ज़ेनिथ संस्था:

सहरिया समुदाय मध्य प्रदेश में निवास करने वाला एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) और वन-निवासी समुदाय है। ऐतिहासिक रूप से जंगलों पर निर्भर रहने वाले इस समुदाय को अंग्रेज़ों के शासनकाल तथा उसके बाद लागू हुए वन संरक्षण प्रयासों के दौरान बड़े पैमाने पर विस्थापित किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी पारंपरिक आजीविकाएँ छिन गईं और उन्हें असुरक्षित शारीरिक मज़दूरी में धकेल दिया गया। वन कानूनों, भूमि अधिकारों से वंचना, प्रशासनिक उदासीनता और स्थानीय सामंतवादी संरचनाओं के गठजोड़ ने सहरिया समुदाय को धीरे-धीरे संसाधनों से काट दिया, जिससे उनकी गरीबी पीढ़ी दर पीढ़ी स्थायी बन गई।

सहरिया अपनी सरल और सादगीपूर्ण जीवनशैली, शर्मीले स्वभाव और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव के लिए जाने जाते हैं। उनका सांस्कृतिक जीवन नृत्य, गीत, कला और परंपराएँ, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के साथ जुड़ी हुई हैं। फिर भी, वर्तमान में ग्वालियर और शिवपुरी ज़िलों में रहने वाले सहरिया अत्यधिक गरीबी, कुपोषण और प्रणालीगत उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं। क्षेत्रीय सामंतवादी संरचनाएँ इस उत्पीड़न को और बढ़ावा देती हैं। विकास की नीतियों, कल्याणकारी योजनाओं और न्यायिक प्रक्रियाओं में लगातार बहिष्करण यह स्पष्ट करता है कि उनका हाशियाकरण आकस्मिक नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक प्रक्रिया का परिणाम है। संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद जागरूकता, शिक्षा और कानूनी सहायता की कमी के कारण अधिकांश सहरिया अपने अधिकारों तक पहुँचने में असफल रहते हैं।

प्रस्तुत लेख ग्वालियर और शिवपुरी ज़िलों के सहरिया समुदाय के जीवन, संघर्ष और अटूट हौसले का मार्मिक संकलन है। ये कहानियाँ केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं हैं, बल्कि उस ज़मीनी हकीकत का आईना हैं जहाँ विकास की चमक-दमक के बीच पूरा समुदाय अपनी मूलभूत आवश्यकताओं, ज़मीन और पहचान के लिए जूझ रहा है। यह संकलन यह भी दर्शाता है कि गरीबी और जानकारी के अभाव में कई मेधावी छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर होते हैं, फिर भी उनमें आगे बढ़ने की जिजीविषा जीवित रहती है। साथ ही, यह लेख उन नायकों को भी सामने लाता है जिन्होंने मज़दूरी की बेड़ियों को तोड़कर शिक्षा प्राप्त की और अब अपने समाज को कानूनी अधिकारों और वनाधिकारों के प्रति जागरूक कर रहे हैं।

ग्वालियर और शिवपुरी की ये आवाज़ें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि जहां एक ओर डिजिटल प्रगति की बातें होती हैं, वहीं एक समुदाय आज भी अपनी ज़मीन और आत्म-सम्मान की बहाली के लिए संघर्षरत है। यह संकलन उन्हीं अनकही कहानियों को मानवीय संवेदनशीलता के साथ सामने लाने का प्रयास है।

जीवन परिचय

1. मेरा नाम अंजलि आदिवासी है। पिता श्री मिस्त्री आदिवासी हैं। मेरा जन्म ग्वालियर शहर के बरई पनिहार के हॉस्पिटल में हुआ। मेरे परिवार में 5 सदस्य हैं – 1 भाई और 2 बहन, माता-पिता। मेरी प्रारंभिक शिक्षा मेरे ग्राम बजरंगपुरा में हुई तथा आगे की पढ़ाई खड़ी खेड़ा मड़ा गाँव में, जो कि हमारे गाँव के पास में ही है। 10वीं तक की पढ़ाई मेरी उसी विद्यालय में पूरी हुई है तथा मेरी पारिवारिक स्थिति ख़राब होने के कारण मेरी पढ़ाई आगे नहीं हो पाई है। वर्तमान में मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ हद तक ठीक हो गई है, इसलिए आगे की पढ़ाई शुरू कर दी है।

