अब पुराने मकान की मरम्मत का समय आ गया है!

अल्बर्ट बिलुंग:

आदिवासी समाज, केवल जनजातियों विशेष से निर्मित समाज नहीं बल्कि एक विचारधारा है। एक सम्पूर्ण जीवनदर्शन है। इस विचारधारा के प्रवाह को बाहर से लोगों ने जैसा देखा, अनुभव किया, उसी के अनुरूप चित्रित करते हुए दुनिया के समक्ष इसकी एक तस्वीर प्रस्तुत करने की कोशिश की है। तस्वीर कुछ इस तरह  दिखाई देती है – जंगली, पिछड़ा, गरीब, शोषित, वंचित नंग धड़ंग, साँप पकड़ने वाला, सीधा-साधा, जानवरों को खाने वाला, रूढ़िवादी, परम्परावादी, कट्टर, आदि।

आदिवासी संस्कृति व परम्परा, सदियों नहीं युगों पुरानी होते हुए भी पूरे समुन्नत / संशोधित संस्करण के रूप में आज भी पूरे सम्मान के साथ वैश्विक समाज में अपनी पहचान रखती है। सामाजिक, सामुदायिक, व्यवस्थित, संगठित, संवैधानिक एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण जो एक श्रेष्ठ व समृद्ध मानव जीवन के स्वशासन के लिए आवश्यक तत्व हैं, आदिवासी संस्कृति एवं सभ्यता की देन है। इसकी झलक, इनकी परम्पराओं में देखी जा सकती है और ये गुण, आधुनिक शासन व्यवस्था की मूलभूत ज़रूरत हैं।

जहाँ कृषि क्रांति व औध्योगिक क्रांति मानव श्रम के महत्त्व को उजागर करती हैं वहीँ आदिवासी समुदाय की ताकत का अंदाजा हिजला मेला (दुमका), मुड़मा मेला (राँची) जैसे विभिन्न भाषा एवं जनजातियों की संस्कृतियों के स्वतः स्फूर्त शांतिमय महा समागम से लगाया जा सकता है।

दुनिया के समक्ष रखी गई आदिवासियों की तस्वीर, केवल एक बाहरी झलक है। तथाकथित गैर आदिवासी विद्वान् इस दर्शन को कतई नहीं समझ सकते। विश्व भर के आदिवासी समुदायों की जीवन धारा पर यदि गौर करें तो पायेंगे कि इन सबमे अनूठी एकरूपता है। सामुदायिक जीवन, सामुहिक संघर्ष, संधर्ष में महिलाओं का अग्रिम कतार में खड़ा होना, पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना, घोर प्राकृत, सादगी, मेहनतकश, शांतिप्रिय, सामाजिक रीतिविधियों का कठोरता से पालन, स्वच्छन्द एवं उल्लासित जीवन पसन्द, दूसरे समुदाय के लोगों के साथ दोस्ताना संबंध को रिश्तों (सहिया) में बांधने जैसी कला में माहिर। अपनी भाषा और संस्कृति पर अटूट श्रद्धा व प्रेम ने इन्हें युगों तक स्थापित एवं सुरक्षित रखा है।

अब ऐसा क्या हो गया कि आदिवासी सवालों के घेरे में आ गया? नये ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र की उन्नति ने इस समाज को अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया। पुरखों को विज्ञान प्रदत्त उपलब्धियों का सौभाग्य प्राप्त नहीं था। तत्कालीन जीवन यापन की व्यवस्था ही उनके लिए सर्वोपरि था। तथापि ज्ञान की कमी उनमें नहीं थी। उनका ज्ञान (Knowledge) शास्त्रीय (शैक्षिक) नहीं था, परंतु दिन प्रतिदिन, साल-दर-साल, पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित हो रहे अनुभव जनित (Conception to Perception) प्रज्ञा (Wisdom) थी, जिसे हम संस्कृति (Flow of Life/Way of Life) कहते हैं। यही इनका संविधान था, जिससे समाज में व्यवस्था एवं एकजुटता कायम थी। आदिवासी जीवन दर्शन की गहराइयों की समझ उसे ही हो सकती है, जिसके रगों में वह ‘संस्कृति’ बहती हो। मातृभाषा का अपनापन, गीत-संगीत, नृत्य, पूजा-पाठ, पर्व-त्योहार, पारिवारिक सामाजिक क्रियाकलाप, इत्यादि समाज के श्रेष्ठ एवं सच्चे मनोभावों की अभिव्यक्तियाँ हैं।

विज्ञान एवं औद्योगिकरण ने विश्व के भौतिक जीवन को समृद्ध किया। इसका प्रभाव आदिवासी समाज पर पड़ना लाज़मी था। आदिवासी अपने उसूलों पर जीने मरने वाला समृद्ध एवं आत्मनिर्भर समाज था। अचानक आ रहे भौतिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तनों के कारण, पूर्वजों की विरासत को छोड़ पाना अत्यंत कठिन था। दुनिया में हो रहे बदलाव के उस तूफान में समाज को सुरक्षित रख कर आगे ले चलने की कुशलता, समाज के अगुओं में, तब नहीं थी। वे अपनी संस्कृति और परम्परा पर ही कायम रहे।

