पुष्पा कुमारी:
आदिवासी समाज में महिलाओं का जीवन हमेशा से संघर्ष भरा रहा है। उनका जुड़ाव ग्रामीण परिवेश से रहा है और आज भी है। उनकी दिनचर्या पशुपालन, खेती-बाड़ी, रसोई और समाज के नाम से सामाजिक कार्यक्रमों तक ही सीमित रहती है। अशिक्षा के कारण वे अपने अधिकारों से वंचित रहीं और आज भी अपने ही घरों में हिंसा की शिकार होती रही हैं।
कहने को लोग खूब तारीफ़ करते हैं कि आदिवासी समाज मातृसत्तात्मक है, लेकिन आज की आदिवासी महिला केवल बच्चे पैदा करने और घर के कामकाज तक सीमित होकर रह गई है। सार्वजनिक हिस्सेदारी न के बराबर है। राजनीति में प्रतिनिधित्व के नाम पर जब से आरक्षण दिया गया है, तब से उसे केवल एक मुखौटा बनाकर रखा गया है। आज भी भले ही उसे सरपंच या प्रधान बना दिया जाता है, लेकिन सारा कामकाज, भागीदारी और डिसिशन मेकिंग (निर्णय) लेने की प्रक्रिया पुरुष ही करते हैं। महिला अपने दिल और दिमाग से कोई फैसला नहीं कर पाती। आदिवासी समुदाय में मातृसत्ता अब केवल नाम मात्र की बची है। राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में निर्णय पुरुष ही लेते हैं।
महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति अत्यंत खराब है। वे अच्छे जीवन का सपना तक नहीं देख पातीं। कुछ महिलाएँ ज़रूर नौकरी, प्रशासन, डॉक्टर या पीएचडी जैसे क्षेत्रों तक पहुँची हैं, लेकिन वे भी समाज की बुराईयों के रूप में दकियानूसी विचारों से जकड़ी हुई हैं।
खेती-बाड़ी और पारंपरिक कृषि ज्ञान लगातार सिमटता जा रहा है, जिसका सबसे भयानक प्रभाव आदिवासी समुदाय की महिलाओं पर पड़ रहा है। गरीबी, कुपोषण और निजीकरण ने महिला-पुरुष के रिशोते को भी नए सिरे से परिभाषित किया है।
दक्षिण राजस्थान के आदिवासी इलाकों में आत्महत्याओं की घटनाएँ भी सामने आ रही हैं। इन सबको मिलाकर यही कह सकते है कि महिला अब भी पुरुष के इर्द-गिर्द परिभाषित होती है। वह अपने खुद के आत्मसम्मान के साथ जीने के अधिकार से बहुत दूर है। समाज में रूढ़िवादी परंपरा के नाम से रीति-रिवाजों ने इतना ज़कड़ लिया है कि शिक्षित महिला भी विरोध नहीं कर सकती।
टोने-टोटकों और अंधविश्वास इतना है कि वह स्वास्थ्य के बारे में ख़ुद को उस परिवेश में धकेल रही हैं जहाँ घोर अंधकार है। अस्पताल पर उसका भरोसा नहीं रहा है, जिसके चलते वे सुविधाओं का लाभ नहीं ले पा रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कई महिलाएँ एनीमिया का शिकार हो रही हैं। प्रसव काल में भी खानपान सही नहीं होने से या सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाने से अनियमित माहवारी व और भी बहुत सारी बीमारियों से जान को खतरा रहता है।
आधुनिक दौर में जब आदिवासी महिलाएं राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं और शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है, लेकिन जहाँ सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, फैसलों का निर्णय करना हो, वहाँ महिलाओं की भागीदारी शून्य नज़र आती है।
जिस तरह सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर महिलाएँ अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रतिभा का प्रदर्शन कर उसे कमाने का ज़रिया बना रही हैं, वह आदिवासी समाज के पुरुषों को रास नहीं आ रहा है। उच्च शिक्षा के नाम पर भी आदिवासी महिलाएँ अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पा रही हैं, जिसकी सबसे बड़ी वजह आर्थिक परिस्थितियाँ हैं।
वर्तमान में कई महिलाएँ सामाजिक संगठनों और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। वे नेतृत्व कर रही हैं, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपने अधिकारों के बारे में जानकारी ले रही हैं और अधिकारों के लिए संघर्ष भी कर रही हैं। इसके बावजूद आदिवासी समाज आज भी ऋणग्रस्तता, भूमि हस्तांतरण, गरीबी और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का सामना करता है। इसके अतिरिक्त भी अन्य कई समस्याएँ हैं, जो कि आर्थिक रूप से आदिवासियों को प्रभावित करती हैं।
आदिवासी महिलाओं की राजनीतिक स्थिति –
भारतीय समाज में महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की तरह ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी शोचनीय रही है। स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता के बाद के दशकों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई।
