मधुलिका:
‘आदिवासी का धर्म क्या है?’ यह सवाल दक्षिण राजस्थान की राजनीति में इन दिनों बेहद गरमाया हुआ है। राजनीतिक पार्टियाँ और नेता इस पर लगातार बहस करते हैं। कोई कहता है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, तो कोई कहता है कि जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं, उनका आरक्षण समाप्त कर देना चाहिए। इसके साथ ही आदिवासी धर्म कोड की माँग भी लगातार मज़बूत होती जा रही है।
मैं आदिवासी नहीं हूँ, लेकिन यह प्रश्न मुझे अत्यंत जिज्ञासापूर्ण प्रतीत होता है और वर्तमान राजनीति के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक भी है। इसका उत्तर आदिवासी समाज एक स्वर में देगा या इसमें विविधता होगी, यह तो समय ही बताएगा। किंतु इस क्षेत्र से प्रेम करने वाली एक सामान्य नागरिक और संविधान में आस्था रखने वाली सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में, मैंने इस प्रश्न को भारतीय संविधान तथा संविधान सभा में हुई चर्चाओं के माध्यम से समझने का प्रयास किया है।
किसी भी समाज को आदिवासी घोषित करने की प्रक्रिया संविधान में अनुच्छेद 341, 342 में दी गई है, पर आदिवासी कौन है, इस प्रश्न पर संविधान मौन है। संविधान सभा में आदिवासियों की बात पुरज़ोर तरीके से रखने वाले जयपाल सिंह मुंडा ने बहुत गर्व से ‘जंगली’ एवं ‘आदिवासी’ इन शब्दों को अपनाया है। “मेरे लोगों का पूरा इतिहास भारत के ग़ैर-आदिवासियों द्वारा निरंतर शोषण और बेदखली के ख़िलाफ़ विद्रोह का रहा है। फ़िर भी मैं पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं आप सभी के शब्दों पर विश्वास करता हूँ कि अब हम एक नया अध्याय शुरू करने जा रहे हैं, स्वतंत्र भारत का एक नया अध्याय जहाँ अवसर की समानता है, जहाँ किसी की उपेक्षा नहीं की जाएगी। आप आदिवासियों को लोकतंत्र नहीं सिखा सकते; आपको उनसे लोकतांत्रिक तरीके सीखने होंगे। वे पृथ्वी पर सबसे अधिक लोकतांत्रिक लोग हैं।”
उन्होंने झारखंड आंदोलन (1940 के दशक) के दौरान बार-बार चेतावनी दी कि धर्म के नाम पर आदिवासियों का विभाजन उनकी एकता तोड़ेगा और भूमि व भविष्य को ख़तरे में डालेगा। झारखंड धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान, भाषा, संस्कृति और ज़मीन के आधार पर बनेगा। “We are Adivasis first” – यही उनके आंदोलन की आत्मा थी।
संविधान के बाद में बनी कमेटियों ने इस प्रश्न का जवाब देने का प्रयास किया। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से परे सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए उपायों की जाँच और सिफ़ारिश करने के लिए काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में बने आयोग की 1955 में प्रकाशित हुई रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जनजातियों का भी सामान्य रूप से पता लगाया जा सकता है कि – वे पहाड़ियों में अलग-अलग रहते हैं, और जहाँ वे मैदानी इलाक़ों में रहते हैं, वे एक अलग-थलग जीवन जीते हैं और मुख्यधारा में पूरी तरह से जुड़े नहीं होते। वे किसी भी धर्म से संबंधित हो सकते हैं। वे जिस तरह का जीवन जीते हैं, उसके कारण उन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
फ़िर लोकुर कमेटी ने 1965 में कुछ गुणों का उल्लेख किया – आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, दूसरे समुदाय के संपर्क से बचना, इलाक़े का पिछड़ापन।
अपने देश की सर्वोच्च न्यायालय ने भी नियामगिरि जैसे लैंडमार्क निर्णयों (2013) में आदिवासियों की प्रकृति, पहाड़ों और वनों से जुड़ी स्वतंत्र धार्मिक परंपरा को मान्यता दी है। “The Scheduled Tribes have a distinct culture, customs, traditions and practices which are integrally connected with their lands, forests and natural resources.” वहीं आदिवासी भूमि अधिकारों के संरक्षण से जुड़े प्रसिद्ध समता निर्णय (1997) में न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि आदिवासी समुदाय केवल कोई पिछड़ा वर्ग नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं और जीवन-पद्धति के साथ एक अलग पहचान रखने वाला है। भूमि से संबंध उसके अस्तित्व का अभिन्न अंग है।
जयपाल सिंह के ज़ोरदार वक्तव्य में, काका कालेलकर कमेटी, लोकुर कमेटी की परिभाषा में, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों में आदिवासियों को किसी भी धर्म के साथ जोड़ा नहीं गया है, पर किसी भी धर्म के बाहर भी नहीं किया गया है। संविधान के हिसाब से धर्म एक निजी मामला है, उसको अपनाने या नहीं अपनाने की स्वतंत्रता हर एक व्यक्ति की है।
आज भारत में आदिवासी समाज कोई एकरूप या एकसमान समूह नहीं है। संविधान की अनुसूचियों में 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में फैले लगभग 705 आदिवासी समुदाय सूचीबद्ध हैं। इसके अतिरिक्त, 17 राज्यों में 75 समुदायों को “विशेषतः असुरक्षित जनजातीय समूह (PVTGs – Particularly Vulnerable Tribal Groups)” के रूप में चिह्नित किया गया है – जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, जनसंख्या, आजीविका और सांस्कृतिक निरंतरता अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। यह तथ्य अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि “आदिवासी” कोई एक धर्म, एक परंपरा या एक ही पहचान में बाँधा जा सकने वाला समाज नहीं है, बल्कि यह अनेक भाषाओं, विश्वासों, जीवन-पद्धतियों और प्रकृति-आधारित आस्थाओं से मिलकर बना एक विशाल और विविध सभ्यतागत संसार है।
इस विशाल, प्रकृति-आधारित आस्थाओं को परिभाषित करने के लिए मैं अमेरिका के आदिवासी नेता चीफ़ सियाटल के शब्दों का मदद लेना चाहूँगी – “इस धरती का हर एक टुकड़ा मेरे लोगों के लिए पवित्र है। चीड़ की हर चमकती पत्ती, हर रेतीला किनारा, घने जंगलों का कोहरा, हर मैदान, हर भुनभुनाता कीड़ा – ये सभी मेरे लोगों की स्मृति और अनुभवों में पवित्र हैं। हम तो बस इतना ही जानते हैं कि हम इस धरती के मालिक नहीं हैं, यह हमें विरासत में मिली है। सब कुछ एक-दूसरे में उतना ही घुला-मिला है जैसे हमें आपस में जोड़ने वाला रक्त। यह जीव-जगत हमारा बनाया नहीं है, हम तो इस विराट थान के एक छोटे से तंतु हैं। यदि इस थान का बिगाड़ होगा तो हम भी नहीं बचेंगे।”

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