राकेश जाधव ‘आरटीजेडी’:

अब बहुत हो गया…
सब्र जवाब दे रहा है,
अब तो दिल भी बेचैन हो उठा है।

कोशिश हमने बहुत की है,
ख़ामोश रहने की।

एक ही तो दोस्त था,
दिनों से उससे भी बात नहीं की।

अपनों से कोई गिला-शिकवा तो नहीं हमारा,
फिर भी राब्ता नहीं हुआ उनसे,
न कोई याद रही।

जीना चाहता था अपनी ज़िंदगी,
ख़ुद पर काम करते-करते।

रातें भी बस बेबस,
काम करते-करते काटी हैं।
दिन तो शुरू ही काम से होता था।

सोचा था, इस तरह दुनिया से छुपकर,
देखे थे जो सपने अपने लिए,
उन्हें एक बेहतर मुकाम दे सकूंगा।

क्या पता था,
इस तरह बंधन टूट जाएंगे।

इस जुदाई में,
हम कब ग़म से जुदा हुए?

पहले तो अपनों से,
फिर जानने वालों से भी जुदा हुए।

दूरियां यहाँ ख़त्म नहीं हुईं,
अब तो मुश्किल से
कभी किसी से,
किसी मौज़ू पर
दो बातें ही होती हैं।
वो भी काम और कारण की मर्यादा से बंधी होती हैं।

और वो सोचते हैं,
कि हम मतलबी हो गए?

घर का ज़िम्मा भी तो
कंधों पर लिए हूँ,
जो मुझे भीतर से
कठोर और गंभीर बना देता है।

अंदर के बच्चे को,
इंसान बना देता है,
जो दूसरों की तरह जिंदादिल होना चाहता है।

घूमना चाहता है,
कॉलेज में दोस्तों के साथ जाकर पढ़ना चाहता है।

दो बातें दुनिया की करके,
ज़ोर-ज़ोर से हंसना चाहता हूँ।

मौजूदा लम्हों की नज़ाकत का
लुत्फ़ उठाना चाहता हूँ।

लेकिन ये ज़िंदगी मुख़्तलिफ़ है मेरी…

जो सकड़ी गाड़ी के घोड़े की तरह है,
मिल में काम करने वाले
उस मामूली मज़दूर की तरह है।
ठीक वैसी ही ज़िंदगी मेरी भी है।

दिल तो करता है,
उनसे वो सब साझा करूँ,
विस्तार से कहूँ…

लेकिन कोई सुनने वाला तो हो,
जो सच में
मेरी बात सुनने की रुचि रखता हो।

उनका सिर हिलाना ही
मेरे लिए काफ़ी है,
लेकिन दिल से।

ख़ुद से ऊब गया हूँ बतियाकर,
थक गया हूँ
ख़ुद के सवालों का जवाब
ख़ुद ही देकर।

डर है इस बात का,
कहीं बातें करना न भूल जाऊं।

जहाँ जवाब मेरा नहीं होगा,
तुक का मेल हो या न हो…

क्या मैं यही ज़िंदगी जीना चाहता था?
अगर हाँ…
तो ये बेचैनी क्यों उठ रही है?

ये आग क्यों
मुझे जला रही है?

बस अब सवाल ही सवाल हैं,
जिनकी सीमा भी
सवालों से घिरी नज़र आ रही है।

जिनका जवाब शायद
मुझे आने वाले सफ़र में मिलेगा,
और शायद नहीं भी…!

Author

  • राकेश, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले के ग्राम देवली के निवासी हैं। वर्तमान में वे बड़वानी ज़िले के शासकीय शहीद भीमा नायक महाविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं साथ ही लेखन कार्य में भी सक्रिय रूप से जुड़े हैं। राकेश, साकड़ के आधारशिला स्कूल के भूतपूर्व छात्र रह चुके है। प्रतिलिपि जेसे प्रसिद्ध प्लेटफार्म पर राकेश की कुछ रचनाएं प्रकाशित हुई हैं।

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