वाहरू सोनवणे:

आदिवासियों के मुद्दे और आदिवासियों के विकास के लिए आदिवासियों को आगे आना चाहिए, एकजुट होना चाहिए, अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए, समस्याओं का समाधान करना चाहिए, आदिवासियों द्वारा आदिवासी पहचान के आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए ऐसा कहने पर हर एक को धक्का लगता है, और आशंकाओं का तूफ़ान उनके दिल और दिमाग़ में उमड़ने लगता है। उनके प्रश्नचिह्न तैरने लगते हैं और ये क्या अलग कर सकेंगे? इनमें क्षमता नहीं ऐसे चिल्लाएँगे, एक-एक की न्यूनता उजागर कर नीचा ठहराएँगे (ये ऐसा, वो वैसा करते रहेंगे)।

दरअसल उनके सामने सबसे बड़ा और सबसे अहम सवाल यह है कि आदिवासी आंदोलन में हमारी क्या जगह है और हमारी क्या भूमिका होगी? उनके मन में यही डर है जो उन्हें बेचैन कर देता है और कई शंकाओं को जन्म देता है।

सच तो यह है कि उनके सामने सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण सवाल यही होता है कि आदिवासी आंदोलन में उनका स्थान क्या है और उनका रोल क्या होगा? उनके दिल में बैठा यही डर उन्हें बेचैन कर देता है एवं अनेक आशंकाओं को पैदा करता है।

तो कुछ लोग झिझकते हुए कहेंगे अच्छी बात है कि आदिवासी ही आदिवासी मुद्दों के लिए खड़े होते हैं। लेकिन उन्हें उठना चाहिए, टिके रहना चाहिए इस प्रकार वाक्य पूरा करते-करते आशंका लेते हैं। उन्हें विश्वास नहीं है कि आदिवासी अपने बल पर आगे बढ़ेंगे और अगर कुछ आदिवासी कार्यकर्ता कोशिश करेंगे तो वे असफल हो जाएँगे। क्योंकि हमारे जितना अनुभव आदिवासियों को कहाँ है? आंदोलन चलाने की अक़्ल नहीं है। वह बुद्धि हममें है। उनके मन में यह अहंकार गहराई से निहित है कि वे एक वैचारिक भूमिका निभाकर आंदोलन को दिशा दे सकते हैं, और इसे चुनौती देते आदिवासी ख़ुद उठ रहे हैं और उनके नेतृत्व को ख़ारिज कर आगे बढ़ने का फ़ैसला कर रहे हैं। उनका काँपना स्वाभाविक है। वे नाराज़गी से पीड़ित न होते हुए अन्यथा, वर्चस्व और नेतृत्व के लिए उनका संघर्ष शुरू हो जाता है। अपनी जान जोखिम में डालकर मैंने आदिवासियों के लिए काम किया यह एक या दो बार नहीं, ‘हाँ’ कहने तक बताते रहेंगे। तो कुछ आदिवासी आंदोलन की गंभीरता ध्यान में लेकर सहयोग पर विचार करेंगे यह भी उतना ही सच है।

आदिवासी समाज में आज भी कई समस्याएँ हैं। इन समस्याओं को हल करने के लिए आदिवासी समुदाय के विभिन्न वर्गों में संगठन और समूह काम कर रहे हैं और आदिवासी समुदाय के लिए न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इतना ही नहीं, सरकार आदिवासियों के लिए, उनके लिए, उन्हें न्याय दिलाने के लिए भी प्रयास कर रही है। यह होते हुए आदिवासियों के लिए अलग मंच की ज़रूरत क्यों है? ऐसा सवाल उठता है।

इन सवालों का जवाब चाहते हैं तो आपको इतिहास में वापस जाना होगा। आदिवासी एवं गैर-आदिवासी तथाकथित सुसंस्कृत, सभ्य समाज का नाता इतिहास में क्या है? आदिवासियों के जीवन के विशिष्ट तरीके और संस्कृति का स्थान इसका जो चित्र उभरता है, उस पर स्वतंत्र रूप से अलग विचार मंच की क्या आवश्यकता है, यह स्पष्ट होगा।