2. मेरा नाम रमेश कुमार, पिता श्री स्व. मायाराम। मेरा जन्म ग्वालियर शहर के डबरा तहसील के ग्राम नोन लीघोर में हुआ। मेरी प्राथमिक शिक्षा ग्राम हरसी के शासकीय छात्रावास में हुई, किन्तु बीमारी के कारण पढ़ाई को छोड़कर घर आना पड़ा। फिर घर पर ही पास के गाँव ग्राम झंडापुरा में 5वीं कक्षा तक अध्ययन किया। उसके उपरान्त कक्षा 6 से 8वीं तक की शिक्षा डबरा तहसील के वनवासी आदिवासी बालक छात्रावास से की। तत्पश्चात 9वीं कक्षा में ग्वालियर पढ़ने आया, किन्तु जानकारी के अभाव में कक्षा 9 में एक पेपर की परीक्षा न दे पाने के कारण पुनः लौट कर घर जाना पड़ा। पढ़ाई करने का मन में था तो पुनः डबरा के जनता हायर सेकेंडरी स्कूल में अध्ययन किया व कक्षा 9वीं से 12वीं तक पढ़ाई उसी स्कूल से पूरी की। इस बीच में मेरे साथ वापस जो हुआ वह यह था कि पारिवारिक स्थिति ठीक न होने के कारण मुझे 10वीं की पढ़ाई करने के लिए स्वयं मेहनत-मज़दूरी करनी पड़ी व अपनी पढ़ाई को सुचारू रूप से चालू रखा। शहर में रह कर पढ़ाई करने के लिए पैसे नहीं थे, तो घर से भाई की शादी में मिली साइकिल से ही 15 किलोमीटर दूर डबरा जाता। 3 साल तक लगातार मेहनत की और 12वीं की पढ़ाई को पूर्ण किया। उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई पुनः ग्वालियर जाकर पूर्ण की तथा वर्तमान में शासकीय सेवा का अवसर भी मिला। मेरे घर में 5 भाई, एक बहन है तथा मैं उनमें सबसे छोटा हूँ।

3. मेरा नाम रुकम आदिवासी है। मैं सहरिया समाज का जनसेवक हूँ और मैं प्रयास कर रहा हूँ कि सहरिया समाज की ज़मीन की जो महत्वपूर्ण समस्या है, वह आज तक ख़त्म नहीं हुई है। न तो बीजेपी सुनती है और न ही कांग्रेस सुनती है, इसलिए मैं कहना चाहता हूँ कि सहरिया समाज को इकट्ठा होकर आन्दोलन करना चाहिए। मैं सभी संस्थाओं से, जो चल रही हैं, उनसे निवेदन करता हूँ कि सहरिया समाज की मदद करो, क्योंकि इनकी कोई नहीं सुनता है – न तो विधायक सुनता है और न ही मंत्री-संतरी सुनते हैं। मैं सहरिया क्रान्ति का संभागीय उपाध्यक्ष हूँ।

4. मेरा नाम प्रेमनारायण आदिवासी है। मेरा जन्म मध्य प्रदेश के ज़िला ग्वालियर की डबरा तहसील की ग्राम पंचायत सिरसा के ग्राम सिरोल वार्ड न. 5 छिमक में हुआ। सहरिया आदिवासी समुदाय में मेरी प्राथमिक शिक्षा गाँव के विद्यालय में हुई, फिर माध्यमिक शिक्षा डबरा के जनता स्कूल में की। मेरे पिताजी का नाम ओमकार आदिवासी है, जो कि डबरा शुगर फैक्ट्री में मज़दूरी का काम करते थे। हम लोग 2 भाई, 2 बहन हैं। हमारे दादा भी शुगर फैक्ट्री में काम करते थे। हमारे पास 5 गायें भी थीं, जो हमारे दादाजी गाय चराने का काम करते थे। मैं भी दादाजी के साथ गाय चराने चला जाता, लेकिन हमारे दादाजी मुझे स्कूल में छोड़ आते तो मैं बहुत रोता कि मैं तो गाय चराऊँगा। पिताजी मुझे डाँटते और मैं गाँव में भाग जाता, आवारा घूमता तो माताजी भी डाँटतीं। फिर धीरे-धीरे फैक्ट्री बंद होने लगी और हमारी स्थिति ख़राब होने लगी। हम लोगों के खाने के लाले पड़ जाते थे। फिर कुछ ऐसा हुआ कि जिस फैक्ट्री की ज़मीन पर हम काम करते थे, उस ज़मीन पर हम लोगों ने कब्ज़ा कर लिया जिस पर हम काम कर रहे थे; खेती करने लगे और अपना भरण-पोषण करने लगे।

