राजेश दामा:
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं होती, वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना का जीवंत दस्तावेज़ होती है। किसी भी समुदाय का इतिहास, उसका लोकज्ञान, उसकी परंपराएँ, संघर्ष और भविष्य की आकांक्षाएँ-सब कुछ भाषा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता है। भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में यह तथ्य और अधिक प्रासंगिक हो जाता है, जहाँ सैकड़ों भाषाएँ और हज़ारों बोलियाँ अस्तित्व में हैं। किंतु विडंबना यह है कि आज यही भाषाएँ और बोलियाँ, विशेषकर आदिवासी भाषाएँ, लुप्त होने और बचने की जद्दोजहद से गुजर रही हैं।
आदिवासी भाषाएँ भारत की सबसे प्राचीन भाषिक परंपराओं की वाहक हैं। ये किसी एक कालखंड में नहीं, बल्कि सदियों के सामूहिक अनुभव से निर्मित हुई हैं। जंगल, नदी, पहाड़, पशु-पक्षी, खेती, मौसम और सामुदायिक जीवन- इन सबका गहरा प्रतिबिंब आदिवासी भाषाओं में दिखाई देता है।
आज हम आदिवासी भाषाओँ में भीली भाषा की बात करना चाहता हूँ, जो पश्चिमी भारत के राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में बोली जाती है। यह इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। भीली केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की झलक है। इसमें पर्यावरणीय संतुलन, सामूहिक श्रम, लोकन्याय और सामाजिक नैतिकता की स्पष्ट झलक मिलती है।
भीली भाषा न केवल आज के दौर की भार रही हैं अपितु यह भील आदिवासी समुदाय की संस्कृति की वाहक रही हैं। हालांकि भीली भाषा लिखित में न होने के कारण इसके दस्तावेज़ बहुत कम उपलब्ध है। पर ब्रिटिश शासनकाल में भील आदिवासी समुदाय और उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा पर कोई शोध कार्य किए गए जिनमें Linguistic Survey of India में विशेष उल्लेख मिलता हैं साथ ही चार्ल्स एस थॉमसन द्वारा 1895 में लिखी किताब “Rudiments of the Bhili Language” में बहुत गहराई से भीली भाषा पर बात की गयी है और कई स्त्रोतों से प्राप्त जानकारी अनुसार भीली बोलने वाले लोगों की संख्या करोड़ों में हैं।
एक नज़र भील समुशासित राज्यों में फैले हुए हैं लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं गुजरात में इनकी संख्या काफ़ी अधिक है। 2001 की जनगणना के अनुसार भीली या भिलोड़ी बोलने वालों की संख्या 9582957 है, जबिक 1991 और 1981 में इनकी संक्या क्रमशः 5572308 तथा 4293314 थी। स्पष्ट है कि भीली भाषा बोलने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है।
लेकिन आज भीली भाषा के सामने भी सबसे बड़ा संकट उसका निरंतर हाशिए पर जाना है, जिसके भी कई कारण हैं-
- शिक्षा व्यवस्था – शिक्षा का माध्यम प्रायः राज्य या राष्ट्र की प्रमुख भाषाएँ होती हैं। आदिवासी बच्चों को प्रारंभ से ही अपनी मातृभाषा से दूर कर दिया जाता है। परिणामस्वरूप भाषा-हीनता-बोध पैदा होता है। उसे अपनी ही भाषा-बोली ‘गँवार’ लगने लगती है और नई पीढ़ी अपनी बोली को ‘कमतर’ समझने लगती है।
- शहरीकरण और पलायन – रोज़गार और शिक्षा के लिए जब आदिवासी समाज शहरों की ओर पलायन करता है, तो वहाँ प्रभुत्वशाली भाषाओं से घिर जाता है और अपनी बोली-भाषा उसे गाँव का अनपढ़ और मुख्यधारा से दूर जान पड़ता है। धीरे-धीरे घर-परिवार के भीतर भी मातृभाषा का प्रयोग कम होने लगता है।
- प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया – आज अख़बार, टेलीविज़न, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म – फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब – पर आदिवासी भाषाओं की उपस्थिति नगण्य है और इस दिशा में कोई पहल भी नहीं हो रही है। इस कारण नई पीढ़ी का भाषिक संसार मुख्यतः हिंदी और अंग्रेज़ी जैसी प्रमुख भाषाओं तक सीमित होता जा रहा है।
- संवैधानिक उपेक्षा – संविधान में भाषाई विविधता की मान्यता के बावजूद, ज़मीनी स्तर पर आदिवासी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस नीतियाँ बहुत कम दिखाई देती हैं। जिस कारण ग्रामीण व्यक्ति अपने संवैधानिक अधिकारों पर अपनी बात, अपनी भाषा में पहुँचा नहीं पाता।
भीली भाषा : अस्तित्व और संघर्ष
भीली भाषा आज एक संक्रमण काल से गुज़र रही है। एक ओर यह लाखों लोगों की रोज़मर्रा की भाषा है, दूसरी ओर इसके लिखित साहित्य, औपचारिक मान्यता और शैक्षणिक प्रयोग शून्य हैं।
