जितेन्द्र तबियाड, मन्ना लाल नेनोमा:
वीर बाला कालीबाई भील कलासुआ डूंगरपुर ज़िले के रास्तापाल गाँव की एक भील बालिका थी। उनके पिता का नाम सोमाभाई भील था तथा माँ का नाम नवली बाई था। वे किसान थे। जिनका खेत रास्तापाल गाँव के समीप ही था। वे खेती से ही अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे।
कालीबाई के पिता सोमाभाई गोविंदगुरू के आदर्शों से बहुत प्रभावित थे। आदिवासियों में फैली हुई सामाजिक कुरीतियों को मिटाने एवं उनमें जाग्रति लाने के लिए गोविन्दगुरू द्वारा बनाई हुई ‘सम्प सभा’ से प्रभावित होकर उन्होंने कालीबाई को पाठशाला भेजना शुरू किया था। कालीबाई भी पाठशाला से लौटकर अपने माता-पिता का घर और खेती के कार्यों में हाथ बंटाती थी।
आज़ादी से पूर्व ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ देशभर में आदिवासियों ने ही सैकड़ों युद्ध लड़े थे। वहीं ब्रिटिश गुलामी को नकारते हुए उनको नाकों चने चबवाये थे। इसी कारण देशभर के आदिवासियों पर अपराधी जनजाति अधिनियम लगाकर समकालीन रजवाडों और अंग्रेज़ों का भारत में क्रूरता और अत्याचार बढ़ता जा रहा था। राजे-रजवाड़े अपने क्षेत्र की ही जनता का बुरी तरह से दमन किया करते थे। 17 नवम्बर, 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर भील-मीणा आदिवासियों का नरसंहार किया गया था। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार लगभग 1500 से अधिक आदिवासियों को मौत के घाट उतारा था। सैकड़ों लहूलुहान होकर कुछ समय बाद वे भी काल के ग्रास बन गए।
डूंगरपुर के महारावल नहीं चाहते थे आदिवासी पढ़े:-
राजस्थान की रियासत डूंगरपुर के महारावल चाहते थे कि उनके राज्य में शिक्षा का प्रसार ना हो। क्योंकि शिक्षित होकर व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाता है। उस समय अनेक शिक्षक अपनी जान पर खेलकर विद्यालय चलाते थे।
नानभाई खांट और सेंगाभाई जो रास्तापाल गाँव में पाठशाला चला रहे थे। विद्यालय के लिए नानभाई खांट ने अपना भवन दिया था। इससे महारावल नाराज रहते थे। उन्होंने कई बार अपने सैनिक भेजकर नानाभाई और सेंगाभाई रोत को विद्यालय बंद करने के लिए कहा, पर स्वतंत्रता और शिक्षा के प्रेमी यह दोनों महापुरुष अपने विचारों पर दृढ़ रहे। यह घटना 17 जून 1947 की है। डूंगरपुर का एक पुलिस अधिकारी कुछ जवानों के साथ रास्तापाल गाँव पहुँचा। उसने नानाभाई खाट और सेंगाभाई रोत को पाठशाला तुरंत बंद करने की चेतावनी दी। जब वह नहीं माने तो पुलिस ने बेत और बंदूक की बट से सेंगाभाई और नानभाई को बेरहमी से मारना शुरू कर दिया। दोनों मार खाते रहे और घायल हो गये, लेकिन विद्यालय बंद करने पर राजी नहीं हुए।
नानभाई का वृद्ध शरीर इतनी क्रूर मार सह नहीं सका और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। इतने पर भी पुलिस अधिकारी का क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने सेंगाभाई को अपने ट्रक के पीछे रस्सी से बांध दिया। उस समय वहाँ गाँव के अनेक लोग उपस्थित थे। डर के मारे किसी को बोलने का साहस नहीं हो रहा था। उसी समय एक 13 वर्षीय भील बालिका कालीबाई वहाँ पहुंची। वह बालिका उसी विद्यालय में पढ़ती थी। उस समय वह जंगल में अपने पशुओं के लिए घास काट कर ला रही थी। उसके हाथ में तेज़ धार वाला हंसिया चमक रहा था।
उसने जब नानभाई और सेंगाभाई को इस दशा में देखा, तो वह चिंतित होकर वहीं पर रुक गई। उसने पुलिस अधिकारी से पूछा कि इन दोनों को किस कारण पकड़ा गया है। पुलिस अधिकारी पहले तो चुप रहा, पर जब कालीबाई ने बार-बार पूछा तो उसने बता दिया कि महारावल के आदेश के विरुद्ध विद्यालय चलाने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। कालीबाई ने कहा कि विद्यालय चलाना अपराध नहीं है, शिक्षा ही हमारे विकास की कुंजी है।
आदिवासी समाज में शिक्षा की रोशनी लाने के लिए प्रजामंडल आंदोलन के आह्वान पर, हर गाँव में विद्यालय खोले जा रहे हैं। पुलिस अधिकारी उसे इस प्रकार बोलते हुए देखकर बौखला गया। उसने कहा कि विद्यालय चलाने वाले को गोली मार दी जाएगी। कालीबाई ने कहा तो सबसे पहले मुझे गोली मारो। इस वार्तालाप में गाँव वाले भी उत्साहित होकर महारावल लक्ष्मणसिंह के विरूद्ध नारे लगाने लगे। अंग्रेज़ अधिकारी के आदेश से ट्रक से बांधकर सेंगाभाई को बुरी तरह घायल अवस्था में घसीटने लगे। यह देखकर कालीबाई आवेश में आ गई और उसने हंसिए के एक ही वार से रस्सी काट दी।
पुलिस अधिकारी के क्रोध का ठिकाना ना रहा। उसने अपनी पिस्तौल निकाली और कालीबाई पर गोली चला दी। कालीबाई के सीने पर गोली लगने से, वो लहूलुहान होकर गंभीर रूप से घायल होकर गिर पड़ी। इस लोमहर्षक घटना से सभी गाँव वाले आक्रोशित हो गए।
आदिवासियों ने मारू ढोल बजा दिया और जिसके पास जो हथियार था, वो लेकर पुलिस की तरफ पथराव शुरू कर दिया। मारू ढ़ोल बजाना युद्ध का संकेत था। जिससे डरकर पुलिस वाले भाग गए। आदिवासियों ने सेंगाभाई रोत और कालीबाई को चिकित्सालय पहुँचाया। नानभाई खांट की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो चुकी थी। उनका अन्तिम क्रियाकर्म रास्तापाल गाँव में किया गया। दो दिन के बाद 20 जून, 1947 को कालीबाई भी शिक्षा की अलख को जगाकर शहीद हो गयी। इस प्रकार कालीबाई के अमर बलिदान से शिक्षक सेंगाभाई रोत के प्राण बच गए।
उसके बाद पुलिस वालों का उस क्षेत्र में कभी आने का साहस नहीं हुआ। कुछ ही दिन बाद देश स्वतंत्र हो गया। आज डूंगरपुर और संपूर्ण राजस्थान में शिक्षा की ज्योति जल रही है। उसमें कालीबाई और नाना भाई जैसे बलिदानियों का योगदान अविस्मरणीय हैं। उस वीर बलिदानी बाल ज्वाला को आदिवासी समाज बारंबार जोहार के साथ नमन करता है और उसकी यश गाथा को सदा-सदा के लिए अनंतकाल तक अमर रखने का संकल्प दोहराता है।
फोटो फीचर – द मूकनायक

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