नंदिनी:
आज का युवा दो जंग लड़ता है—
एक किताबों से, एक हालातों से।
एक CV के पन्नों में खुद को समेटता है,
दूसरा अपने ही
अनकहे सवालातों से।
मेहनत रोज़ होती है,
पर फल वक़्त माँगता है।
सब्र को हर दिन
खुद को सही साबित करना पड़ता है।
दुनिया नतीजों से तौल देती है सब कुछ,
ये नहीं देखती
कितनी लड़ाइयाँ
ख़ामोशी में जीती जाती हैं।
हर सुबह खुद से कहना पड़ता है
अभी कहानी खत्म नहीं हुई है।
हार मेरी पहचान नहीं बनी,
बस ज़िंदगी ने
थोड़ी देर के लिए
मुझे रोक लिया है।
सपनों और ज़रूरतों के बीच
जब हौसला थककर बैठ जाता है,
तब कोई हाथ नहीं थामता—
सिवाय उस भरोसे के
जो भीतर से
खुद को आवाज़ देता है।
क्योंकि हर सपने की एक कीमत होती है
कम होती नींदें,
गिरवी रखा सुकून,
और वो मुस्कान
जो हर बार दिखाना मुमकिन नहीं होता।
यहाँ जीत सबसे तेज़ को नहीं मिलती,
बल्कि उसे मिलती है
जो सबसे ज़्यादा टिकता है।
जो टूटकर भी
खुद से कहता है—
“चल…
इस कीमत के बदले
आज फिर
ख़ुद से ही शुरुआत करते हैं।

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