संजीव:

यह कहानी मध्यप्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर क्षेत्र से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित एक बस्ती की है, जहाँ ज़िन्दगी आज भी संघर्षों से जूझ रही है। जब हम अपनी जेनिथ संस्था, मालनपुर से इस बस्ती की ओर निकले, तो तिलोरी गाँव तक पक्की सड़क दिखाई दी। लेकिन जैसे ही पक्की सड़क समाप्त हुई, हम कच्ची पगडंडी पर आगे बढ़े। कच्ची मिट्टी और नुकीले पत्थरों से बने उस रास्ते पर चलना किसी चुनौती से कम नहीं था। चारों ओर झाड़ियाँ, कांटेदार पेड़ और वीरानी पसरी हुई थी। कुछ दूर तक ऐसे ही चलते रहने के बाद, लगभग एक किलोमीटर आगे एक सुनसान स्थान पर बसी एक छोटी-सी बस्ती दिखाई दी। इस बस्ती को कृष्णपुरी आदिवासी बस्ती के नाम से जाना जाता है।

जब हम बस्ती में पहुँचे तो देखा कि वहाँ कुछ घर बने हुए थे, मगर उन्हें घर कहना शायद सही नहीं होगा। वे सभी झोपड़ियाँ थीं, जो सूखे पेड़ों की टहनियों और फटे टीन के टुकड़ों से किसी तरह जोड़ी गई थीं। कहीं पत्थरों की दीवारें थीं, जिन्हें बिना सीमेंट और रेत के बस यूँ ही टिकाकर खड़ा कर दिया गया था। दीवारों को कच्ची मिट्टी और गोबर से लिपा गया था और किसी भी घर में पक्की छत नहीं थी। छत की जगह प्लास्टिक के पुराने टुकड़े, पेड़ों की डालियाँ और तिरपाल के सहारे लोग अपने सिर को ढकने की कोशिश कर रहे थे।

वहीं हमें एक बुज़ुर्ग महिला मिलीं – मुन्नी आदिवासी, जिनकी उम्र लगभग साठ वर्ष थी। हमने उन्हें अपना और जेनिथ संस्था का परिचय दिया और उनसे पूछा कि बस्ती इतनी सूनी क्यों है। उन्होंने बताया कि ज़्यादातर लोग मज़दूरी के लिए बाहर गए हैं। बस्ती में इस समय सिर्फ वृद्धजन और बच्चे ही मौजूद हैं, जो पीछे मैदान में या तालाब के पास खेल रहे होंगे। उन्होंने यह भी बताया कि वे यहाँ लगभग पचास वर्षों से रह रही हैं। पहले वे दतिया के पास रहती थीं, जहाँ से मुन्ना गुर्जर (ठेकेदार), ग्राम लक्षणगण तथा तिलोरी गाँव के सरपंच पूरन सिंह माहोर उन्हें काम के लिए यहाँ लेकर आए थे। धीरे-धीरे अन्य परिवार भी बसते गए और अब इस बस्ती में लगभग पचास लोग रहते हैं। इनमें ज़्यादातर आदिवासी परिवार हैं, जो अलग-अलग गाँवों से आकर यहाँ बसे हैं।

ये सभी परिवार चम्बल क्षेत्र और उसके बीहड़ों के पास बसे पुराने इलाकों से आए हैं, जहाँ उनका पारंपरिक रोजगार जंगल और वन उपज पर आधारित था। लेकिन जंगलों पर स्थायी निवासियों और सरकार का अधिकार स्थापित हो जाने के कारण उन्हें जंगल से औषधियाँ, लकड़ी और अन्य वन उपज लाने से रोक दिया गया। इसी कारण उन्हें अपने स्थायी निवास स्थान छोड़कर कृष्णपुरी (मालनपुर) आना पड़ा, इस उम्मीद में कि यहाँ उनका जीवन कुछ स्थिर और बेहतर हो सकेगा।