भीली लोकगीत, कहावतें, कथाएँ, वार्ता और पर्व-संस्कृति आज भी जीवित हैं, किंतु वे मुख्यतः मौखिक परंपरा तक सीमित हैं। मौखिकता जहाँ एक ओर भाषा की जीवंतता का प्रमाण है, वहीं दूसरी ओर लुप्त होने का बड़ा जोखिम भी है, क्योंकि पीढ़ीगत अंतराल में बहुत कुछ खो जाता है।
भाषा का लुप्त होना केवल शब्दों का नहीं, ज्ञान का अंत होता है। जब कोई भाषा मरती है, तो उसके साथ केवल शब्द नहीं मरते, बल्कि उस भाषा में निहित संपूर्ण ज्ञान-परंपरा भी नष्ट हो जाती है।
भीली और अन्य आदिवासी भाषाओं में पुरखों का पारंपरिक ज्ञान, पारंपरिक चिकित्सा, जल-जंगल-ज़मीन के संरक्षण के तरीके, जंगली और वानस्पतिक ज्ञान, लोकन्याय की प्रणालियाँ और सामुदायिक जीवन के नैतिक मूल्य समाहित हैं। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में यदि ये भाषाएँ समाप्त हो गईं, तो मानव सभ्यता एक अमूल्य बौधिक धरोहर से वंचित हो जाएगी।
लेकिन स्थिति जितनी गंभीर है, उतनी ही आशा की किरणें भी मौजूद हैं।
बोली भाषा को बचाने के लिए सामुदायिक प्रयास करना बहुत ज़रूरी है। कई आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर अपनी भाषा में लोकगीत, नाटक, कहानियाँ और उत्सवों के कार्यक्रमों के माध्यम से भाषिक चेतना को जीवित रखने के प्रयास हो रहे हैं।
भाषा को बचाने का एक सबसे बड़ा प्रभावी प्लेटफार्म शिक्षा और इससे यह सिद्ध हो चुका है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने से बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़ती है। यदि भीली जैसी भाषाओं को प्राथमिक शिक्षा में स्थान मिले, तो यह भाषा-संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा। जैसे नवीन शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने का प्रावधान है अगर यह से लागू होता है तो अधिकांश आदिवासी भाषाएं बच सकती हैं और बच्चा आसानी से और जल्दी सीख सकता है।
भाषा बोली का लिपिबद्ध और दस्तावेज़ीकरण – भीली भाषा के शब्दकोश, व्याकरण, साहित्य, लोककथाओं और गीतों का संकलन अत्यंत आवश्यक है। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और स्वयं समुदाय की भागीदारी से भाषा को लिपिबद्ध और उसका दस्तावेज़ीकरण किया जा सकता है, और इस दिशा में सार्थक प्रयास हो रहे हैं। ट्राइबल एम्प्लाइज फेडरेशन (TEF) द्वारा भीली भाषा पर एक कार्यशाला का आयोजन करने का निर्णय किया है जिसमें लेखकों, साहित्यकारों, गीतकारों और कहानीकारों की अलग-अलग केटेगरी तय कर उनके कृतियों को चयन कर सर्वश्रेष्ठ को पुरस्कृत करने का तय किया हे जिससे भीली भाषा के लेखन पर गति आएगी I तथा आदिवासी परिवार के शिक्षाविद व समाज सुधारक दादा भंवरलाल परमार द्वारा भी भीली भाषा पर शब्दकोश तैयार किया हैं I
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग – आज सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक भाषा-संरक्षण का सशक्त माध्यम बन सकती है। भीली भाषा में ऑडियो–वीडियो सामग्री, सोशल मीडिया पेज और मोबाइल ऐप नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ सकते हैं। आज इस दिशा में कई आदिवासी कलाकार, इंफ्लुएंसर और कंटेंट क्रिएटर अपनी बातों और विचारों को फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर साझा कर रहे हैं।
आदिवासी भाषाओं का संरक्षण केवल भाषाई मुद्दा नहीं है, यह सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक मूल्यों का प्रश्न है। भीली भाषा और अन्य आदिवासी बोलियाँ यदि सुरक्षित रहेंगी, तभी आदिवासी समाज अपनी अस्मिता, आत्मसम्मान और ज्ञान-परंपरा के साथ आगे बढ़ सकेगा।
भाषा को बचाना दरअसल उस समाज को बचाना है, जिसने सदियों से प्रकृति और मानवता के बीच संतुलन बनाकर रखा है। आज आवश्यकता है कि राज्य, समाज और बौद्धिक जगत मिलकर यह स्वीकार करे कि आदिवासी भाषाएँ पिछड़ेपन की नहीं, बल्कि सभ्यता की जड़ों की प्रतीक हैं।
यदि यह स्वीकार्यता व्यवहार में उतरी, तो भाषा और बोलियाँ केवल लुप्त होने की जद्दोजहद नहीं करेंगी, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ भविष्य की ओर कदम बढ़ाएँगी। और यह समाज, देश और दुनिया के लिए पारंपरिक ज्ञान का नया खजाना हो सकता है।
आइए, हम सब मिलकर प्रयास करें कि आदिवासी अपनी संस्कृति और बोली-भाषा का संरक्षण करें और उन्हें अपनी बोली-भाषा पर गर्व महसूस हो।
जोहार। जय आदिवासी।
फीचर्ड फोटो आभार – Survival International

Leave a Reply