झारखंड में संचालित सामाजिक परिवर्तन शाला के दूसरे बैच के तीसरे शिविर में शामिल एक प्रतिभागी का अनुभव
अजय माझी
JSSC के हमारे दूसरे बैच के तीसरे शिविर के दौरान, हमें डिमना लेक (मिर्जाडीह डैम) के विस्थापन क्षेत्र में आने वाले लैलम गाँव जाने का मौका मिला। वहाँ जाने का हमारा असल मकसद यह समझना था कि डैम बनने से जो गाँव उजड़े हैं, उनकी आज क्या हालत है और अपने हक के लिए उनकी लड़ाई कैसी रही है।
गाँव पहुँचने पर सबसे पहले हमारी मुलाकात ग्राम प्रधान श्री देवेन सिंह जी से हुई। सच बताऊँ तो यह मीटिंग दिलीप जी के कहने पर बहुत ही अचानक बुलाई गई थी। दिलीप जी ने उनसे बस इतना कहा था कि शिविर के कुछ लोग आपसे बात करने आ रहे हैं, और ग्राम प्रधान जी ने तुरंत गाँव वालों को बुला लिया। मुझे हैरानी इस बात की हुई कि इतने कम समय में ही उन्होंने इतनी अच्छी खासी भीड़ इकट्ठा कर ली। आज के वक्त में अचानक से इतने लोगों को एक जगह जमा करना वाकई बहुत बड़ी बात है।
ग्राम प्रधान जी की अध्यक्षता में जब हम बैठे, तो उन्होंने और गाँव के बाकी लोगों ने हमें अपने लंबे संघर्ष की कहानी सुनाई। मुझे वहीं पता चला कि यह डैम असल में टाटा का प्रोजेक्ट है। गाँव वालों ने बताया कि एक वक्त था जब डैम के पास उन पर बहुत सख्त पाबंदियां थीं। गार्ड उन्हें वहाँ नाव ले जाने, मछली मारने या किनारे पर खेती करने तक नहीं देते थे।
लेकिन गाँव वालों ने हार नहीं मानी। यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि अपने जल, जंगल और ज़मीन के हक के लिए लगभग 1800 से ज्यादा लोगों ने एकजुट होकर एक ऐतिहासिक ‘जल सत्याग्रह’ किया था। उसी आंदोलन का नतीजा है कि आज वो पाबंदियां हट गई हैं और अब वे लोग वहाँ खेती कर सकते हैं और डैम के पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
पर इस पूरी विजिट में एक सच्चाई देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। विस्थापित होने के बाद इन गाँव वालों को कंपनी या प्रशासन की तरफ से कोई सुविधा नहीं मिली है। इतने बड़े डैम के ठीक बगल में रहने और इतना लंबा संघर्ष करने के बाद भी, गाँव में आज तक पीने के पानी की कोई ढंग की व्यवस्था नहीं है। ना तो उन्हें उनकी छिन गई ज़मीन का सही मुआवजा मिला है और ना ही टाटा कंपनी की तरफ से गाँव के किसी भी व्यक्ति को कोई नौकरी दी गई है। यह सच में एक बहुत बड़ी विडंबना है।
बातचीत के दौरान एक और बात सामने आई जिसने मुझे अंदर तक हैरान कर दिया। जब इन गाँव वालों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपने हकों की आवाज़ उठाई थी, तो उनकी आवाज़ को दबाने के लिए प्रशासन ने उन्हें ‘माओवादी’ घोषित कर दिया था। अपने हक की बात करने वालों को सीधा माओवादी बता देना बहुत ही अजीब और दुखद था।
गाँव वालों की ये सारी बातें सुनने के बाद, हमारे साथ गए JSSC के नारायण जी और सागर जी ने सभी को बताया कि JSSC असल में क्या काम करती है और हम लोग वहाँ किस लिए गए थे।
बैठक खत्म होने के बाद, हम सभी डैम देखने गए। वहाँ हमने डैम और उसके आस-पास के बदलावों को करीब से देखा और आपस में काफी चर्चा की। जब हम डैम से वापस लौट रहे थे, तो हम सबने मिलकर पूरे जोश के साथ एक गीत गाया (हम तो लड़ेंगे, हम ना डरेंगे यह हाहाकार अत्याचार हम ना सहेंगे)। इस गीत ने हम सभी के अंदर सच में एक नई ऊर्जा भर दी।
गाँव से निकलने से ठीक पहले, हमें डैम के किनारे स्थित अमित महतो जी के फार्म पर भी ले जाया गया। अमित जी की कहानी मुझे बहुत प्रेरक लगी। उनकी पत्नी लैलम गाँव में ही टीचर हैं। लॉकडाउन में जब अमित जी का काम छूट गया, तो उन्होंने हार मानने के बजाय कुछ अलग करने की सोची। आज वे केंचुआ खाद बनाकर बेच रहे हैं और साथ ही जैविक खेती करके केले और कई तरह की सब्जियां उगा रहे हैं। उन्हें देखकर समझ आया कि मुश्किल वक्त में भी अगर इंसान दिमाग लगाए, तो नए रास्ते अपने आप खुल जाते हैं।
सच कहूँ तो इस पूरे शिविर ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। एक बात जो मेरे दिमाग में बैठ गई है वो ये कि विकास के नाम पर जब भी कोई बड़ा प्रोजेक्ट बनता है, तो उजड़ना हमेशा आदिवासियों को ही पड़ता है। शहरों में तो ऐसा कभी नहीं होता कि किसी प्रोजेक्ट के लिए पूरा मोहल्ला ही खाली करा लिया जाए। दूसरी बात जो मुझे समझ आई वो ये कि अगर हम अकेले-अकेले लड़ेंगे, तो हमारी आवाज़ आसानी से दबा दी जाएगी। सिस्टम से हम तभी लड़ सकते हैं, जब हम सब एक साथ मिलकर खड़े हों, क्योंकि एकता में ही असली ताकत है।
वापसी के वक्त हम लोग मुख्य डिमना लेक भी गए, थोड़ा घूमे, यादगार के लिए ग्रुप फोटो खिंचवाई और फिर अपने-अपने घर लौट आए।
मैं इस अनुभव के लिए JSSC और विकास जी, दिलीप जी, शशांक जी, मोहन मणिपाल जी, अंकुश जी और सलोमी जी का दिल से धन्यवाद करना चाहता हूँ। JSSC और आप सभी के कारण ही मुझे इस ज़मीनी हकीकत को इतने करीब से देखने और समझने का मौका मिला।

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