मंजुलता मिरी:
मेरी शुरुआत: गाँव, परिवार और सामाजिक काम
मेरा नाम मंजुलता मिरी है। लोग मुझे मंजू भी कहते हैं। मैं छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले के पिथौरा ब्लॉक के छोटे से गाँव पिलवा पाली में रहती हूँ। मैं एक किसान परिवार से हूँ, जहां मिट्टी सिर्फ ज़मीन नहीं, बल्कि पहचान होती है। मैं संयुक्त परिवार में रहती हूँ, जहां रिश्ते साझा होते हैं और ज़िम्मेदारियां भी।
मेरी सुबह घर से शुरू होती है चूल्हा, पानी, कामकाज और परिवार की देखभाल। लेकिन मेरी सुबह वहीं खत्म नहीं होती। घर की दहलीज़ पार करते ही मैं अपने गाँव और अपने समुदाय के बीच पहुंच जाती हूँ। मैं एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ। खेतों, जंगलों और बस्तियों में लोगों के साथ, लोगों के लिए काम करती हूँ। मैं गाँव के समुदाय के साथ सामुदायिक अधिकार, व्यक्तिगत अधिकार और संसाधनों के प्रबंधन जैसे मुद्दों पर काम करती हूँ। लोगों को उनके हक़ समझाने, उन्हें संगठित करने और उनके अधिकारों की राह पर साथ चलने का काम करती हूँ।
मेरे लिए सामाजिक कार्य कोई पद नहीं है, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है कभी बैठक में, कभी दस्तावेज़ों के साथ, तो कभी किसी महिला का हौसला बनकर। मैं खेतों से निकली हूँ, पर मेरी सोच सिर्फ अपने घर तक सीमित नहीं है। मैं मानती हूँ कि जब गाँव जागता है, तभी असली बदलाव शुरू होता है।
मैं गाँव में रहने वाली एक महिला हूँ। पहले मेरी दुनिया घर से खेत तक सीमित थी। सामाजिक कार्य करने की इच्छा मेरे अंदर शुरू से थी, लेकिन समाज की रूढ़िवादी सोच, सीमित जानकारी और उचित मार्गदर्शन के अभाव में आगे बढ़ना मेरे लिए आसान नहीं था। एक दिन दलित आदिवासी मंच संगठन की राजीम मैडम से मेरी मुलाकात हुई। बातचीत के दौरान मैंने अपने जीवन, अपनी इच्छाओं और गाँव में हो रही सामाजिक समस्याओं के बारे में खुलकर बताया। उन्होंने मेरी बातों को गंभीरता से समझा और मुझे आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया।
राजीम मैडम ने मेरे पति से भी बातचीत की और मुझे संगठन से जोड़ने का प्रस्ताव रखा। परिवार की सहमति और संगठन के सहयोग से मैं दलित आदिवासी मंच से जुड़ी और समुदाय के लिए सामाजिक कार्य करना शुरू किया। संगठन के माध्यम से मुझे सीखने, समझने और आगे बढ़ने के अवसर मिले। इसी क्रम में मुझे सामाजिक परिवर्तन शाला में जाने का मौका मिला। यह मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जहां मुझे सामाजिक मुद्दों की गहरी समझ, नेतृत्व क्षमता और समुदाय के अधिकारों पर काम करने की दिशा मिली।
सोच, समझ और आत्मविश्वास: सामाजिक परिवर्तन शाला का अनुभव
सामाजिक परिवर्तन शाला में मुझे अलग-अलग राज्यों से आए साथियों से मिलने और उनके कार्यों को जानने का अवसर मिला। सभी साथियों ने अपने-अपने गाँव, ज़िला और समुदाय में किए जा रहे कामों तथा वहां की समस्याओं के बारे में विस्तार से बताया। उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला और मेरी समझ और सोच दोनों में वृद्धि हुई। इस दौरान अलग-अलग सामाजिक मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। इन चर्चाओं से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और समुदाय के लिए और बेहतर तरीक़े से काम करने की प्रेरणा मिली।
पहले मुझे लगता था कि हिंसा, खेती से जुड़ी परेशानियां और अन्य समस्याएं केवल हमारे ही गाँव में होती हैं, लेकिन सामाजिक परिवर्तन शाला में साथियों के अनुभव सुनकर समझ में आया कि हर जगह चाहे कोई भी राज्य या ज़िला हो जल, जंगल, ज़मीन, वन उपज और भेदभाव से जुड़े मुद्दे किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। यह जानकर मुझे यह दृष्टि मिली कि हमारी समस्याएं व्यक्तिगत या स्थानीय नहीं, बल्कि सामूहिक हैं।
सामाजिक परिवर्तन शाला में सभी साथियों से मिलकर दोस्ती हुई, आपसी संवाद बढ़ा और अलग-अलग मुद्दों पर नई-नई जानकारियां प्राप्त हुईं। इस पूरे अनुभव ने मुझे यह एहसास कराया कि जब हम एक-दूसरे से सीखते हैं और जुड़कर काम करते हैं, तभी समाज में वास्तविक और स्थायी परिवर्तन संभव है।
बचपन से ही घर और समाज में जो बातें मुझे सिखाई गई थीं, वे ज़्यादातर रूढ़िवादी सोच से जुड़ी थीं। लड़कियों पर रोक-टोक, घर से बाहर अकेले न निकलना, ज़्यादा बोलना या अपनी बात रखना ठीक नहीं समझा जाता था। लड़का और लड़की में भेदभाव सामान्य माना जाता था। इन्हीं बातों को सच मानकर मैं बड़ी हुई। इसी वजह से पहले मैं घर से बाहर अकेले निकलने में डरती थी, किसी के सामने खुलकर बात नहीं कर पाती थी और हमेशा यही सोचती रहती थी कि लोग क्या कहेंगे, समाज क्या सोचेगा।