5. मेरा नाम अंकेश आदिवासी है। मेरे पिता का नाम श्री उम्मेद सिंह आदिवासी है, माताजी का नाम श्रीमती ममता है। हम घर में कुल 8 सदस्य हैं। हम 5 भाई हैं और मेरा जन्म 2007 में हुआ था। मेरी प्रारंभिक शिक्षा डबरा से हुई है और मेरे पिताजी एक किसान हैं। मेरे गाँव में एक छोटी सी किराने की दुकान है जिसे मेरी मम्मी चलाती हैं। मेरे सभी भाई पढ़ रहे हैं, जो एक 8वीं में और दूसरा 9वीं में है।  मेरा बड़ा भाई काम करता है। मैंने 10वीं तक पढ़ाई की और उससे आगे नहीं की; इसका कारण हमारी आर्थिक स्थिति है, जिसके कारण हमने आगे पढ़ाई नहीं की। यह मेरे एक छोटे से परिवार की कहानी है।

6. सन 1995 में मेरा जन्म ग्राम पंचायत बड़ी नोहरी कला में हुआ। मेरा जीवन संघर्षपूर्ण रहा। मेरे माता-पिता ने गरीबी सहते हुए कक्षा 11वीं तक मेरी पढ़ाई कराई, उसके बाद मेरी शादी हो गई। 2018 में मगरोनी ब्लॉक नरवर, तहसील नरवर, वार्ड क्रमांक 3 में रहते हुए कुछ साल हो जाने के कारण मैंने अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाने के लिए अपने पति द्वारा पढ़ाई जारी रखी। मेरे जीवन का संघर्ष मेरे पति नीरज द्वारा साझा किया जा रहा है; मैं अभी बी.एस.सी. कर रही हूँ।  हमारा संघर्ष हमारी पढ़ाई थी। फिर हमने सामाजिक कार्यकर्ता एकता परिषद् द्वारा समाज में आदिवासियों को उनका हक और अधिकार दिलवाने का कार्य किया। आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार एवं ज़मीन के मुद्दों पर, जहाँ वन विभाग और राजस्व भूमियों को दबंग लोग आदिवासियों से छीन रहे हैं, आदिवासी समाज के हक के लिए लड़ना हमारा यह संघर्ष रहा है और आगे भी करते रहेंगे। वर्तमान में मैं आंगनवाड़ी सहायिका के पद पर कार्यरत हूँ और अपना जीवन-यापन कर रही हूँ, साथ ही समाज के साथ सामाजिक कार्य भी कर रही हूँ।

7. मेरा नाम नैना आदिवासी है। मैं वर्तमान में वार्ड न. 39 ठाकुरपुरा, ज़िला शिवपुरी में रहती हूँ।  मेरे घर वालों ने मुझे मज़दूरी करके पढ़ाया है। फिर मेरी शादी को लेकर चर्चा हुई और मेरे ससुराल वालों से मेरे घर वालों ने बोला कि हमारी लड़की अभी पढ़ाई कर रही है, हम तभी शादी करेंगे जब तुम हमारी लड़की को आगे पढ़ाओगे। फिर मेरी शादी कर दी गई। शादी से पहले मैंने 11वीं की थी, उसके बाद 12वीं और बी.ए. किया। फिर मैंने ससुराल में आर्थिक स्थिति देख कर ‘एकता परिषद्’ में वन भूमि एवं जन-समस्या को लेकर 4 साल तक काम किया।  उसमें बहुत कुछ सीखा, जैसे वन भूमि के पट्टे का फॉर्म कैसे तैयार करते हैं और दस्तावेज़ कैसे बनाए जाते हैं। कलेक्टर को ज्ञापन देना और वन भूमि के मुद्दों को लेकर बहुत संघर्ष किया। पढ़ाई के साथ-साथ ‘एकल अभियान’ में भी काम किया, जिसमें बच्चों को संस्कृति सिखाना और पढ़ाने का कार्य किया।