पहले हमने देखा है कि आदिवासी क्षेत्रों में अनेक संगठन अपनी क्षमता के अनुसार विविध प्रश्नों और मुद्दों को लेकर अच्छा काम कर रहे हैं। उनका महत्व जानते हुए और उन्हें उनका श्रेय देते हुए यह समझना ज़रूरी है कि इस आंदोलन का नेतृत्व गैर-आदिवासियों या गैर-आदिवासी दलों के हाथों में है। इसलिए ऐसा नहीं लगता कि यह आंदोलन अन्याय, उत्पीड़न और पेट की समस्याओं से आगे निकल गया है। आदिवासियों के बुनियादी मुद्दे बने हुए हैं; आत्मसम्मान की भावना को जगाने के बजाय निर्भरता की भावना पैदा करके अपना प्रभुत्व स्थापित करते हैं।

इसलिए बुनियादी आदिवासी संस्कृति और आदिवासी पहचान के लिए आदिवासियों के जीवन के तत्व लेकर आत्मसम्मान का आंदोलन होता दिखाई नहीं देता। इस विचार से आदिवासी जीवन केंद्र में जाकर उस जीवन के मूल्यों पर किसी ने नज़र नहीं डाली। इसलिए आज भी आदिवासियों के प्रति तिरस्कारपूर्ण रवैया व्यवहार में जीवित है। आदिवासी समुदाय को नीचा दिखाने के अलावा सभ्य माने जाने वाले समाज में आदिवासियों का क्या कोई स्थान नहीं है?

आदिवासियों को नीचा दिखाने वाले सिर्फ़ चाँद का दाग़ देखते हैं, उन्हें रोशनी नहीं दिखती। रोशनी देखने की उनमें नज़र होनी चाहिए। आदिवासी जीवन में कई ऐसे जीवन-मूल्य हैं जो मानव जीवन को सुशोभित और सुंदर बना देंगे।

आदिवासियों के बीच एक परंपरा है कि अगर आदिवासी कुछ वस्तु या ज़मीन गिरवी रखना चाहते हैं या कोई समझौता करना चाहते हैं, तो गाँव के दो या पाँच लोग (पंच) बैठ जाते हैं और ऐसा सौदा होता है कि आपका भरोसा मुझ पर है और मेरा भरोसा आप पर है बस हो गया सौदा! लेकिन जो समाज ख़ुद को सभ्य मानता है, यदि कोई भी लेन-देन करता है, तो वह मनुष्य को मनुष्य के रूप में नहीं मानता। वे तुरंत स्टाम्प लिखते हैं। उनका काग़ज़ पर विश्वास है। यह संस्कृति अच्छी है या ऐसी संस्कृति जो मनुष्य पर मनुष्य के नाते विश्वास रखती है वह अच्छी है? आदिवासी संस्कृति मनुष्य पर विश्वास रखती है।

आदिवासियों में भीख माँगने की परंपरा नहीं है। यद्यपि आदिवासी घर में अंधा, लंगड़ा, अपंग है, वह उससे घृणा नहीं करता है। वे उसे उसके घर में समान स्थान देकर समायोजित करते हैं। घर में कितनी भी ग़रीबी क्यों न हो, उसे भीख नहीं माँगने दिया जाएगा। आदिवासी भीख नहीं माँगते (आदिवासी देवता भी भीख नहीं माँगते)। सभ्य समाज में अंधे, अपंग लोग भीख माँगते हैं। वे हाथों में पोथी और झोली लेकर भीख माँगते हैं। उनके देवता सोने-चाँदी के होकर भी माँगते हैं। ईश्वर के द्वार पर दान-पेटी (पेटियाँ) रखी जाती हैं।

