हरेली त्यौहार, संगठन कार्यकर्ता पर फर्जी कार्रवाई और आदिवासियों की ज़मीन से बेदखली पर छत्तीसगढ़, म. प्र. और बिहार से स्थानीय खबरें

  1. गाँव-गाँव में मनाया गया हरेली त्यौहार  -(छत्तीसगढ़)

हरेली छत्तीसगढ़ी लोक परंपरा व संस्कृति का पहला राजकीय त्यौहार है। हरेली इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि इस त्यौहार के माध्यम से कृषक अपनी जीविका के साधन को तैयार करता है, जिससे उसका घर-गृहस्थी-जीवन आसानी से चल सके। बारिश के मौसम में कृषक अपनी जीविका के साधन के लिए अन्न उपज करने हेतु अपने खेतों में हल लगाते हैं। ज़्यादातर कृषक धान (चावल) की फसल की रोपाई एवं बयासी करते है। यह महीना आते-आते गाँवो में चारों तरफ हरियाली ही हरियाली का माहौल रहता है, इसीलिए इसे हरेली का त्यौहार कहा जाता है। 

त्यौहार के दिन अलग-अलग कृषि यंत्र जैसे हल (नांगर), कुदारी, रापा, बौसला, टंगिया, गैती, आदि औज़ारों का पूजा-पाठ करते हुए प्रमुख रूप से चावल से बना हुआ पकवान (चिला) चढ़ाया जाता है। गाँवो के सभी घरों में प्रमुख रूप से  ग्राम देवताओं को पूजा जाता है व गाँव के सभी जानवरों जैसे गाय, बैल, बछड़ा, भैसा आदि सभी को गेहूं से बना कच्चा (लोंदी) खिलाते हैं। लोहार समुदाय के लोगों द्वारा सभी के घरों के मुख्य दरवाज़े में कील ठोका जाता है व यादव समुदाय के लोगों के द्वारा सभी घरों में नीम की डाली लगायी जाती है, ताकि घर में सुख-शांति बनी रहे।

होमदत्त

हरेली त्यौहार छत्तीसगढ़ में सावन मास की अमावस्या के दिन को मनाया जाता है। इस साल मेरे गाँव में यह 08 अगस्त को मनाया गया। धान बुवाई हो जाने या रोपाई होने के बाद गाँव में सब तरफ हरियाली होती है, जिससे इसका नाम हरेली पड़ा है। इस दिन पूरे घर की सफ़ाई करी जाती है। गोठान में गाय, बैलों और बछड़ों को गेहूं से बने लड्डू खिलाते हैं। खेतों और घरों में नीम की टहनी लगायी जाती है, जिससे खेत और घर दोनों स्वच्छ रहें। इस दिन कृषि उपकरण जैसे- हल, ट्रेक्टर, कुदाल, रापा आदि को धोकर उनकी पूजा की जाती है। पूजा में चिला रोटी बनाकर – नारियल के साथ उसको चढ़ाते हैं। इस दिन लड़के गेंदी बनाकर उसमें चढ़कर चलते हैं। छत्तीसगढ़ में गाँव के वैद्य द्वारा करुहा कांदा को उबाल कर बड़े-छोटे सबको खाने को देते हैं। ताकी सब स्वस्थ और अच्छे से रहें। खेतों में सिर्फ धान से घास को निकालने का काम करते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में मूलनिवासी और खेती-किसानी करने वाले सभी समुदायों के लोग इस त्यौहार को मनाते हैं।

दुर्गा


  1. बड़वानी के आदिवासियों ने ज़िला प्रशासन को सौंपा कारण बताओं नोटिस -बड़वानी, (म.प्र.)

बड़वानी जिला प्रशासन द्वारा सामाजिक कार्यकर्ता वालसिंग सस्ते को जिला बदर किए जाने की कार्रवाही हेतु कारण बताओ नोटिस सौंपा था। स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और आदिवासियों ने इसे संवैधानिक अधिकारों के संघर्ष को दबाने की कोशिश करार कर, इसका कड़ा विरोध किया।  दिनांक 03.08.21 को 2500 हजार से भी ज्यादा आदिवासियों द्वारा वरिष्ठ आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता वालसिंग सस्ते के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाही के अंतर्गत निकाले गए कारण बताओं नोटिस का अनोखा ‘जवाब’ दिया – जिसमें आदिवासियों ने ज़िला प्रशासन को कारण बताओ नोटिस सौंपकर शासन-प्रशासन से पूछा कि आदिवासियों को उनके संवैधानिक एवं मूलभूत अधिकारों से वंचित रखने के गुनाह के लिए ज़िला प्रशासन के विरुद्ध जिला बदर की कार्यवाही क्यों न की जाए?