8. मेरा नाम साहब सिंह है और मेरा जन्म 1993 में ग्राम पंचायत कलोथरा (शिवपुरी ज़िला) में हुआ। मेरे जीवन का संघर्ष यह रहा कि मेरे माता-पिता ने मुझे पढ़ाया और मैं पढ़ता रहा। हमारे गाँव के स्कूल में मैंने अपनी पढ़ाई कक्षा 8वीं तक सन 2008 में पूरी कर ली। तब जाकर मेरे पापाजी ने मुझे शिवपुरी पढ़ाई के लिए भेजा। कुछ 6 महीनों तक पढ़ाई चलती रही, लेकिन पैसा नहीं होने के कारण मेरी पढ़ाई अधूरी रह गई, जिससे मेरे जीवन में अंधकार सा छा गया। पढ़ाई पूरी न होने के कारण और गरीबी की वजह से मैंने अपने गाँव से बाहर पलायन कर लिया।  उस समय मैं 50 रूपए की दिहाड़ी पर मज़दूरी करता था और अपना जीवन-यापन करता रहा। मज़दूरी करते-करते मुझे 10 साल हो गए। तब फिर से अपने जीवन का एक फ़ैसला लिया कि हम कुछ अच्छा करेंगे, जिससे कि हमारे जीवन में पढ़ाई-लिखाई काम आए और 50 रुपए की मज़दूरी न करनी पड़े। तो हमने हमारे गाँव कलोथरा में पानी और ज़मीन पर अपना ध्यान केंद्रित किया। गाँव के साथ घर-घर बैठक की, उनसे उनके अधिकारों पर चर्चा करते रहे और समाज में हो रहे अत्याचारों पर हमने एक सोच बनाई। आदिवासी समाज को एकजुट करने पर विचार रखते-रखते आज हम आदिवासी समाज के बीच में उनके मूलभूत अधिकारों और ज़मीन के मुद्दों पर काम करते हैं। आज उनके साथ उन्हें अपने अधिकार दिलाने का काम किया करते हैं। हमारे जीवन का उद्देश्य यही था कि पहले हमने अपने आप को बदला, फिर अपने परिवार वालों को, तब गाँव व समाज को बदलने का कार्य कर रहे हैं। यह मेरे जीवन की अभी तक के परिश्रम की कहानी है। 

9. मेरा नाम रामपाल आदिवासी है, ग्राम बसाहर, तहसील खनियाधाना, ज़िला शिवपुरी। मैंने अपने जीवन में दो वर्ष ज़मीन के ऊपर कार्य किया है। जब मैं ‘एकता परिषद्’ में कार्य करता था और अपनी फील्ड पर जाता था, तो लोगों को बताया कि भाइयों, जो अपनी ज़मीन है, 2006 (वनाधिकार अधिनियम) के तहत वो आपके पास नहीं है; उसके कागज़ लगाकर आपकी ज़मीन आपके पास होगी। तो वे बोलते थे कि हमारे पास कागज़ नहीं हैं। तो मैं बोलता था कि भाइयों, कागज़ मैं बनवा दूँगा, आप खनियाधाना तो आओ। जो लोग समझदार होते थे वे लोग तो आ जाते थे और उनकी ज़मीन के कुछ पट्टों के फॉर्म भी भरवाए थे। लेकिन कुछ लोग बोलते थे कि यह फ़र्ज़ीवाड़ा कर रहा है, यह नहीं करवा सकते। वे लोग अपने ही समाज के लोगों पर बहुत कम विश्वास करते हैं। विश्वास दिलाया तो वे बोलते थे कि तुम नहीं कर पाओगे, क्योंकि वे लोग नहीं चाहते हैं कि हम सुधर सकें। हमारे पिछोर विधानसभा में लगभग 4 हज़ार से 5 हज़ार तक पट्टे नहीं मिले हैं, इस कारण वे लोग बातों पर कम विश्वास करते हैं।

