(आदिवासियों के लिए रोजगार बना अभिशाप)
संजीव कुमार:
रोज़मर्रा की इस भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में न जाने कितनी समस्याओं का सामना कर, इंसान जीवनयापन तथा परिवार का पेट भरने के लिए हर वो काम करने को तैयार है जिससे वह कुछ रुपए कमा सके फिर चाहे वो काम उसके स्वास्थ को ही क्यों न प्रभावित कर धीरे- धीरे उसकी ज़िंदगी छीन रहा हो।
एक ऐसी ही कहानी, मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में गोले के मंदिर के पास बसी एक “केलादेवी” बस्ती की है, जहाँ पिछले 70 वर्षों से लगभग 14 गोंड आदिवासी परिवारों के 90 लोग अपनी कला और संघर्ष के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आज से 70 वर्ष पहले, ये लोग एक बेहतर भविष्य और अपने हुनर का सही मोल पाने की उम्मीद में अपने मूल गाँवों (छतरपुर, उमरिया, छिंदवाडा तथा बुंदेलखंड के आस-पास के क्षेत्रों) को छोड़कर ग्वालियर आ बसे। गाँव में उनका पारंपरिक व्यवसाय पत्थर से घरेलू सामान जैसे सिलबट्टा, कुण्डी (खलबट्टा), दाल पीसने की जतली, आटे की चक्की बनाना था, लेकिन वहाँ बाज़ार और उचित दाम न मिल पाने के कारण उन्हें पलायन का कठिन फैसला लेना पड़ा। ग्वालियर पहुँचकर इन परिवारों ने गोले के मंदिर के पास छोटी- कच्ची झोपड़ियाँ बनाकर रहना शुरू किया, जिसने समय के साथ एक बस्ती का रूप ले लिया। पूर्वजों से सीखी गई पत्थर से सामान बनाने की यह कला उनकी पीढ़ियों के लिए एक वंशानुगत पेशा बन गई, जिससे उनकी आजीविका तो चलने लगी, लेकिन वे इस कड़वी हकीकत से बेखबर रहे कि यही कला उन्हें मौत के करीब ले जा रही है। पत्थर तोड़ने और उन्हें घिसने के दौरान उड़ने वाली बारीक धूल साँस के जरिए उनके फेफड़ों में जमा हो रही है, जो ‘सिलिकोसिस’ जैसी गंभीर बीमारी को जन्म देती है।

“सिलिकोसिस” एक ऐसी गंभीर बीमारी है जो पत्थर तराशने वालों के लिए ‘धीमी मौत’ का दूसरा नाम बन चुकी है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, जब हवा में सिलिका (पत्थर घिसने पर उड़ने वाले छोटे-छोटे कण) की मात्रा 0.05 mg/m³ की सुरक्षित सीमा से अधिक हो जाती है, तो वह सीधे फेफड़ों पर हमला करती है। ग्वालियर के गोले के मंदिर पर, वहाँ धूल का स्तर इस सीमा से कई सौ गुना अधिक पहुँच जाता है। आँकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 1 करोड़ से अधिक मज़दूर सिलिका धूल के जोखिम वाले क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिनमें से एक बड़ी संख्या मध्य प्रदेश के ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया और पन्ना जैसे ज़िलों में केंद्रित है।
एक कड़वी हकीकत यह भी है कि सिलिकोसिस से पीड़ित 60% से 70% मरीजों को बाद में टीबी भी हो जाता है, जिसे ‘सिलिको-ट्यूबरकुलोसिस’ कहते हैं। चूँकि दोनों के लक्षण (खाँसी और वजन का घटना) मिलते-जुलते हैं, इसलिए अक्सर सही जाँच न होने के कारण मज़दूरों का इलाज केवल टीबी का चलता रहता है, जबकि उनके फेफड़े सिलिका धूल से लगातार ख़राब होते जाते है और गलत इलाज उनकी मौत का कारण बन जाता है।
