रोजालिया तिर्की:
भारत कृषि प्रधान देश है। भारत के अंदर जितने भी राज्य हैं और राज्यों के अंदर छोटे-छोटे ज़िले पाए जाते हैं, वहाँ मौसम के अनुसार अलग-अलग तरह की खेती की जाती रही है। कहीं कम तो कहीं ज़्यादा। लेकिन जहाँ मेहनत और श्रम की बात होती है, वहाँ महिलाओं की भूमिका हर क्षेत्र में ज़्यादा दिखाई देती है।
भारत के अंदर विभिन्न जातियों, धर्मों के लोग निवास करते हैं। भारत विविधता में एकता की पहचान पेश करता है। लेकिन इस देश के समाज में महिला और पुरुष के काम को बाँटकर रख दिया गया है। जैसे घर का छप्पर बनाना और महिलाओं द्वारा हल चलाना वर्जित माने जाते हैं, उन्हें अशुभ समझा जाता है। लेकिन अब इस परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। हमारे जैसे सामाजिक लोग यह बात समझकर इसमें बदलाव की बात करते हैं, लेकिन इतना जल्दी बदलाव नहीं आएगा। गाँवों में अभी भी हल छूने से पानी नहीं बरसेगा (आएगा), ऐसा कहा जाता है, क्योंकि समाज में यह परंपरा पहले से चली आ रही है। इसे तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
खेती के समय जिसके घर में पुरुष नहीं हैं, उसको खेती करने में बहुत दिक्कत होती है। कृषि कार्य में महिला और पुरुष दोनों ही कठिन मेहनत करते हैं, लेकिन महिलाओं की भूमिका अधिक होती है। जैसे रोपनी, कटनी, मिसनी, रख-रखाव, प्रोसेसिंग यानी धान से चावल बनाने की प्रक्रिया, गेहूँ से आटा बनाने की प्रक्रिया में, और तो और खाना बनाकर थाली में परोसने तक भी महिलाओं की ही मुख्य भूमिका होती है।
इतनी मेहनत के बाद भी महिलाओं को किसान का दर्जा नहीं दिया जाता है। जब भी किसान का दृश्य प्रस्तुत किया जाता है, तो वह पुरुष का ही दृश्य हुआ करता है।
जहाँ तक अधिकार की बात है, तो महिलाओं के नाम पर जमीन यानी पट्टा नहीं है, लेकिन पुरुष के नाम के बाद या उनकी संतान के नाम से उस परिवार और घर के अन्न-धन पर उनका अधिकार रहता है। जमीन का उपयोग खेती के लिए कर सकते हैं। क्योंकि आदिवासी क्षेत्र में जमीन विरासत की देन एवं गाँव समुदाय की सामूहिक संपत्ति है। जब तक जीवित हैं, तब तक उसका उपभोग कर सकते हैं।
खेती के बाद जो अन्न पैदा होता है, उसमें महिलाओं का बराबरी का अधिकार है। यह क्षेत्र विशेष के अनुसार अलग हो सकता है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं का पूरा-पूरा अधिकार है। घर भी महिलाएँ ही चलाती हैं और पारिवारिक निर्णयों में महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है।
समाज के अंदर देखा जाए तो महिलाओं की पहचान पुरुषों के द्वारा ही होती है। हमारा देश भी पितृप्रधान देश है। इस देश में पुरुषों के नाम से वंश चलता है। बेटी की पहचान बचपन में पिता के नाम से होती है और शादी के बाद पति के नाम से।

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