सामान्य, वन रावत, और पिछड़ी जातियों के लोग हैं। सभी लोग आजीविका के लिए मुख्यतः खेती और पशुपालन पर ही निर्भर हैं। यह सभी वन ग्राम हैं, और खटीमा स्थित मुख्य हॉस्पिटल से लगभग 14 किमी की दूरी पर हैं। यहाँ से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 6 किमी दूर है व प्राथमिक स्कूल और कॉलेज लगभग 4 किमी दूर हैं।

लगभग 2 किलोमीटर के क्षेत्रफल में बसे सानिया बस्ती में 34 परिवार निवास करते हैं। इसके दक्षिण में शारदा नहर बहती है और उत्तर की ओर रेलवे लाइन है। शारदा नहर नेपाल से निकल कर बनबसा होते हुए यहां से गुज़रती है, इस कारण यहां की ज़मीन बहुत ही उपजाऊ है। 1975-76 में बसे इस गांव में रहने वाले सभी लोग पहाड़ी क्षेत्र की प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए यहाँ आकर बसे थे। यह बस्ती पहले एक ग्राम पंचायत से जुड़ी थी, लेकिन बाद में राजस्व गांव नहीं होने के कारण, इसे ग्राम पंचायत से बाहर कर दिया गया। बस्ती के उस समय के स्थानीय नेता जीत राम जी द्वारा इसे बसाया गया था। उस समय यहाँ की देख-रेख भी जीत राम जी ही करते थे, क्योंकि इनके अलावा और कोई भी इस गांव में पढ़ा-लिखा नहीं था।

2006 में जब देश में वन अधिकार कानून लागू हो चुका था, तो इस बारे में गाँव के किसी भी व्यक्ति को जानकारी नहीं थी। उस समय भी वन विभाग ने यहाँ रह रहे लोगों को भगाने की कोशिश की थी। साथ ही इस ज़मीन पर सिंचाई विभाग ने भी अपनी दावेदारी पेश की थी। सन 20 07 में परेशान होकर लोगों द्वारा ज़िला अधिकारी, कुमाऊँ कमीशनरी और केन्द्र सरकार को बंदोबस्ती ऑर्डर का पत्र लिखा। इसके चलते एसडीएम खटीमा ने अपने स्तर पर वन विभाग खटीमा को पत्र लिख, पूरे खसरा खतौनी तथा नज़री नक्शे को पेश करने का आदेश दिया। लेकिन वन विभाग और सिंचाई विभाग दोनों में से किसी भी विभाग का कोई कर्मचारी वहाँ नहीं आया। 

उदय सिंह जी, उत्तराखंड वन पंचायत संघर्ष मोर्चा के साथ मिलकर वन विभाग के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। सानिया बस्ती के लोग “वन पंचायत संघर्ष मोर्चा” के साथ 2003 से 2011 तक जुड़े थे। अधिक दूरी की वजह से और जिन मुद्दों पर संगठन काम कर रहा था उन मुद्दों के खत्म होने से, सानिया बस्ती के लोगों का संगठन से जुड़ाव बाधित रहा। अप्रैल 2018 में, जब वन विभाग के द्वारा लोगों को हटाने का मामला उठा, तब लोगों ने पुनः संगठन से संपर्क किया। इसके चलते लोगों और संगठन ने नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दर्ज करवाई और लोगों के वनाधिकार को लेकर पैरवी भी की गई। 

उदय जी बताते हैं, स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद 10 जून 2017 को सुबह 7 बजे, एसडीओ बाबू लाल, रेंजर वीरेंद्र बिष्ट और वन विभाग के अधिकारी, ट्रेक्टर, जेसीबी मशीन और पुलिस फ़ोर्स के साथ उनके इलाके में आए थे और गेहूँ की फसल को बर्बाद कर दिया था। इस घटना में, पुलिस ने स्थानीय लोगों के साथ मारपीट की, जिसमें कई महिलाओं को गंभीर चोटें भी आई। इसकी शिकायत दर्ज करवाने जब लोग खटीमा थाने गए, तो रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। इसके विपरीत, वन विभाग द्वारा 15 महिलाओं और 16 पुरुषों के ऊपर फ़र्ज़ी केस दर्ज किए गए। बस्ती में रहने वाली पार्वती देवी, इन्हीं महिलाओं में से एक हैं। वह अपनी बेटी को लेकर चिंतित हैं, क्यूंकि इसी वर्ष उनकी बेटी की शादी है और बेटी का नाम भी उस मुकदमे में दर्ज है। पार्वती का कहना है कि उनकी बेटी उस दिन दिल्ली में अपने काम पर थी। लोगों और संगठन के प्रयासों के चलते, 2019 में नैनीताल हाईकोर्ट से इस मामले में मिले स्टे-आर्डर के बाद लोगों को काफी राहत मिली। 