हम यह नहीं मानते या दावा करते हैं कि आदिवासियों के सभी मूल्य और परंपराएँ अच्छी हैं। दूसरों की तरह आदिवासियों में भी अंधविश्वास है। आदिवासी महिलाओं को ‘चुड़ैलों’ के रूप में पीटकर मार दिया जाता है यहाँ अंधविश्वास और पुरुष-प्रधानता है। इनके ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठानी चाहिए। जागरूक कार्यकर्ताओं ने समाज को अंधविश्वास और पुरुष वर्चस्व को मिटाने के लिए प्रेरित करना चाहिए और यदि अन्य समाजों में अच्छे मूल्य हैं तो उनके मूल्यों को स्वतंत्र रूप से और ख़ुशी से स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन हम उन्हें कहते हैं जो मुख्यधारा में बहते हैं हम अपना सुधार करेंगे, लेकिन आप भी अपने आप को सुधारें और मानव संस्कृति की स्थापना कर मिलकर आगे बढ़ें।

आदिवासी भारत के घने जंगलों, पहाड़ों, घाटियों में अपना जीवन व्यतीत करते थे। उस जंगल, उस क्षेत्र पर आदिवासियों का अधिकार था। सत्ता थी। फल, फूल, लकड़ी, शिकार आदि के संबंध में किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी। आर्य ख़ैबर दर्रे से भारत आए। वे रथ, भाले, कुल्हाड़ी, घोड़े और जानवर लाए और उन्होंने आदिवासियों पर पहला हमला किया।

अपने यहाँ एक अजीब बात है संस्कृति यानी धर्म यह धारणा है। क्योंकि आदिवासियों का कोई तथाकथित धर्म नहीं होता। आदिवासी अमुक एक धर्म के हैं ऐसा ठप्पा लगाना हमें मंज़ूर नहीं। यह मानना कि आदिवासी हिंदू धर्म से हैं, यह हम पर एक सीधा-सीधा धार्मिक हमला है। भारत की विभिन्न आदिवासी जनजातियाँ हैं। उनकी अपनी अलग संस्कृति है। इस आदिवासी समूह का प्रकृति से स्वतंत्र संबंध है। आदिवासी समुदाय की संस्कृति में स्त्री-पुरुष संबंध भी भिन्न हैं, जो दिखाए जा सकते हैं। जिन देवताओं से इन आदिवासियों की मान्यताएँ जुड़ी हैं, वे प्रकृति-प्रधान हैं। मुख्यतः हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई धर्म ने जहाँ आदिवासी समुदाय पर उनकी संस्कृति थोपने का प्रयास जहाँ जितनी मात्रा में हुआ है वहाँ उतनी मात्रा में आदिवासियों के पूरे सामुदायिक जीवन पर प्रभाव पड़ा है।

