ଜଲ ଜଂଗଲ ଜମୀନ୍ ଆମର ମାଁ ବୁଆ | जल, जंगल, ज़मीन हैं मां बाप हमारे

ଲୋଚନ ବରିହା (लोचन बरिहा): ଜଲ ଜଂଗଲ ଜମୀନ୍ ମାଁ ବୁଆ ରେ ଆମେ ଇ ମାଟିର ଛୁଆ ଜଂଗଲ ହେଉଛେ ଆମ୍ କେ ସାହାରେ ଆମେ ଇ ମାଟିର ଛୁଆ।।  ରାଜୁତି କାଲରେ

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कहाँ चले गए साकची (जमशेदपुर) के आदिवासी ?

संजय बाड़ा: ’30 साल पहले टाटा स्टील में आदिवासी मज़दूरों की संख्या करीब 29 हज़ार थी, जो अब घटकर लगभग 1900 हो गई है।’ यह

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हरेली त्यौहार, संगठन कार्यकर्ता पर फर्जी कार्रवाई और आदिवासियों की ज़मीन से बेदखली पर छत्तीसगढ़, म. प्र. और बिहार से स्थानीय खबरें

गाँव-गाँव में मनाया गया हरेली त्यौहार  -(छत्तीसगढ़) हरेली छत्तीसगढ़ी लोक परंपरा व संस्कृति का पहला राजकीय त्यौहार है। हरेली इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि इस

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आज भी हमें डर है – कविता

जेरोम जेराल्ड कुजूर: आज भी हमें डर है।हमारी ज़मीन पर,हम खुशहाल थे,धान, मडुवा, गोंदली, मकई सेलहराते थे हमारे खेत,देख हम सभी,संग झूमते- नाचते थे अखरा

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