10. मेरा नाम राजेश कुमार आदिवासी है और मैं शिवपुरी ज़िले के सेक्र गाँव से हूँ। हम इस गाँव के मालिक थे। हमारे पूर्वजों को बहलाया-फुसलाया गया और कहा गया कि आप तो इस गाँव के पटेल साहब या मुखिया हैं, हमें आपसे आपके गाँव में रहने के लिए कुछ ज़मीन चाहिए। तो हमारे पूर्वजों ने उनके कहने पर उन दबंग लोगों को ज़मीन रहने के लिए दी और उनको खाने के लिए दिया, जैसे राली, कुटकी, कोदो, फिकार पीस के चक्की या ओखली से। इसी तरह काफी समय तक वे रहने लगे, फिर उन दबंगों ने खेती के लिए ज़मीन माँगी। फिर हमारे पूर्वजों ने उन्हें खेती के लिए ज़मीन दी। इस तरह हमारे पुरखों ने गाँव की आधी-आधी ज़मीन कर दी। पहले जागीर वाले गाँव होते थे, उसी समय ग्वालियर वाले महाराज जीवाजी राव या उनके पूर्वजों ने हमारे मुखिया आदिवासी को पगड़ी दी थी। उन लोगों ने बहला-फुसला कर वह पगड़ी ले ली। इसी तरह षड्यंत्र के तहत उन्होंने कहा – ‘पटेल दादाजी, आपके पास 250 गायें हैं, आप तालाब के पास जाओ, आपकी गायों को पानी मिलेगा।’ और चराने के लिए हमारे दादाजी उसी गाँव से निकलकर दूसरी जगह तालाब के पास रहने लगे। जब बारिश काफी हुई तो उनके घर या झोपड़ी डूबने लगे, तो वे वहाँ से तीसरी जगह आ गए। फिर भी वे लोग संतुष्ट नहीं हुए और कहने लगे – ‘पटेल साहब, हमारी गाय-भैंसों को चराने के लिए ज़मीन दे दो, आपकी ही है पर हमारी गाय-भैंसें चरती रहेंगी आधी।’ फिर उनको आधी ज़मीन दे दी। फिर कुछ समय बीता, जब बंदोबस्त के पट्टे हुए तो उन लोगों ने पट्टे करा लिए। इसी तरह अब जो हमारे पास ज़मीन है, उसी में नागाहोरी डैम की नहर निकल गई। तालाब के भरने और नहर निकलने से हमारी ज़मीन आज की स्थिति में एक व्यक्ति के पास मात्र एक बीघा या आधा बीघा ही बची है। हमारा गाँव था, गाँव के हम मालिक थे; उनको छल से या चालाकी से वे लोग अमीर बन गए, हम लोग गरीब हो गए। इसी में एक और कहानी है, हमारे गाँव में एक पहाड़ है जिसका नाम पोला पहाड़ है। उसी समय इस गुफा में सिद्ध संत रहते थे। उन्होंने यहाँ पर घोर तपस्या की थी। उनके तप के बल पर वे समाधि ले गए और कह कर गए कि जब तक मैं वापस नहीं लौटूँ, तब तक मेरे शरीर को मत जलाना। वे कह कर समाधि ले गए, तो उसी के पास झालोनी एक रानी थी, उसने कहा कि आप ऐसी बातों पर क्यों विश्वास कर रहे हैं, जो आदमी शरीर से आत्मा छोड़ता है वह कभी वापस नहीं आता। रानी के कहने पर उनका पूरा शरीर जला दिया गया। जब ‘नकी’ वापस आए तो उनके पैर जलने से बच गए, नहीं तो सवा पहर जो चन्द्री के काँच की वर्षा होनी थी, वह हमारे गाँव में बरसती। हमारे सिद्ध बाबा, हमारे पूर्वज पूजा करते थे। आज वे हमसे हीन भावना से घृणा करते हैं, बल्कि हमारा गाँव, हमारी ज़मीन – हम मालिक थे, आज कोई और मालिक बन बैठा है।

Author

  • Zenith Society for Socio-Legal Empowerment is a non-profit organisation working on grassroots legal empowerment of the Sahariya Adivasi Community in Madhya Pradesh.

    Zenith works with the community in order to build their capacity in understanding their legal rights, defining their ideas of change, and taking appropriate measures in order to live a more just and dignified life.

    ज़ेनिथ सोसाइटी फ़ॉर सोशियो-लीगल एम्पावरमेंट एक गैर-लाभकारी संस्था है, जो उत्तरी मध्य प्रदेश में साहरिया आदिवासी समुदाय के जमीनी स्तर पर कानूनी सशक्तिकरण के लिए कार्य करती है।

    ज़ेनिथ, समुदाय के साथ मिलकर उनकी क्षमता का निर्माण करता है ताकि वे अपने कानूनी अधिकारों को समझ सकें, बदलाव के अपने विचारों को परिभाषित कर सकें, और एक अधिक न्यायपूर्ण एवं गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक कदम उठा सकें

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