आज सानिया बस्ती के लोगों के घरों के आगे की 30 मीटर ज़मीन छोड़कर, बाकी सभी खेती की ज़मीन पर वन विभाग ने कंटीले तारों का घेरा लगा दिया है। इस कारण लोगों की पूरी खेती खत्म हो गई है, और अधिकांश पुरुष गाँव से बाहर जाकर अपनी आजीविका तलाश रहे हैं। अब इस गाँव में अधिकतर महिलाएं और बच्चे ही हैं।

वन विभाग द्वारा की जा रही तार फेंसिंग

पहले बीती घटनाओं की चर्चा करते हुए, उदय सिंह जी बताते हैं, कि 19 जनवरी 2015 को, वनाधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत वन रावत बस्ती, सानिया बस्ती, और झाड़ी नौला, के लोगों के कुल 101 दावे भरे गए थे, जिन्हें समाज कल्याण कार्यालय खटीमा में जमा कराया गया। जब यह बात यहाँ के स्थानीय नेता और वन विभाग के रेंजर को पता चली, तभी से यहाँ के रेंजर वीरेंद्र बिष्ट द्वारा लोगों को बार-बार परेशान किया जा रहा है। इस सब से परेशान होकर लोगों ने रेंजर के खिलाफ, वन अधिनियम 2006 के अंतर्गत, नैनीताल हाईकोर्ट में मुकदमा भी दर्ज करवाया था। 

उदय जी आगे बताते हैं कि इन बस्तियों के 101 दावे जो जमा किये गए थे, जिन्हें तत्कालीन एसडीएम रिचा सिंह और एसडीओ नवीन चंद ने पास कर, उपखंड समिति के पास जमा करा दिया गया था। इसी बीच एसडीएम रिचा सिंह का तबादला हुआ और नए एसडीएम विजय नाथ शुक्ला उनकी जगह आए। उदय जी बताते हैं कि रेंजर और सरकारी विभाग के अधिकारियों ने मिलकर सभी दावों को 27 जून 2016 से लेकर 29 जून 2019 के बीच, गायब कर दिया। इस कारण, यहाँ के लोगों ने संगठन के साथ मिलकर फिर से 54 दावे भरे। 

2 जुलाई 2019 को समाज कल्याण विभाग द्वारा सूचित किया गया, कि सभी 101 दावे मिल गए हैं। इनमे से 9 दावे जो वन रावत के हैं, वो पास भी किए गए हैं। जबकि बाकी के 92 दावे उपखण्ड समिति, खटीमा में ख़ारिज कर दिए गए हैं। बाकी दावे किस आधार पर खारिज किए गए का सवाल जब उठाया, तो जवाब मिला कि जब तक 1930 का कोई प्रमाण लोगों द्वारा नहीं दिया जाता, तब तक कोई दावे पारित नहीं किए जाएंगे। 

गाँव के लोगों से मीटिंग के बाद, मैंने एक सवाल किया, कि आप लोग इस लड़ाई को क्या आगे लड़ना चाहते हो? तो पार्वती जी कहती हैं, कि कैसे लड़े हम लोग! सभी पुरुष काम के लिए शहर चले गए हैं, और गाँव में केवल महिलाएं और बच्चे ही हैं। बच्चे सुबह स्कूल जाते हैं। स्कूल में बच्चों को मध्यान्ह भोजन में कुछ खाने को मिल जाता है, जिससे बच्चे भूखे नहीं रहते। इससे हमारा एक समय का खाना बच जाता है, शाम का पता नहीं रहता, खाना मिलेगा भी या नहीं।

Author

  • महीपाल, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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