आशीष पंत:

अच्छा!! लेखक कौन है?? एक पुरुष? वाकई, फिर पहचान मासिक धर्म क्यों???

हाँ, मैं एक पुरुष हूँ और यही बात लोगों को सबसे ज़्यादा हैरान करती है। जब भी मैं मासिक धर्म पर लिखता या बात करता हूँ, लोग पलटकर पूछते हैं—“ये तो महिलाओं का विषय है, आप क्यों लिख रहे हैं?” मैं मुस्कुरा देता हूँ और सोचता हूँ अगर एक पुरुष सड़क, पहाड़, जंगल, युद्ध, राजनीति, धर्म—सब पर लिख सकता है, तो क्या वह जीवन देने वाले चक्र पर नहीं लिख सकता?

मैं एक पुरुष हूँ, लेकिन मासिक धर्म मेरे लिए कोई दूर का, बंद दरवाज़े वाला विषय नहीं। यह मेरी समझ, मेरी संवेदना, मेरे रिश्तों और मेरे काम—सबका हिस्सा है। बचपन में मैंने घर में देखा था—माँ की हिचक, बहन की चुप्पी, अचानक स्कूल न जाना, पुराना कपड़ा सुखाने में झिझक, और चारों ओर फैली हुई अनकही शर्म। वह शर्म, जो समाज ने लड़कियों को दे दी… और लड़कों को अज्ञान।

समाज ने मुझे इस विषय से दूर रखा। पर मैंने वही रास्ता चुना जहाँ लोग जाना ही नहीं चाहते थे। मासिक धर्म से मेरा वास्तविक और गहरा जुड़ाव तब हुआ, जब मैंने इसे अपने शोध और NGO के काम के जरिए गाँवों की मिट्टी में उतरकर देखा। पहाड़ों के उन दूर-दराज गाँवों में किशोरियों से बात करते हुए मुझे महसूस हुआ कि यह विषय सिर्फ़ एक ‘जैविक प्रक्रिया’ भर नहीं है; यह सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक रस्सियों का एक ऐसा जाल है जिसमें लड़कियाँ हर महीने उलझती हैं, और विडंबना यह है कि समाज उन्हें देखना ही नहीं चाहता।

एक दिन की घटना ने मुझे अंदर तक हिला दिया, जब एक किशोरी ने बहुत मासूमियत से कहा, “सर, हमें पैड इस्तेमाल करना नहीं आता था। पहली बार जब मिला, तो हम उसे मुँह से छीलकर खोलते थे।” वह वाक्य मेरे लिए किसी भी बड़े आंकड़े से अधिक भारी था। वह कोई गलती नहीं थी—वह ज्ञान की पूर्ण अनुपस्थिति थी, वह एक ऐसी उपेक्षा थी जिसे हमने पीढ़ियों तक कायम रखा। वहीं, एक दूसरी लड़की की झिझकती आवाज़ ने बताया कि कैसे पैसे न होने पर वे कपड़े का इस्तेमाल करती हैं और शर्म के मारे उसे छुपाकर सुखाती हैं। उसकी आवाज़ की वह झिझक उसकी अपनी नहीं थी, बल्कि हमारे समाज द्वारा उन पर थोपी गई थी।

इन अनुभवों के बीच जब मैं रटगर्स (Rutgers) की रिपोर्ट देखता हूँ कि 89% महिलाएँ आज भी कपड़े का इस्तेमाल करती हैं और संक्रमण का शिकार होती हैं, तो ये आंकड़े मुझे कागज़ पर लिखे नंबर नहीं लगते। ये उन चेहरों की कहानियां हैं जिनके साथ मैंने बैठकर बातें की हैं। सबसे ज्यादा कष्ट तब होता है जब पता चलता है कि 23% लड़कियाँ सिर्फ मासिक धर्म की असुविधाओं के कारण स्कूल छोड़ देती हैं। सोचिए, एक प्राकृतिक चक्र किसी के सपनों का रास्ता रोक दे—इससे बड़ा अन्याय और क्या होगा? कई जगहों पर मैंने आज भी वो कमरे देखे हैं जहाँ माहवारी के दिनों में महिलाओं को अलग कर दिया जाता है। यह अलगाव बीमारी का नहीं, हमारी सड़ी-गली मानसिकता का प्रतीक है। एक महिला ने जब मुझसे कहा, “इन दिनों हम किसी से आँख नहीं मिला सकते,” तो उस क्षण मुझे लगा कि हमने सिर्फ उनके शरीर को नहीं, उनकी गरिमा को भी कैद कर लिया है।