बस्ती में पहुँचते ही हर घर के बाहर पत्थरों के टकराने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। इन्हीं आवाज़ों के बीच मेरी मुलाकात बसंती आदिवासी से हुई जो बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के पत्थर से सिल बना रही थीं। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया, “उन्होंने यह काम बहुत छोटी उम्र में अपने माता-पिता से सीखा था, पन्ना के खदानों से पत्थर लाकर छेनी-हथौड़ी जैसे औज़ारों से सामान बनाकर गाँवों में जाकर बेचा करते थे, शादी के बाद जब वह अपने ससुराल आईं तब भी उन्होंने अपने परिवार के साथ इस पत्थर तराशने का काम जारी रखा”, वर्तमान में वह मुरैना ज़िला के बानमौर शहर तथा पुरानी छावनी की खदानों से पत्थर तराश कर घरेलु समान बनाकर बेचते हैं।

उनका कहना है – “यह सिर्फ़ काम ही नहीं बल्कि हमारी रोजी-रोटी और आमदनी का एकमात्र जरिया है, जिसके चलते हम घर चला पाते हैं।”
कुछ देर बाद बसंती जी भावुक हो गईं और अपने बेटे जसपाल तथा जेठ (पति का बड़ा भाई) गोपाल को याद करते हुए बोलीं, “यह काम उतना आसान नहीं है जितना बाहर से दिखता है। पत्थर तोड़ना, हाथ से थोड़ी-बहुत कारीगरी करना और काम खत्म हो जाना, ऐसा बिल्कुल नहीं है। शिल्प बनाने के बाद भले ही हमें उसकी कीमत मिल जाती हो, लेकिन उसके बाद भी उड़ती हुई पत्थर की धूल धीरे-धीरे हमारी साँसों के जरिए शरीर में जाकर उसे खोखला करती रहती है। इसी धूल के कारण उनके परिजन पिछले तीन साल से ज़िंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। डॉक्टरों ने बताया कि पत्थर की यह महीन धूल, जिसे वे वर्षों से साँस के साथ अंदर लेते रहे, उनके फेफड़ों में जम गई है।”
जिसके कारण अब वो बिस्तर पर रहकर, दवाइयों के सहारे जीवन जी रहे हैं, हर माह इन दोनों की दवाइयों में आठ हज़ार रूपए का खर्चा आता है, जबकि पत्थर तराशने से महीने भर में आठ-दस हज़ार रूपए मुश्किल से कमा पाते हैं।
वह बताती हैं कि आयुष्मान भारत योजना के पात्र होने के बावजूद भी अस्पतालों में इसका पूरी तरह इलाज नहीं किया जाता तथा दिए जाने वाली दवाइयाँ अधिक गर्म होने के कारण शरीर पर नुकसान पहुँचाती हैं और अंत में उन्हें अपने परिजनों का इलाज प्राइवेट अस्पतालों में करना पड़ता है।
भारत सरकार द्वारा वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना लागू की गई, जिसका उद्देश्य देशभर में हस्तशिल्पकार मज़दूरों को अपने काम को विकसित करने के लिए एक लाख का लोन तथा प्रशिक्षण प्रदान करना था, पर अभी तक इस बस्ती में लोगों को योजना से नहीं जोड़ा गया है।
बसंती जी और उनके पति सुदामा जी बताते है कि “उन्होंने कई परिवार के जवान पुरुष-महिलाओं और बच्चों को इस बीमारी से मरते देखा है, बस्ती के ज़्यादातर घरों में से दो-तीन सदस्य तथा पिछले 2 साल में 14 से ज़्यादा लोगों की मृत्यु इस गंभीर रोग से हुई है, अभी भी लगभग सभी घरों में इस बीमारी से ग्रसित लोग अपने बिस्तर पर ज़िंदगी और मौत के बीच लड़ाई लड़ रहे हैं।”
उन्हें और समुदाय में किसी को यह काम करना पसंद नहीं है, लेकिन कोई दूसरा हुनर न होने और परिवार का पेट भरने व बीमार घरवालों का इलाज करवाने की मजबूरी में बसंती जी तथा बस्ती के कई अन्य परिवार अभी भी इसी काम को करने के लिए मजबूर हैं, उनका कहना है कि सरकार हमारे जैसे मजदूर वर्ग के लिए रोजगार के विशेष अवसर प्रदान करेगी तो शायद हम लोग यह जानलेवा काम को बंद कर सुखद-स्वस्थ जीवन यापन कर सकेंगे, जिसके जरिए जितनी तकलीफ़ें और बीमारियाँ हमने देखी हैं, वो हमारे बच्चे नहीं देखेंगे।