वालसिंग सस्ते पिछले 25 सालों से आदिवासियों के हक एवं संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर शांतिपूर्ण रूप से संघर्ष कर रहे हैं। वालसिंग जैसे कार्यकर्ताओं एवं समाज के सतत आंदोलनों के कारण ही आज रोज़गार गारंटी अधिनियम, खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे जन हितौशी क़ानूनों का क्रियान्वयन हो पाया है ।

– युवानिया डेस्क

क्या है पूरा मामला, जानने के लिए पढ़ें – JADS: तो क्या बड़वानी जिला प्रशासन को किया जाएगा जिला बदर?

संगठन द्वारा जारी करे गए ज्ञापन और प्रेस विज्ञापन की प्रति को ज़रूर पढ़ें। ज्ञापन में क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक-स्वास्थ्य-शिक्षा जैसे एहम मुद्दों पर साझा की गयी जानकारी –

विरोध प्रदर्शन में अपनी बात रखते हुए संगठन के साथियों को सुनें – 

आदिवासी कार्यकर्ता पर हुए फर्जी जिला बदर कार्यवाही के खिलाफ एकजुट हुए बड़वानी के आदिवासी

आदिवासी शिक्षा मांगे, राशन मांगे, अस्पताल मांगे तो जिला बदर! हम यहां मालिक है – तुम हो जाओ जिला बदर!


  1. दशकों से गया ज़िला के गुरपा जंगलों में बसे आदिवासियों का अपने अधिकारों के लिए जारी है  संघर्ष -मोहनपुर, ज़िला गया (बिहार)

बिहार सरकार, आज तक भी राज्य के आदिवासियों को नज़रंदाज़ कर रही है। साल 2000 में हुए राज्य के विभाजन के बाद, झारखण्ड के खुंटी ज़िले में अत्यधिक गरीबी और भीषण गर्मी के कारण वहां बसे आदिवासी परिवार गुरपा के जंगलों में आकर बसने लगे। 2 पीढ़ी से ज़्यादा समय से बसे आदिवासी समुदाय के यह लोग, अपनी जाति, पहचान और जिस ज़मीन में रहते आए हैं, उस पर अपना मालिकाना हक़ दर्ज़ करने हेतु अंतहीन संघर्षों में लगे हुए हैं। जंगल और गाँव के आस-पास बसे दबंग लोग समय-समय पर इन गाँवों में जाकर लोगों को धमकाते हैं और बल के इस्तेमाल से उनकी ज़मीनों पर जबरन कब्ज़ा कर लेते हैं। ऐसे में लोगों के पास विकल्प के तौर पर अपने खून-पसीने से की गयी खेती-बाड़ी को नष्ट होते देखना रह जाना है, या फिर सब सामान बाँधकर कोई दूसरा ठिकाना ढूँढने के प्रयास में लग जाना है। 

इन घने जंगलों में लगभग 12 गाँव बसे हैं। केन्द्रीय सरकार द्वारा पारित वन अधिकार अधिनियम के तहत सभी गाँववासी व्यक्तिगत और सामूहिक ज़मीनों पर अपना दावा फॉर्म भरना चाहते हैं, ताकि जोत की ज़मीन पर वो अपना मौलिक अधिकार दर्ज़ कर सकें। परन्तु अड़चने तब शुरू होती हैं जब लोगों को पहचान पत्र के रूप में अपना जाति प्रमाणपत्र जमा करना होता है। गाँव में कुछ गिने-चुने लोग ही आज तक अपना जाति प्रमाण पत्र बनवा पाए हैं। गया ज़िले के संगठन मज़दूर किसान समिति द्वारा की गई पहल, और प्रशासन पर दबाव के चलते कुछ गिनती भर लोगों का ही मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड बन पाया है।

– युवानिया डेस्क

पूरा मामला जानने के लिए इस विडियो को ज़रूर देखें: 