लेकिन, इन तमाम तकलीफों के बीच उम्मीद भी उतनी ही सच्ची और जीवंत दिखी। कई लड़कियों ने अब कहना शुरू कर दिया है—”यह बीमारी नहीं है, हम इसे छुपाएँगी नहीं।” जब किसी किशोरी ने मुझसे कहा, “सर, पहली बार किसी ने हमसे पूछा कि हम कैसा महसूस करती हैं,” तो उसकी आँखों में दिखी राहत ने मुझे बता दिया कि केवल ‘संवाद’ ही परिवर्तन का पहला कदम है। यह विषय चुनना मेरे लिए केवल शोध का हिस्सा नहीं, बल्कि मेरे मानवीय दायित्व की ओर एक कदम बन गया है। मैंने सीखा है कि मासिक धर्म शर्म का नहीं, गर्व का विषय है; यह कमजोरी नहीं, प्रकृति की वह शक्ति है जिससे दुनिया का अस्तित्व है।

मानवीय दायित्व केवल जान लेने तक सीमित नहीं होता, यह सामूहिक परिवर्तन की मांग करता है। एक पुरुष होने के नाते, मेरी जिम्मेदारी भी सिर्फ आंकड़ों को  प्रस्तुत करने तक नहीं है, बल्कि समाज के बीच रहकर समाज के साथ मिलकर परिवर्तन को और व्यापक बनाने की है। हमें यह समझना होगा कि मासिक धर्म की चुप्पी ने केवल लड़कियों को ही पीड़ित नहीं किया है, इसने लड़कों को भी अधूरा रखा है; पुरुष इस प्रक्रिया से अनभिज्ञ रहे हैं जिसने उन्हें जन्म दिया।

इस अज्ञानता ने एक सांस्कृतिक दूरी पैदा की है, जिसके कारण हम घर पर अपनी माँ, पत्नी या बेटी के दर्द और भावनात्मक उतार-चढ़ाव को या तो अनदेखा कर देते हैं या फिर ‘उनका मामला’ कहकर उससे मुँह मोड़ लेते हैं। हमारा कार्य अब शिक्षा के मैदान से शुरू होता है। हमें स्कूलों में, परिवारों में, और अपने दोस्तों के बीच, मासिक धर्म को उसी सहजता से चर्चा का विषय बनाना होगा जैसे हम खेल या राजनीति पर करते हैं। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर गाँव में, हर बस्ती में, मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों (Menstrual Hygiene Products) तक सस्ती और सुलभ पहुँच हो, और उन अलगाव वाले कमरों को तोड़ना होगा—ईंटों और पत्थरों को नहीं, बल्कि भेदभाव की मानसिकता को, जो इन कमरों को संचालित करती है।

इस ‘पहचान’ की स्थापना में, मैंने केवल महिलाओं के जीवन को करीब से समझा है, बल्कि एक पुरुष के रूप में अपनी संवेदनशीलता के विस्तार को महसूस किया है। इसलिए, आज जब मैं कहता हूँ कि “मासिक धर्म मेरी पहचान है,” तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। यह उन अनुभवों का निचोड़ है जो मैंने समाज के एक हिस्से के तौर पर जिए हैं। यह उन आवाज़ों की गूँज है जिन्हें मेरी कलम ने जगह दी है, और उन आंसुओं व मुस्कानों का मेल है जिन्हें समाज ने हमेशा अनदेखा किया।

और मैं मानता हूँ कि वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब पुरुष भी इस संवाद का हिस्सा बनेंगे—सिर्फ एक दर्शक बनकर नहीं, बल्कि सुनकर, समझकर और पूरी संवेदना के साथ ठोस परिवर्तन के लिए आगे बढ़कर। मासिक धर्म केवल महिलाओं का विषय नहीं है; यह संपूर्ण मानवता के स्वास्थ्य, शिक्षा और गरिमा का एक ऐसा प्रश्न है, जिसे सुलझाना हम सबका साझा, अपरिहार्य और अंतिम दायित्व है।

Author

  • आशीष पंत / Ashish Pant

    आशीष पंत, पं. बद्री दत्त पांडे कैंपस, बागेश्वर, सोबन सिंह जीना यूनिवर्सिटी, अल्मोड़ा में सोशियोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी रुचि ग्रामीण समाज, जेंडर और मासिक धर्म स्वास्थ्य, और सामाजिक विकास में है। वह एक रेडियो जॉकी भी हैं और सोच ट्रस्ट के संस्थापक हैं।

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