आदिवासी ही यहाँ की ज़मीन के असली मालिक हैं। मूल मालिक हैं इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। पहले यह मान लेना चाहिए कि आदिवासियों का तथाकथित कोई भी धर्म नहीं है। अधिकांश आदिवासी (कुछ अपवादों को छोड़कर) आदिवासी तरीके से जन्म, मृत्यु और विवाह की रस्में निभाते हैं। शादी के लिए क़ाज़ी या ब्राह्मण की ज़रूरत नहीं। आदिवासी कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं करते। असली कारण यह नहीं है कि आदिवासियों ने विज्ञान की नई दृष्टि से हिंदू धर्म के कर्मकांडों को त्याग दिया है, बल्कि यह है कि आदिवासी हिंदू बिल्कुल नहीं हैं। आदिवासियों के अंधविश्वास, आदिवासियों के भगत आदि आदिवासियों के बड़वा-हिंदू संस्कारों से नहीं बने, बल्कि वे आदिवासियों की ज़रूरत और सदियों से प्रकृति के साथ रहते हुए आए हैं और टिके रहे हैं। जब बारिश होती है और जंगल हरा हो जाता है, तो आदिवासी अपने तरीके से बाघ भगवान की पूजा करते हैं और फिर अपने मुँह में हरी पत्ती डालते हैं। इसका हिंदू ऋषि पंचमी से कोई लेना-देना नहीं है। आदिवासी जीवन में सुख-दुःख के अवसर पर महुए की शराब पीते हैं। आदिवासी के भगत (पुजारी) शराब पीते हुए घूमते हैं, हिंदू धर्म में पुजारी चोरी से शराब पीते हैं। लेकिन धर्म के नियमों में ऐसी बहुत-सी बातें बताई जा सकती हैं। तो आदिवासी नेता स्वाभिमान को छोड़कर जिन्हें ख़ुद को हिंदू कहलाना पसंद है, वे अपनी मर्ज़ी से कहला लें, लेकिन आदिवासी हिंदू ही हैं यह हट न करें। ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को ईसाई धर्म की उपासना ज़रूर करनी चाहिए। जो आदिवासी इस्लाम धर्म के हुए हैं, उन्हें मुसलमानों की तरह अल्लाह की पूजा करनी चाहिए। लेकिन जिन्होंने धर्म को स्वीकार नहीं किया है या किसी भी धर्म में परिवर्तित नहीं हुए हैं, उन्हें ख़ुद को किसी भी धर्म का नहीं कहना चाहिए। बस आदिवासी कहो। आदिवासियों को, चूँकि वे हिंदू हैं, इसलिए उन्हें हिंदू धर्म में लपेटने का अवसरवादी प्रयास करने की कोशिश न करें। जिन्होंने अभी तक किसी भी धर्म को नहीं अपनाया है या जो अभी भी इस तरह के धार्मिक लालच और आक्रामकता के शिकार हुए बिना आदिवासी संस्कृति का योग्य अभिमान (दुराभिमान या अलगाववाद नहीं) रखने वाले आदिवासियों को ख़ुद को आदिवासी कहलाना पसंद है। हमें कुछ पिछड़ेपन से निश्चित ही बाहर निकलना है। विकसित होना है। राष्ट्र-निर्माण में अहम भूमिका निभानी है। लेकिन हमें किसी धर्म के प्रभुत्व की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं।

इस बात का बहुत बड़ा ख़तरा है कि धर्मांतरण और संस्कृति को नष्ट करने के प्रयासों से परे, आदिवासियों की नज़र हटा दी जाएगी। अपनी नज़र से नहीं, तो दूसरों की नज़र से देखना दूसरों के नज़रिए से देखना यह आदिवासियों के लिए एक धोखा और ख़तरा साबित होने वाला है। इसलिए जो आदिवासी अपनी पहचान की तलाश में हैं, उन्हें यहाँ सावधान रहना चाहिए।

आदिवासियों के अन्याय और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ लड़ाई में दूसरों ने हमारे लिए लड़ना और हमें ख़ुद के लिए लड़ना इसमें बुनियादी अंतर है। क्या दूसरे को आपके लिए सहानुभूति या अपनेपन से नहीं लड़ना चाहिए? उन्हें आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए ईमानदारी से लड़ना चाहिए। लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जो लड़ाई दूसरे आपके लिए लड़ रहे हैं और जो लड़ाई आपने अपने इंसाफ़ के लिए शुरू की है इन दोनों में ज़्यादा धार किसमें होगी? बेशक, आदिवासियों द्वारा आदिवासियों के लिए लड़ी गई लड़ाई ही आदिवासियों को अधिक न्याय दिला सकती है।

यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या आदिवासी दूषित समाज में न्याय के लिए ईमानदारी से लड़ सकते हैं। कृपया इसमें संदेह न करें। आदिवासियों पर विश्वास करने की कोशिश करो। अगर विश्वास करना मुश्किल हो रहा है, तो यह स्पष्ट है कि आदिवासियों को कितना दबाव में रखा गया है।