दशकों से गुरपा, गया के जंगलों में बसे आदिवासियों को आखिर कब मिलेगा अधिकार


  1. पारंपरिक बीजों के संरक्षण की पहल -सेंधवा, बड़वानी (मध्य प्रदेश)

केवल कृषक समुदायों के लिए ही नहीं, सभी मानव मात्रों के लिए बीजों का अनन्य साधारण महत्त्व है। बीजों को संजोने का काम पारंपारिक रूप से किसान महिलाओं के ज़िम्मे रहा है और उन्होंने उसे बख़ूबी निभाया भी है। खाद्यान्न फसलों की अनेक किस्में एक समय हमारे क्षेत्र के आदिवासी किसानों  के पास उपलब्ध थीं।  मिट्टी  के अलग-अलग प्रकार और बारिश की उपलब्धता के हिसाब से बीजों की किस्म को चुनकर बोया जाता था। गत वर्ष हमने रेनफेड एग्री नेटवर्क के साथ मिलकर किये विस्तृत सर्वे में पाया था कि जुवार की 15 किस्में, मक्का की 5 किस्में, बिना सिंचाई से पकने वाला (अब दुर्लभ  हो चुका) गेहूं, मिलेट (मोटा अनाज), दालें और तिलहन (ऑइलसीड) की अनगिनत किस्में पश्चिम मध्य प्रदेश के हमारे क्षेत्र में बोयी जाती थी। नब्बे के दशक तक इनको बोया जा रहा था। हरित क्रांति के साथ आये हाइब्रिड (संकर प्रजाति के) बीजों के चलते, हमारी बीजों की ये धरोहर विलुप्ती के कगार पर पहुंच चुकी है।आज भी दूर-दराज के पहाड़ी क्षेत्र में कहीं-कहीं ये बीज बोये जाते हैं।

हमारे सामने खड़े जलवायु संकट के साथ अनियमित बारिश का हम सभी अनुभव कर रहे हैं। ऐसे समय में हमारे इन पुराने बीजों का जो क्लाइमेट रेसिलिएंट (विपरीत परिस्थियों को झेल लेने वाले) थे, का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। इसलिये इन्हें बचाने की सख्त जरूरत को हम महसूस कर रहे हैं। आधारशिला शिक्षण केंद्र में पिछले 20-22 वर्षों से हमने इन पारंपारिक बीजों को संजोने का काम कर रहे हैं। अब हमने इसे और व्यापक रूप देने की योजना बनायी है। जहां भी किसानों के पास ये बीज बचे हैं, वहाँ से लाकर अन्य इच्छुक लोगों को बोने के लिए देना, खास कर कि महिला किसानों को इसके लिये प्रेरित करना और ग्राम साकड़ (ज़िला बडवानी) के आधारशिला  शिक्षण केंद्र  के खेत और गुलवट (ज़िला अलीराजपुर) के खेडुत मज़दूर चेतना संगठ के खेत पर इन सभी दुर्लभ हो चले बीजों  को बोना और उसका प्रचार-प्रसार करना हमारा मकसद है। इस मानसून के साथ हमने अपनी योजना पर अंमल करते हुए बड़वानी, धार, अलीराजपुर के हाटों का दौरा किया। मानसून आने पर यहां के हाटों में  किसान अपने पास उपलब्ध बीज बेचने आते हैं, जहां कई बार दुर्लभ बीज मिल जाते हैं। इस बार मानसून के देर से आने की वजह से जुलाई के आखिर तक बाज़ारों में ये बीज कहीं-कहीं मिलते रहे और हम इन्हें बटोर पाये। साथ ही साकड़, सेगी, भूरा कुआं, सुराणी (ज़िला बड़वानी) और  सेमलानी, चौकी (ज़िला अलीराजपुर) की महिलाओं से भी बीज एकत्र किये।

जयश्री

Authors

  • दुर्गा, छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वर्तमान में दुर्गा, दलित आदिवासी मंच के साथ जुड़कर काम कर रही हैं और संगठन का लेखा-जोखा भी संभालती हैं।

  • होमदत्त, छत्तीसगढ़ के रायपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वर्तमान में वह जन अभिव्यक्ति नामक सामाजिक संगठन के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं।

  • जयश्री, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाती हैं।

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