नीतिशा खलखो:
डोलमा। दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने आई अरुणाचल प्रदेश की एक छात्रा डोलमा की कहानी, जो जन्म से अंधेपन की शिकार है। क्लास में तीन वर्षों तक पढ़ने के बाद भी उसकी ख़ामोशी उसकी शिक्षिका को परेशान कर रही थी। एक दिन शिक्षिका ने क्लास में अन्य विद्यार्थियों को न पाकर उससे कहा कि बतौर शिक्षक वह हारा हुआ महसूस कर रही है, क्योंकि वह डोलमा को बोलना नहीं सीखा पाई। यह कहते हुए वह भावुक होकर रोने लगी। कई बार उस शिक्षिका की कोशिश होती थी कि विद्यार्थी अपने आप को एक्सप्रेस करना सीखें, क्योंकि दुनिया की सारी मुकम्मल जगहों में इन्हें बोलकर और आत्मविश्वास से ही तो पहचान मिलनी थी। इसी कोशिश का परिणाम था कि ये बातें यहाँ क्लासरूम में दो के बीच घटित हो रही हैं।
इस पर आज डोलमा का मौन व्रत जैसे टूटा और वह पहली बार खुलकर अपनी शिक्षिका से बात करने लगी। उसने अपनी शिक्षिका से कहा, “आप बतौर टीचर अन्यतम हैं। आपने मुझे बहुत प्रेरित किया, मुझ पर बहुत मेहनत की, पर मैं अपने जीवन में घटित… (एक लंबी चुप्पी, बस होंठ बोलने से पहले काँप रहे हैं) उस घटना से व्यथित हूँ, जो मुझे जीने नहीं दे रही है।”
शिक्षिका ने डोलमा के हाथ अपने हाथों में लिए। अपने सहज स्पर्श से उसने उसे सहज किया और कहा, “तुम बोल सकती हो। यह मेरे लिए अद्भुत पल है, क्योंकि मैंने बहुत साल तुम्हारे बोलने का इंतज़ार किया है, डोलमा। अगर इच्छा हो, विश्वास हो, तो दोस्त समझकर मुझे हर बात शेयर करो। शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूँ।”
शिक्षिका ने डोलमा का हाथ कसकर दबाया, जैसे वह डोलमा को सुरक्षा देना चाहती हो। डोलमा कुछ पल खामोश रही। उसकी भौहें तन गईं। उसके चेहरे के हाव-भाव बदल गए। गला रूँध गया। होंठ आपस में उलझने लगे, फिर उसने अपने अंदर का सारा समुद्र समेटा। वह बोल उठी।
“स्कूल के दिनों में मेरे पापा और मैं ही घर में होते थे। कोई अन्य सदस्य घर में नहीं था। पापा मजदूरी का काम करते, तो घर चलता था। मुझे घर में अकेले रहना पड़ता था।
एक दिन… एक दिन, पापा के जाने के बाद घर में कोई दाखिल हुआ। मैं पूछती रही, कौन है, पर कोई जवाब नहीं आया। फिर अचानक किसी ने मेरे मुँह पर हाथ रखकर मुझे दबोच लिया। मैं छटपटाती रही। छूटने की कोशिश करती रही, पर सब बेकार। कोई मेरे अंधेपन का इस्तेमाल करके मुझसे मेरा सब कुछ छीनकर चला गया। जब मैं होश में आई, तो खुद को बिना कपड़ों के पाया। मैं यह तक नहीं जान सकी कि वह कौन था। कहाँ से आया था? उसका हासिल क्या रहा? और उस दिन से आज तक अपने अंदर घृणा और वितृष्णा लिए जीती आ रही हूँ। मुझे यह घटना जीने नहीं देती।”
यह सब कहते हुए डोलमा अब पस्त-सी दिखाई पड़ने लगी। उसकी बात सुनते हुए शिक्षिका पूरी तरह से स्तब्ध हो चुकी थी। उसे इस बात पर यकीन करने की इच्छा कतई नहीं हो रही थी कि जो उसने अभी-अभी सुना, वह इस नन्ही-सी जान ने भोगा है। उसका दिल अंदर तक रो रहा था। एक नन्ही-सी डोलमा, उस पर उसकी आयु, उसके साथ में उसका अंधापन। छी!
इस दुष्ट दुनिया में उपस्थित ये भूखे भेड़िए… बेरहम-सी यह दुनिया। मन घृणा से भर उठता है। और माहौल एकदम चुप। सन्नाटा पसरा हुआ। जैसे किसी घुप अंधेरे घने जंगल में काली घनी रात हो।
शिक्षिका अपनी तंद्रा को तोड़ती है और डोलमा को गले से लगा लेती है। कुछ पल दोनों साथ में बिल्कुल स्थिर, अपने ग़मों को साझा करती हुईं। पर और भी कुछ है, जो इस प्रसंग के बाद शिक्षिका को डिस्टर्ब कर रहा है। जहाँ डोलमा अपनी अभिव्यक्ति के बाद शांत है, वहीं उस शिक्षिका के माथे की धमनियाँ बहुत ज़ोर-ज़ोर से फड़क रही हैं। शायद स्मृति में कुछ उनके पास भी है, जो कहने के लिए छटपटा रही है। एक ग्लेशियर, जो अभी-अभी टूटा है और विध्वंश की कथा कहते हुए सब कुछ को धराशायी कर आगे बढ़ रहा है, वहीं जज़्बातों का सैलाब अब किसी और के होंठों तक आकर अटका है… कुछ सुगबुगा रहा है, जो कहा जाना है।

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