विलास भोंगाडे:

भारतीय समाज व्यवस्था में महिला को द्वितीय स्थान दिया गया है। और घरेलू काम करने वाली महिलाओं को नीचला स्थान मिला है। कामकाजी महिलाओं के काम का कोई महत्व नहीं रखा जाता। श्रम को कोई मूल्य नहीं। उसमें घर में काम करने वाली महिला को उपेक्षित दृष्टि से देखा गया है। यह घर कामगार महिला भारतीय समाज व्यवस्था में दुर्लक्षित हैं। पीड़ित है, वंचित है, और अस्पृश्य भी रही है, आज भी है। क्योंकि आज भी अपार्टमेंट, फ्लैट, बंगले, कोठी में टॉयलेट इस्तेमाल करने नहीं दिया जाता। पिछले दरवाजे से आना पड़ता है। यह सारी स्थिति दिखाई दे रही है।

घर काम करने वाली महिला घर से सुबह निकलती है काम के लिए। उसके घर में तब उसके बच्चे सो ही रहे होते हैं। उसको चाय, नहाना, स्कूल की तैयारी करना, स्कूल लेकर जाना, आदि कुछ भी नहीं कर पाती है। लेकिन सुबह उठकर एक हाथ में थैला और एक हाथ में चप्पल पकड़कर दौड़ते हुए काम पर निकलती है। बंगले, कोठी में जाकर काम पर जाती है। झाड़ू-पोंछा, बर्तन साफ करना, स्वयंपाक करना, खाना, चाय, नाश्ता बनाना, कपड़े धोना, फोन उठाना, सब्जी लाना, कपड़े प्रेस करना, मेहमान की आवभगत करना, चाय-पानी करने का काम करती है। इतना काम दिनभर करने के बाद मेहनताना बहुत अल्प प्रमाण में मिलता है। परिवार का पालन-पोषण नहीं होता। पूरे दिन काम करने से थक जाती है। ठंडे पानी से हाथ-पाँव-कमर अकड़ जाते हैं। केमिकल पाउडर, साबुन से हाथ-पाँव फट जाते हैं, तो कहीं इलाज नहीं करा पाती। यह स्थिति इस घर की कामगार महिलाओं की है। इन घरकामगार महिलाओं का अपमान बहुत होता है। गाली-गलौच सुनना पड़ता है। लेकिन परिवार के पेट के लिए सहन करना पड़ता है।

नागपुर शहर में अस्सी के दशक में 450 झुग्गी-झोपड़ी थीं। आज भी हैं। उस वक्त 25 से 50 रुपये महीने मजदूरी मिलती थी। आज उस मायने में ज़्यादा मेहनताना मिलता है। लेकिन काम बहुत करना पड़ता है। इन घरकामगार महिलाओं को बस्ती स्तर पर संगठित करने का प्रयास किया गया है। बस्ती-बस्ती जाकर घरेलू कामगारों से मिलकर बात करना, चर्चा करना, परिवार की बात करना, काम की बात करना, बस्ती की बात, नागरी सुविधा, शिक्षण, आरोग्य की बात करके बस्ती स्तर पर चर्चा की, मीटिंग, सभा, सम्मेलन करने के बाद रास्ते पर उतरे। नारे, निदर्शन, घेराव, रेल रोको, विधानसभा में घुसना, चूल्हा जलाना आदि आंदोलन किए गए। तब कहीं शासन से बात हुई। यह महिला काम करती है, लेकिन बराबर मेहनताना नहीं मिलता, आठवाड़ी छुट्टी नहीं, बीमार पड़े तो छुट्टी नहीं, औषध नहीं, बोनस नहीं, बुढ़ापे की सुविधा नहीं, पेंशन नहीं, शासन नोंद नहीं करता। यह देश की जीडीपी में सहयोग करती है, फिर भी कानून, नियम नहीं बनते। यह सवाल उठाए तो स्थापित परिवार विरोध करने लगे, खिलाफ लिखने लगे। लेकिन आंदोलन चलता रहा। महाराष्ट्र शासन को 2008 में कानून बनाना पड़ा। यह देश के लिए बहुत बड़ी बात थी। वेलफेयर बोर्ड बना, लेकिन राष्ट्रीय कानून होना चाहिए, वेतन तय होना चाहिए, सोयी-सुविधा, छुट्टी, बोनस, आरोग्य सुविधा व बुढ़ापे की सुविधा होना चाहिए।

इस पर देश भर में घरेलू कामगारों को संगठित करने की ज़रूरत है। नेशनल ट्रेड यूनियन घरेलू कामगारों के प्रति उदासीन है। सरकार भी उदासीन है। अंतरराष्ट्रीय कामगार संगठन ने एक कन्वेंशन पास किया है। लेकिन केंद्र आई.एल.ओ. कन्वेंशन का पालन नहीं करता।

घरेलू कामगारों की काफी बड़ी संख्या है। 40 करोड़ के ऊपर देश में घरेलू कामगार हैं। उनको संगठित करना ज़रूरी है।

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  • श्रुति से जुड़े महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले के संगठन कष्टकरी जन आन्दोलन को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले विलास भाऊ, संगठन के साथ जुड़कर विस्थापन, पुनर्वास, दलित परिवारों और घरेलू कामगार महिलाओं के मुद्दों पर काम करते आए हैं। गाना गाने में रूचि रखने वाले विलास भाऊ अध्ययन और प्रशिक्षण जैसी वैचारिक गतिविधियों में भी विशेष सक्रियता के साथ काम करते हैं।

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