मुन्नी बाई से बात करते-करते कब शाम रात में बदल गई, इसका पता ही नहीं चला। झोपड़ियों से चूल्हों का धुआँ उठ रहा था और कच्चे रास्तों पर लोग अपनी थकान समेटे घर लौट रहे थे – कोई साइकिल से, कोई बाइक से और कई लोग पैदल ही मुस्कुराते हुए लौट रहे थे।

हमारे बैठते ही बस्ती के लोग धीरे-धीरे पास आने लगे और कुछ ही देर में बुज़ुर्गों से लेकर बच्चों तक लगभग पूरी बस्ती उस बैठक का हिस्सा बन गई। सभी के मन में जिज्ञासा थी कि हम यहाँ किस उद्देश्य से आए हैं। कुछ लोगों ने पूछा कि क्या हम सरकारी अधिकारी हैं। किसी ने कहा कि क्या हम उनकी बस्ती की सड़क बनवाने आए हैं। वहीं एक बच्चे ने मासूमियत से पूछा – क्या आप हमें यहाँ पढ़ाने आए हैं?

तभी बस्ती की एक महिला सीमा आदिवासी, जिनकी शादी को अभी कुछ ही वर्ष हुए हैं, हमें बस्ती की समस्याओं के बारे में बताने लगीं। उन्होंने बताया कि उनकी बस्ती में सबसे गंभीर समस्या पानी की है। बस्ती शहर से बहुत दूर होने के कारण उन्हें पानी लाने के लिए लगभग चार किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। गर्मियों में तो हालात और भी कठिन हो जाते हैं और लोग एक-एक बूंद पानी के लिए तरस जाते हैं।

बस्ती के लोगों से बातचीत करते हुए हमने अपना और जेनिथ संस्था का परिचय दिया। हमारी संस्था ग्वालियर, शिवपुरी और भिंड जिलों में कार्य कर रही है, जहाँ हम विशेष रूप से सहरिया आदिवासी, मज़दूर वर्ग और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए काम करते हैं। संस्था का मुख्य उद्देश्य लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, सरकारी योजनाओं से जोड़ना, ज़मीन से जुड़े मुद्दों पर सहायता देना और मुफ़्त कानूनी सहयोग उपलब्ध कराना है। मालनपुर क्षेत्र में हम गाँव-गाँव जाकर लोगों की समस्याएँ सुनते हैं और आवश्यक दस्तावेज़ बनवाने में सहायता करते हैं, ताकि वे सरकारी योजनाओं से जुड़ सकें और अपने अधिकार प्राप्त कर सकें।

बस्ती की स्थिति को देखकर हम भीतर तक विचलित हो गए। वहाँ से लौटते समय मन में कई सवाल उठ रहे थे। आज़ादी के 79 वर्षों से अधिक समय बाद, जब भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तब भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या हर नागरिक को वे बुनियादी अधिकार मिल पाए हैं, जिनकी उसे आवश्यकता है। क्या विकास का अर्थ केवल ऊँची इमारतें, बड़ी गाड़ियाँ और शानदार स्कूल हैं, या फिर हर व्यक्ति तक रोटी, कपड़ा, मकान, स्वच्छ पानी और शिक्षा पहुँचाना ही असली विकास है?

जहाँ देश के एक हिस्से में लोग अपने बच्चों के लिए बेहतरीन स्कूल तलाश रहे हैं, वहीं कुछ जगहें ऐसी भी हैं, जहाँ लोग आज भी दो वक्त की रोटी और पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह बस्ती हमें उसी सच्चाई से रूबरू कराती है।

Author

  • संजीव कुमार मध्य प्रदेश के भिंड जिले के मालनपुर के निवासी हैं। वह वर्तमान में बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र हैं और जेनिथ सोसाइटी संस्था में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं, जहां वह सहारिया आदिवासी और मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिए काम करते हैं। उन्हें पढ़ना और लिखना बहुत पसंद है।

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