भारतीय महिलाओं को नागरिक के रूप में संवेधानिक आधार व सभी अवसर भले ही प्राप्त हो, फिर भी राजनीतिक निर्णय में महिलाओं की भागीदारी स्वतंत्रता प्राप्ति के कई दशकों पश्चात भी सुनिश्चित नहीं हो पायी है।
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का मुद्दा जनवरी 1957 में गठित बलवंत राय मेहता समिति में प्रमुख रूप से उभरा। इसके तहत महिलाओं की स्थानीय प्रशासन की पाँच पंचायतों में भूमिका की अनुशंसा की गई। महिलाओं के सक्रिय राजनीति में कदम बढ़ाने में सर्वाधिक योगदान 73वें संविधान संशोधन को माना जाता है। इस अधिनियम के लागू होने के बाद महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता में क्रांतिकारी परिवर्तन आए।
राजस्थान के बाड़मेर जिले में 73वें संशोधन से पहले कोई भी महिला सरपंच नहीं थी, लेकिन इसके लागू होने के बाद 380 ग्राम पंचायतों में 121 पदों पर महिला सरपंच नियुक्त हुईं। इसके बाद साधारण ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं का पंचायतों से जुड़ाव बढ़ा।
पंचायती राज संस्थाओं में कमज़ोर वर्गों की भागीदारी बढ़ने के बावजूद भी उनके जीवन स्तर, शैक्षिक एवं स्वास्थ्य के क्षेत्रों में अपेक्षित गुणात्मक बदलाव नहीं आया। इसका एक बड़ा कारण हमारे पारंपरिक समाज में निहित सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ हैं। राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में पिछले कुछ दशकों के चुनाव परिणाम बताते हैं कि अपने निम्न शिक्षा स्तर और राजनीतिक माहौल की सूझ्भूज की कमी के बावजूद महिलाएँ और अनुसूचित जाति, व अनुसूचित जनजाति के चुने प्रतिनिधि अपने अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं और सदियों पुराने दमन से निकलकर नेतृत्व के रूप में उभर रहे हैं।
निषकर्ष –
वर्तमान संदर्भ में आदिवासी जनजातियाँ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से पिछड़ा और वंचित वर्ग में सम्मिलित की जाती हैं। सरकार द्वारा इन समुदायों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विभिन्न सफल कार्यक्रम चलाए जाते रहे हैं। आदिवासी महिलाओं का राजनीतिक नेतृत्व की दृष्टि से कद तो बड़ा है, परंतु उनकी सक्रियता में अब भी वांछित व उल्लेखनीय रूप से वृद्धि नहीं हुई है। राजस्थान के आदिवासी बहुल ज़िलों में विस्थापन, धर्म, अस्मिता, अस्तित्व, भाषा, शिक्षा आदि जैसी सामाजिक समस्याएँ, गरीबी, बेरोज़गारी और निम्न जीवन स्तर जैसी आर्थिक समस्याएँ एवं राजनीतिक अधिकारों की अनभिज्ञता प्रमुख राजनीतिक समस्याएँ हैं। आदिवासी महिलाओं के जीवन का बड़ा हिस्सा आज भी जंगलों तक सीमित रह गया है। जंगल कानूनों के लागू होने, लघु और कुटीर उद्योगों के चौपट होने, कृषि योग्य भूमि की कमी और मज़दूरी न मिलने आदि कारणों के चलते आदिवासी महिलाओं के सामने बेरोज़गारी की समस्या उत्पन्न हो रही है। ये महिलाएँ न केवल आर्थिक रूप से पिछड़ रही हैं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी उनकी सक्रियता सीमित है। इस सीमित सक्रियता के लिए सिर्फ राजनीतिक पार्टी ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज भी ज़िम्मेदार हैं, जो आज भी महिलाओं को राजनीति में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम एवं महिलाओं को पंचायत की सीटों में आरक्षण मिलने के पश्चात आदिवासी महिलाएँ विभिन्न पदों पर निर्वाचित तो हो रही हैं, परंतु उनका कार्य उनके पति, पिता या परिवार के अन्य पुरुषों द्वारा ही किया जाता है। वे मूकदर्शक के रूप में विभिन्न सभाओं व समितियों में मौजूद होती हैं। महिलाएँ स्वयं भी पंचायत और घर की ज़िम्मेदारियाँ एक साथ नहीं निभा पाने से या तो अपने पद से इस्तीफ़ा दे देती हैं या स्वयं को सक्रिय राजनीति से अलग कर लेती हैं। परिणामस्वरूप आदिवासी महिलाओं का राजनीतिक जीवन एक-दो चुनावों के बाद ही समाप्त हो जाता है। इसके साथ-साथ कार्यस्थलों पर भी महिलाओं को अन्य जनप्रतिनिधियों और नौकरशाही के उपेक्षापूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता है।

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