बदलते परिवेश में, मुख्यधारा में मज़बूती से कदम रखने के लिए, नये तौर तरीकों को अपनाये जाने की आवश्यकता थी। उनमें ‘शिक्षा’- सीखने की कला, पहली प्राथमिकता थी। जिस संस्कृति के बल पर समाज युगों से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, उसकी गति अन्य समाजों के मुकाबले, धीमी रही। दिमाग की रफ्तार के बनिस्पत भावना की रफ्तार धीमी रहती है। लेकिन हाँ, आदिवासी अपने दिल का राजा होता है। अभी वैश्विक रफ्तार के लिए मानसिक शक्तियों पर काम करना आवश्यक था, खुद के एवं समुदाय के विकास के लिए। कुछ लोग आगे बढ़े लेकिन चतुर धूर्तों के हत्थे चढ़ गये। समाज का नेतृत्व नहीं कर सके।

संचार क्रांति का आगाज़ हो चुका था। समय की रफ़्तार की धार में आदिवासी पिछड़ता चला गया। आज अपनी पहचान तक का मोहताज। अगड़े जो पिछड़े थे, उन्हें भली भांति ज्ञात था कि आदिवासी क्या है। यदि आज भी वह समाज उठ खड़ा हो जाए तो दुनिया ही बदल डाले। लोकतंत्र कहाँ की पैदाईश है? लोकतंत्र किसे पसंद नहीं? लेकिन वर्तमान हालात देख कर प्रबुद्ध जनों के दिल में सिहरन पैदा हो जाती है।

वह समाज, जल, जंगल, ज़मीन का मालिक, घरती के 80 प्रतिशत संपत्ति का वारिस अपने पैरों पे, अपनी पूरी आन-बान और शान से कभी खड़ा ही न हो पाए, इसलिए सारी तिकड़म रची गई। उसकी संस्कृति, परम्परा, रूढ़ि, भाषा को थोड़ी तारीफ कर दी गई जिससे आदिवासी फूले नहीं समाते। शेर को साधने की पहली तरकीब। फिर, थोड़े से आरक्षण, छोटी सी नौकरी और कुछ सुविधायें पाकर वे गदगद हो जाते हैं। विकास एवं सेवा के नाम पर हमारे पैरों तले ज़मीन, जल, जंगल अपने अधिकार क्षेत्र से खिसकते चले जा रहे हैं और समाज अपनी अस्मिता बचाने के नाम पर Designed, Plotted, evil disputes में पड़कर आपस में लड़-कट रहा है जबकि अगला, अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए दौलत खड़ी करने में जुटा है। इस बात को समाज जानता है, इसलिए खुदको एक विशेषण भी दे रखा है – बोका। 

समाज अपने भटकाव के मार्ग पर कोसों दूर निकल चुका है। वापसी बहुत कठिन है पर अंसभव नहीं। उसे तो हकीकत जानने की ज़रूरत है। जहाँ वह खड़ा है या देख रहा है वह दूसरों द्वारा डिजाईन किया हुआ इतिहास है। अपनों ने अपना इतिहास कभी लिखा ही नहीं। गीत-संगीत एवं कहानियों में कुछ पंक्तियों अवश्य मिल जाती हैं। इनमें सैंकड़ों भेद दफन हैं। उन्हें कोई आदिवासी ही उजागर करेगा। दो पंक्ति का एक गीत पूर्वजों के DNA तक बिना लाग-लपेट के पहुंचा सकता है। आज भटका हुआ समाज, संस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर डीजे साउंड पर सांप और बन्दर की तरह हिल और उछल कूद कर रहा है।

आदिवासी संस्कृति की गरिमा को समझने एवं उस पर गर्व करने की आवश्यकता है। लोगों ने दिमाग में घोल रखा है कि आदिवासी पेड़ों की पूजा करता है। जी हाँ! आदिवासी सरहुल पर्व में मुर्गे की बलि चढ़ाता है। इस बलि का मर्म गैर आदिवासी के समझ के परे है। गुलाम मानसिकता का आदिवासी भी नहीं समझेगा। पुरखों के पास अपने मेहमान के प्रति उत्कृष्ट (Highest Level) सम्मान दिखाने के लिए क्या था? जिस कांसे की थाली में वह खाना खाया करता है, उसी थाली में मेहमान का पांव भी धोता है। उत्कृष्ट भोज के लिए घर का पाला-पोसा मुर्गा काटता है, इससे सर्वोत्तम स्वागत क्या हो सकता है? क्या यह अपने रिश्तों की पूजा नही? अपने दिल दिमाग से पूछें, क्या इसमें खुद के अस्तित्व की मिठास की झलक नहीं दिखाई देती?