लेकिन सामाजिक परिवर्तन शाला में जाने के बाद मेरी सोच और विश्वास में बड़ा बदलाव आया। वहां मैंने जाना कि सवाल करना ग़लत नहीं है, अपनी बात रखना मेरा अधिकार है और लड़की होना कोई कमजोरी नहीं है। अलग-अलग जगहों से आई महिलाओं और साथियों को देखकर मुझे समझ आया कि अगर वे आगे बढ़ सकती हैं, तो मैं भी आगे बढ़ सकती हूँ। सामाजिक परिवर्तन शाला ने मुझे डर से बाहर निकलने की ताक़त दी। अब मैं अकेले बाहर जा सकती हूँ, लोगों से खुलकर बात कर सकती हूँ और अपने विचार निडर होकर रख सकती हूँ। आज मैं लड़का-लड़की के बीच भेदभाव को ग़लत मानती हूँ और अपने परिवार व समुदाय में भी इस सोच को बदलने की कोशिश करती हूँ। सामाजिक परिवर्तन शाला ने मुझे यह एहसास कराया कि बदलाव की शुरुआत खुद से होती है।
अमल, सामूहिक बदलाव और भविष्य की कल्पना
सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ने के बाद मेरे जीवन में सबसे बड़ा बदलाव निर्णय लेने की क्षमता और आत्मविश्वास में आया। पहले जहां मैं चुप रहती थी, वहीं अब मुझे ग्राम सभा में अपनी बात खुलकर रखने की ताक़त मिली है। सामाजिक परिवर्तन शाला में मिली सीख और अनुभव ने मुझे अपने अधिकारों और ज़िम्मेदारियों के प्रति जागरूक बनाया। इसके कारण मैं राजनीति के क्षेत्र में भी आगे बढ़ी। मैंने अपने गाँव और समुदाय के लिए प्रेरणा बनकर खड़े होने का साहस किया।
गाँव स्तर से लेकर हाई कोर्ट तक मैंने न्याय की लड़ाई लड़ी है और महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के मामलों में उन्हें न्याय दिलाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाई है। आज मैं शासन-प्रशासन के सामने अपने गाँव और समुदाय से जुड़े मुद्दे चाहे वे ज़मीन, जंगल, खेती या महिलाओं के अधिकारों से जुड़े हों बिना डर के रखती हूँ। अब मैं अकेले भी कहीं खड़ी होकर अपने विचार स्पष्ट और निडर होकर रख सकती हूँ। सामाजिक परिवर्तन शाला ने मुझे ऐसा बनाया कि मैं सीख को अपने वास्तविक जीवन में उतार सकूं और समाज में बदलाव की एक सशक्त आवाज़ बन सकूं।
सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ने के बाद मैंने यह भी समझा कि सामाजिक बदलाव अकेले व्यक्ति से नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास से आता है। पहले मैं सोचती थी कि मैं अकेले क्या कर पाऊंगी, लेकिन परिवर्तन शाला में यह सीख मिली कि जब समुदाय संगठित होता है, तब उसकी आवाज़ मज़बूत बनती है। मैंने गाँव में महिलाओं, युवाओं और समुदाय के लोगों को जोड़कर बैठकों, ग्राम सभाओं और सामूहिक चर्चाओं की शुरुआत की। लोगों को उनके सामुदायिक और व्यक्तिगत अधिकारों तथा संसाधनों के प्रबंधन के बारे में जानकारी दी।
धीरे-धीरे लोग अपनी समस्याओं पर खुलकर बोलने लगे और एक-दूसरे का साथ देने लगे। सामूहिक प्रक्रियाओं के ज़रिए हमने महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा, ज़मीन और खेती से जुड़े मुद्दे और भेदभाव जैसी समस्याओं को मिलकर उठाया। जब किसी एक व्यक्ति के साथ अन्याय होता था, तब पूरा समुदाय उसके साथ खड़ा होता था। इससे शासन-प्रशासन के सामने हमारी बात और गंभीरता से सुनी जाने लगी। इस प्रक्रिया ने गाँव में विश्वास, एकता और नेतृत्व की भावना को मज़बूत किया।
मैंने अपना जीवन समाज और समुदाय के लिए समर्पित किया है। बचपन से ही मैंने देखा कि गाँव में महिलाओं और दलित-आदिवासी समुदाय के साथ भेदभाव और हिंसा होती है। खेती, ज़मीन, जंगल और जल जैसे संसाधनों के अधिकार के लिए लोग संघर्ष करते हैं, लेकिन उन्हें सही जानकारी और मार्गदर्शन नहीं मिलता। इन अनुभवों ने मेरे भीतर समाज के लिए काम करने की इच्छा को और मज़बूत किया। सामाजिक परिवर्तन शाला ने इस इच्छा को दिशा दी।
आज मैं केवल अपने गाँव तक सीमित नहीं रहना चाहती। मेरी कल्पना है कि हर गाँव, हर ब्लॉक और हर ज़िले में महिलाएं और कमज़ोर वर्ग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों, अपने मुद्दे सामने रख सकें और समाज में सक्रिय भूमिका निभा सकें। मेरा सपना है कि सामूहिक, संगठित प्रयास और महिला नेतृत्व के माध्यम से गाँव-गाँव में न्याय, समानता और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो। मेरा जीवन और मेरा काम यही दिखाता है कि अगर हौसला हो और सही दिशा मिले, तो कोई भी महिला या समुदाय अपने अधिकारों के लिए खड़ा हो सकता है और समाज में बदलाव की मिसाल कायम कर सकता है।

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