इसी बीच वहीं पास खड़ा 22 वर्षीय योगेश ने बताया, “हम जानते हैं कि यह धूल हमारे शरीर को अंदर से खोखला कर रही है। सिलिकोसिस जैसी गंभीर बीमारी से बचने के लिए, हमारे कई साथी यह काम छोड़कर दूसरे शहरों में मजदूरी की तलाश में पलायन कर चुके हैं, क्योंकि नई पीढ़ी धीरे-धीरे यह समझने लगी है कि जीवन कितना कीमती है और कौन सा काम उनके लिए कितना खतरनाक हो सकता है।” बस्ती के युवाओं की बातें सुनकर हमें भी गहरी सहानुभूति हुई कि लोग अब अपनी कठिन परिस्थितियों से लड़कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि यही कदम उनके और उनके परिवारों के बेहतर भविष्य के लिए सबसे ज़रूरी है।
उसी वक्त हमारी मुलाकात करीबन 32 वर्षीय पूनम आदिवासी जी से हुई। उन्होंने बताया कि “पत्थर तराशते समय इतनी खाँसी आती है कि रात को सोते वक्त मुँह से खून तक निकल आता है। हम धूल से बचने की कितनी भी कोशिश करें, यह हमारे खाने तक में समा जाती है।”
वह बताती हैं कि “पत्थर तराशते समय कई बार पत्थर के छोटे-छोटे नुकीले टुकड़े, छेनी तथा अन्य औज़ारों की तेज़ टक्कर सीधे शरीर पर लग जाती है जिससे बस्ती के कई लोगों की आँखों, कानों और पेट जैसी नाज़ुक जगहों पर गंभीर चोटें लग चुकी हैं, जिनके निशान आज भी उनके शरीर पर स्थायी रूप से मौजूद हैं।” वह कहती हैं कि यह दर्द अकेला उनका नहीं है बल्कि बस्ती की लगभग हर उस महिला का है, जो इस काम के पास रहती है या खुद पत्थर तराशने का काम करती है।
इन सभी अनुभवों से यह स्पष्ट है कि सिलिकोसिस मात्र एक बीमारी नहीं, बल्कि एक महात्रासदी भी है। जो भारत में हर साल हज़ारों लोग इस लाइलाज बीमारी के कारण अपनी जान गंवा देते हैं, क्योंकि एक बार सिलिकोसिस होने के बाद मरीज को बचाना संभव नहीं होता। आज सबसे बड़ी ज़रूरत इन बस्तियों तक पहुँचकर लोगों को सुरक्षा के प्रति जागरूक करना जैसे –
- पत्थर तराशते समय उसे गीला करने पर उड़ने वाली धूल को कम किया जा सकता है।
- काम करते समय मुँह पर मास्क लगाएँ जिससे सिलिका शरीर में न जाए।
- नियमित रूप से स्वास्थ्य की जाँच की, जिसके जरिये इस बीमारी के होने की संभावनाओं को रोका जा सका।
इस बीमारी से लड़ने के लिए महत्वपूर्ण कदम “सिलिकोसिस बोर्ड” से जुड़ना है। इसके लिए मरीज को जिला अस्पताल के मेडिकल बोर्ड से जाँच कराकर प्रमाण-पत्र लेना होता है, जिसके आधार पर संबल पोर्टल पर पंजीकरण किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के निर्देशों के तहत मध्यप्रदेश में सिलिकोसिस की पुष्टि होने पर पीड़ित को ₹1 लाख की सहायता और ₹750 मासिक पेंशन का प्रावधान है। अकाल मृत्यु की स्थिति में परिजनों को ₹3 लाख की सहायता राशि और ₹1200 प्रतिमाह पेंशन दी जाती है। साथ ही दीनदयाल अन्त्योदय उपचार योजना के तहत पीड़ितों को प्राथमिकता के आधार पर निःशुल्क चिकित्सा सेवाएँ और हेल्थ कार्ड जारी किया जाना है। लेकिन जागरूकता की कमी के कारण इन जैसी तमाम बस्तियाँ अब भी लाभ से दूर हैं। यदि प्रशासन यहाँ विशेष स्वास्थ्य शिविर लगाकर पंजीकरण सुनिश्चित करे, तो कई जिंदगियाँ बचाई जा सकती हैं।
आज सरकार की कई योजनाओं की पहल मजदूरों के अधिकारों के लिए की गई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि, कागज़ों में दिखाया गया विकास और खर्च क्या वास्तव में लोगों तक पहुँचा है? क्या हस्तशिल्पकारों को उनकी कला का उचित मूल्य मिल रहा है?
आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा अपने अधिकारों से अनजान है। सुरक्षा के बिना यह काम मजदूरों के लिए जानलेवा बना हुआ है। “काम ज़रूरी है, लेकिन जीवन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है”, और सही जागरूकता व मजबूत सरकारी तथा संस्थाओं की नई पहल ही बदलाव ला सकती है।

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