आदिवासी मुद्दों के लिए आदिवासी आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए, आदिवासी आंदोलन ने अपने अस्तित्व का निर्माण करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। यदि आपको शिक्षा प्राप्त करनी है तो आपको सरकारी या किसी और के स्कूल में जाकर प्राप्त करनी पड़ती है। इलाज कराना है तो आप सरकारी या निजी अस्पताल में कराते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में वैकल्पिक व्यवस्था बनानी होगी जैसे कार्य, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य, कला आदि। यहीं आपके आंदोलन की दिशा निर्धारित होनी चाहिए। दूसरों की दया पर जीने से आदिवासी समृद्ध नहीं होंगे।

आदिवासियों को सरकार ने कई सुविधाएँ दी हैं। हममें से अधिकांश लोगों को लगता है कि सरकार ने दी सुविधाओं के लिए भी झगड़ना पड़ता है, और वह मिल जाए तो काफ़ी है। लेकिन इन सुविधाओं से परे विचार करना होगा कि एक आदिवासी के जीवन का सपना क्या हो सकता है।

पहली पीढ़ी के आदिवासी पढ़-लिखकर सँवर गए और कुछ कर्मचारी, अधिकारी बन शासन-दरबार में शामिल हुए हैं। तो कुछ ने सरकार के दरबार में न जाकर सामाजिक आंदोलन का रास्ता चुना और समाज की न्यायिक लड़ाई में रत हुए। आज आदिवासियों की इन दो पीढ़ियों को जोड़ लिया जाए तो समाज को क्या मिलेगा?

इन दो पीढ़ियों के मन में समाज का क्या स्थान है? उनका समाज के बारे में क्या सपना है और उन सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने क्या प्रयास किया? कैसे प्रयास किया? उनके प्रयासों का क्या हुआ? इस स्थिति को समझना होगा।

कैसे उन्हें समाज में फल-फूल रही ऊर्जा का साथ मिला यह समझना ज़रूरी है कि किस स्थिति में कौन-सा मोड़ मिला। इसके बिना आंदोलन की बाधाएँ और आंदोलन की दिशा स्पष्ट नहीं होगी।

एक स्नातक आदिवासी युवा या कर्मचारी को ख़ुद को आदिवासी कहने में शर्म क्यों महसूस होती है? जो भाई स्कूल नहीं गया, उसे भाई, बहन को बहन या माता-पिता को माता-पिता के रूप में परिचय देने में शर्म क्यों महसूस होती है? यह पता लगाने की ज़रूरत है कि आदिवासियों के मन में शर्म के ये भाव किसने और क्यों बोए हैं?

आदिवासियों की मुक्ति की लड़ाई में रोड़ा लाने वाले मूल्य-दोष आंदोलन या आंदोलनकारियों में व्यक्तिगत रूप में हों वैसे ही रखकर आदिवासी पहचान का आंदोलन जारी नहीं रखा जा सकता।

आदिवासी नेतृत्व को यह याद रखना होगा कि अगर कोई आप पर उँगली उठा रहा है तो आपको सिर नहीं झुकाना चाहिए। हमें यह विश्वास दिलाना होगा कि आदिवासी मुक्ति आंदोलन गर्दन उठाए और दृढ़ संकल्प के साथ मानव मुक्ति की ओर बढ़ रहा है।

यह विश्वास देते हुए हमारे आंदोलन की भूमिका और दिशा को स्पष्ट किया जाना चाहिए। इस शक्ति के बल पर समाज को जगाना, एकजुट करना, उसमें से एक शक्ति का निर्माण करना और कमज़ोरों पर शासन करना यह हमारी भूमिका नहीं है। हम केवल अपने इतिहास का महिमामंडन नहीं करना चाहते, हम भविष्य को आकार देना चाहते हैं। हमें अलग विकल्प देने के लिए नहीं, बल्कि हम भविष्य को आकार आदिवासी आंदोलन अपनी पहचान के साथ सबके कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए हैं।

Author

  • वाहरू सोनवणे / Vahru Sonvane

    वाहरू सोनवणे आदिवासी एकता परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं। वे आदिवासी पहचान, आत्मसम्मान और समुदाय से जुड़े सवालों व मुद्दों पर लंबे समय से सक्रिय रूप से संगठनात्मक कार्य में संलग्न हैं।

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