क्या सम्पूर्ण प्रकृति (सखुआ), अपने पूरे यौवन की चमक एवं भव्यता के साथ प्रकट हुए भगवान की उत्कृष्ट उपासना नहीं है? भगवान, रूपक, चिन्ह, संकेत एवं दृष्टांतों के माध्यम से ही अपने भक्तों से संवाद करते हैं। इस स्तर की आध्यत्मिकता के भाव को दूसरा हरगिज नहीं समझ सकता। वह कहेगा- ‘तोंय तो रे शैतान मुर्गी मुड़ी खोजिसनल….’ समाज को ज़रूरत है अध्यन करने की। पढ़ के सीखने की नहीं, पढ़ के अनुभव करने की। वह सत्य, सत्य नहीं होता जो दूसरों द्वारा दिखाया जाता है। यदि बार-बार दिखाया जा रहा हो तो समझो वह असत्य ही होगा। सत्य इतना सस्ता नहीं हुआ करता।

भाई, आदिवासी कितनी उँचाईयों से गिरा है। विश्व के मानव समाज की दिशा एवं दशा तय करने वाले, स्वयं आज हाशिये पर हैं। मनोरंजन कब तक करते रहेंगे? नाच-गान, ढोल-नगाड़े ही संस्कृति नहीं है। टी.वी, मोबाइल  सूचना क्रांति के उपकरण हैं। दूसरे लोग इन्हे स्वयं के विकास के लिए उपयोग करते हैं, इनकी मदद से  दुनिया को हांकते हैं और हमारा समाज केवल मोबाइल से मनोरंजन में लीन है। सूचना क्रांति ने दुनिया को एक छोटा गाँव सा बना दिया है। प्रबुद्ध लोग इस क्रांति के माध्यम से छलांग लगाकर कोसों मील आगे निकल चुके हैं, वैचारिक क्रांति की दुनिया में। नए विचार ही (New Ideas) भविष्य के शासक होंगे। माना अपने पुरखों का लिखित इतिहास नहीं है लेकिन दुनिया में महामानवों की कमी नहीं जिन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता को ऐसा विकसित किया कि उनके जीवन की कहानियाँ इतिहास नहीं बल्कि पवित्र ग्रंथों के रूप में पूजी जाती हैं। बाबा भीमराव अम्बेडकर कोई आदिवासी नहीं थे लेकिन उन्हें इनकी चिंता थी। शिक्षा ने उन्हें महामानव बनाया।

आदिवासी थोड़ा अधिक ही स्वाभिमानी होता है। अति तो अंहकार है (Ego अर्थात तुम वह नहीं हो पर सोचते हो कि तुम वह हो) व्यक्तित्व क्या है? Personality (Personal realities) यदि Personal reality ही False हो तो Personality False होना तय है। और झूठ का कभी न कभी धाराशायी होना भी तय है। इसे ठीक करने के लिए सत्य का अनुसंधान करना होगा। चारों दिशाओं से परीक्षण करना होगा, वैज्ञानिक तरीके से। तब निष्कर्ष पर पहुंचेंगें। अतः उनका पीछा करो जिन्होंने सत्य का अनुभव किया और बताया है ‘गुरू’। देश में एक से बढ़कर एक गुरू हुए हैं, उनसे मिले। पढ़ाई लिखाई पेट के लिए छोड़, कभी मानसिक विकास के लिए किया? कितने सुशिक्षित परिवारों में दुनिया के 100 महान हस्तियों की किताबे हैं? शायद नहीं के बराबर। लोग पढ़ते भी हैं, पर सीखते नहीं। अब रूढ़ियों और परम्पराओं को तोड़ने की जरूरत है। तोड़ने का अर्थ त्यागना नहीं, मरम्मत करना है। पुराने मकान को तोड़ छील कर नये रूप और अंदाज में व्यस्थित एवं स्थापित करना (Transformation)।

मन एक उर्जा है। सभी को ऊपरवाले ने अपने जैसा ही बनाया है। थोड़े ही लोग इस अपार उर्जा की सृजनात्मकता को समझ पाते हैं। किसी ने बाज को आकाश में उड़ते देखा। कैसे उड़ता, क्यों उड़ता, कुछ अता पता नहीं। आज दिमाग ने उससे भी तेज़ उड़ने वाला यान हाथ में थमा दिया। यदि हमारे पुरखों को इस असीम ज्ञान की संभावनाओं का थोड़ा भी अहसास हुआ होता, तो धरती ही नहीं आकाश और पाताल पर भी हुकूमत करने की सीख वे दुनिया को दे चुके होते।

सवालों से डरें नहीं। कई सवालों के जवाब भी सवाल खुद हुआ करते हैं। हर सवाल का जबाव खुद हो। अब स्वयं से सवाल करने का वक्त आ गया। चुनौती क्या है? तुम स्वयं चुनौती बन जाओ।

Author

  • अल्बर्ट बिलुंग / Albert Bilung

    अल्बर्ट बिलुंग, झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और वर्तमान में संयुक्त सचिव, कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग, झारखंड सरकार में कार्यरत हैं। उनका चिंतन जाति, धर्म, संस्कृति व परंपराओं की जड़ता में उलझे समाज को बौद्धिक एवं आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से मुख्यधारा से जोड़ने पर केंद्रित है।

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