कोमल:

अब गाँव वह गाँव नहीं रहा जो 30-40 साल पहले हुआ करता था। खेती में मौसम के बदलाव से होते नुकसान और बड़ती लागत ने किसानों और खेतों में काम करने वाले मज़दूरों को पलायन कर जीवन-यापन के लिए मजबूर कर दिया है। इससे पूरा सामाजिक ताना-बाना बदल गया है। खेती के बदलते स्वरूप ने परिवार चलाने के तरीके को भी बदल दिया है। पहले खेती ही परिवार चलाने का साधन थी। हल-बैल, देसी बीज, गोबर की खाद, इन्हीं के सहारे खेती होती थी। पूरा परिवार खेती में लगा रहता था। जो उगता, वही खाते और जो थोड़ा-बहुत बच जाता, उसे बेच भी देते थे। पर अब लागत बढ़ गई है और मुनाफा घट गया है। ट्रैक्टर, डीजल, बीज, खाद, कीटनाशक, ये सभी संसाधन महंगे हो गए हैं, जबकि फसल का दाम कम हो गया है। बंटवारे के कारण ज़मीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट गई है। तीन-चार बीघा ज़मीन से घर नहीं चल पाता। अब खेती की चुनौतियाँ भी बढ़ गई हैं। मौसम बदल जाए तो फसल सूख जाती है, ज़्यादा बारिश हो जाए तो फसल गलकर सड़ जाती है। ऊपर से फसल में बीमारी या कीड़े लग जाएँ, या अनाज का बाज़ार में सही दाम न मिले, तो कर्ज़ की टेंशन अलग बनी रहती है।

नई सोच वाले युवा खेती को घाटे का सौदा मानते हैं। वे पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहते हैं या शहर जाकर काम करना चाहते हैं।

मज़दूरी की स्थिति 

पहले मज़दूरी के बदले अनाज मिलता था। अब नगद पैसा मिलता है और सिर्फ तीन-चार महीने ही खेत में काम होता है। मनरेगा में भी साल में 100 दिन का ही काम मिलता है। काम करने के लिए शहर के मुकाबले गाँव में मज़दूरी आधे रेट पर ही मिलती है। औरतों को तो और कम मज़दूरी दी जाती है। अनेक प्रकार की मशीनें आ जाने पर मज़दूरी की ज़रूरत भी घटती ही जा रही है। मज़दूरी में शोषण, जैसे एडवांस लेकर मज़दूरों को बाँध लेना और ठेकेदारों का कमीशन काटना, आम बात है।

पलायन गाँव से शहर की ओर 

गाँव से शहर की ओर लोग इसलिए ज़्यादा जाते हैं क्योंकि मजबूरी है। खेत छोटे हो गए हैं, कर्ज़ बढ़ गया है और गाँव में रोज़गार न मिलना एक बहुत गंभीर समस्या बन गई है।

शहरों में मज़दूरों की जो बाढ़ जा रही हैं, उनका सपना है कि बच्चों की अच्छी पढ़ाई हो, वह कुछ अच्छा अपने लिए कर पाएँ और गाँव में बड़े लोगों की तरह, उनका भी अपना पक्का मकान बन जाए। उनकी छत से पानी ना टपके, ताकि बरसात में उनको भी पानी की बूँदों से बचते हुए सुकून भरी बढ़िया नींद मिल पाए। 

पहले संयुक्त परिवार में 15-20 लोग साथ रहते थे, लेकिन अब परिवार सिर्फ पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित रह गया है। अपने बच्चों के लिए कुछ बेहतर करने की यही सोच पुरुषों को गाँव से बाहर जाने के लिए धक्का मारती है।

गाँव की चौपाल खत्म हो गई।। चौपाल पर संवाद और गीत-संगीत भी मर गए हैं।  उसकी जगह अब मोबाइल ने ले ली है। यहाँ से ग्रामीण और सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्तों के संबंध ढीले पड़ते जा रहे हैं। ग्रामीण संस्कृति बदल रही है। अभी होली, दिवाली, स्थानीय ग्रामीण मेले, आदि पर आधे से भी कम ही लोग शहर से गाँव में आ पाते हैं। 

खान-पान बदल रहा है। ज्वार-बाजरा की जगह मैगी और बिस्किट ने ले ली। पहले लोग गरीब थे तो अपनापन था। अब पैसा है तो अकेलापन है। गाँव में काम नहीं, शहर में इज्ज़त नहीं। दोनों तरफ से ग्रामीण फंसा हुआ है। जिस सम्मान और प्रेम के लिए ग्रामीण खेतिहर समाज झुझ रहा है, उसको झुझने के अलावा और कुछ भी नहीं मिल पा रहा है।

आज सभ्य समाज को सोचना है कि गाँव से उखाड़ती जवानी के सवालों के लिए उनके पास कोई जवाब है? आज सभ्य समाज को सोचना है कि गाँव में खेती-किसानी करते हुए जीवन जीना भी एक महत्वपूर्ण कार्य है। इसमें लगे लोग भी राष्ट्र निर्माण का कार्य कर रहे हैं। इनकी उपज से ही हमारा खाद्य सिस्टम चल रहा है, तो यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इनके लिए अपने सिस्टम और सोच को दुरुस्त करें। जिससे जियो और जीने दो की संस्कृति और समाज का समावेशी ताना-बाना ठीक से चल सके।

Author

  • कोमल, उत्तर प्रदेश के अयोध्या ज़िले के मेहदौना, मिल्कीपुर की रहने वाली हैं। वे एक किसान हैं और लगभग चार बीघा ज़मीन पर स्वयं खेती करती हैं। रोज़गार के लिए वे दो बार अकेले पंजाब और कश्मीर भी जा चुकी हैं। वर्तमान में वे अवध पीपुल्स फोरम द्वारा संचालित प्रेरणा किशोरी विकास केंद्र का संचालन कर रही हैं। इस वर्ष वे सामाजिक परिवर्तन शाला से भी जुड़ी हैं।

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