आज भी हमें डर है – कविता

जेरोम जेराल्ड कुजूर:

आज भी हमें डर है।
हमारी ज़मीन पर,
हम खुशहाल थे,
धान, मडुवा, गोंदली, मकई से
लहराते थे हमारे खेत,
देख हम सभी,
संग झूमते- नाचते थे अखरा में।

हमारी ज़मीन पर,
सेना ने परेड किया,
लहराते खेत में गिरे तोपों के गोले,
जल गई धान,
जल गए मडुआ, गोंदली व मकई के खेत।
चोरी कर ली गई हमारी मुर्गियाँ।
लुट गई माँ-बहनों की आबरू,

हमारी ज़मीन पर,
उनको थी गिद्ध दृष्टि,
अब बनेगी छावनी,
छोड़ें जाएंगे तोपों के गोले,
ली जायगी हमारी ज़मीन,
छूटेगी संस्कृति, टूटेंगे रिश्ते,
मिट जाएगा हमारा अस्तित्व।

अब बचा एक ही रास्ता,
जान देंगे, ज़मीन नहीं।
लड़ेंगे जीतेंगे,
तभी बचेगी हमारी,
जल, जंगल, और ज़मीन।
तभी बचेगा हमारा अस्तित्व।
चुना हमने संघर्ष रास्ता,
फूंका बिंगुल विरोध का।

तब उन्होंने कहा- 
हमारी ज़मीन पर, 
अब करते हैं नक्सली परेड। 
फिर सुनाई कानो में बूटों की आवाज़,
अब परेड करती है सी.आर.पी.एफ. की टुकडियाँ।
अब जगह-जगह नजर आते पुलिस पिकेट, 
लगता है हमें घेरा गया है।

आज भी हमें डर है।
अब वे कहते हैं,
आपकी ज़मीन पर, 
करेंगे हाथी, बाघ, भालू, परेड।
कल तक जो अखरा में, 
मेरे संग साथ नाचते थे।
लोग कहते हैं, 
अब वे तुम्हें रौंदेंगे,
घेरेंगे तुम्हारी ज़मीन,
फिर लूटी जाएगी पूर्वजों की धरोहर,
मिट जाएगा हमारा अस्तित्व,

अब बचा एक ही रास्ता,
जान देंगे, ज़मीन नहीं।
लड़ेंगे जीतेंगे।

फीचर्ड फोटो आभार: बीजू टोप्पो

Author

  • जेरोम कुजूर, झारखण्ड के लातेहार ज़िले से हैं। वह केंद्रीय जन संघर्ष समिति के साथ जुड़कर आदिवासी समुदायों के अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं।

One comment

  1. लातेहार के आदिवासियों के जीवन के यथार्थ को यह कविता एकदम सटीक बयान करता है। वाकई आदिवासियों के पास एक ही रास्ता बचा है – संघर्ष का रास्ता।

    हम लड़ेंगे, जीतेंगे और जीएंगे। जुल्मों के समक्ष झुक जाना हमारी फितरत नहीं।

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