राकेश जाधव:
नोट : यह लेख गाँव की एक वास्तविक घटना पर आधारित है। मैंने इस घटना को केवल एक कहानी का रूप देने की कोशिश की है, ताकि पाठकों को इसे पढ़ने और समझने में आसानी हो।
कुछ ग़लत चीज़ें हमारी आँखों के सामने होती चली जाती हैं और हम उन्हें बदलने के बजाय उनके लिए कोई वजह तलाशने लगते हैं। ऐसी ठोस वजहें, जो हमारे ज़मीर को झकझोर सकें। ऐसी वजहें, जो आत्मग्लानि को थोड़ा कम कर दें। ठीक ऐसा ही कुछ 2 नवंबर, 2025 की रात हुआ।
अशोक हमारे गाँव का एक बेहद भोला-भाला, 29 वर्षीय नौजवान किसान है। सरलता, सभ्यता और शालीनता का वह जीता-जागता उदाहरण है। हालाँकि उसके यही मानवीय गुण कुछ लोगों को मानसिक विकार जैसे लगते हैं। मेरे घर के पीछे, ठीक दो मकान छोड़कर, अशोक का घर है। सुबह का वक्त था। सूरज अभी ठीक से निकला भी नहीं था, तभी हमें एक दुखद ख़बर मिली। बताया गया कि अशोक को साँप ने काट लिया है। हम जब उसके घर पहुँचे, तो वहाँ उसकी दादी के अलावा कोई नहीं था। पूरा मकान सुनसान पड़ा था। उसकी दादी को भी उस समय किसी प्रकार की जानकारी नहीं थी और वहाँ ऐसा कोई भी मौजूद नहीं था जो पूरी घटना बता सके।
अशोक के घर के नीचे ढलान पर एक और मकान है। हम वहाँ पहुँचे, लेकिन उन्हें भी हादसे की पूरी जानकारी नहीं थी। उस घर के मुखिया ने बताया कि यह ख़बर उन्हें भी उड़ती-उड़ती ही मिली थी। फिर भी उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि साँप ने अशोक को नहीं, बल्कि उसके छोटे भाई राकेश को काटा था। इतना ही नहीं, संभवतः राकेश की मौत भी हो चुकी थी। हमने तुरंत उनके परिजनों को फ़ोन किया। जिसने कॉल उठाई, उसकी आवाज़ में गहरा दुख और पीड़ा साफ़ महसूस हो रही थी। पीछे से औरतों के रोने की आवाज़ें हमारे संदेह को सच्चाई में बदल रही थीं। उस पल हमारे भीतर क्रोध और पछतावे का ऐसा मिश्रण जाग उठा, जिसने हमें भीतर से तोड़ दिया।
यह भावना तब और तीव्र हो गई जब पता चला कि राकेश को किसी भी अस्पताल नहीं ले जाया गया था। उसकी मौत गाँव के भगत और पुजारी-जिन्हें आदिवासी समाज में ‘बढ़ुवा’ कहा जाता है-के इलाज के दौरान ही हो गई थी। ये लोग साँप का ज़हर उतारने का दावा करते हैं। क्या सच है और क्या झूठ-यह केवल वही जानते हैं।
मगर इन्हें कौन समझाए कि विज्ञान कितनी तरक़्क़ी कर चुका है। शोध यह सिद्ध कर चुके हैं कि हमारे देश में केवल लगभग 20 प्रतिशत साँप ही ज़हरीले होते हैं, और उनमें से भी बहुत कम मनुष्य के लिए घातक होते हैं। अधिकतर मामलों में लोग डर और अंधविश्वास का शिकार हो जाते हैं। फिर गाँव के भगत उसी अंधविश्वास के कंधे पर बंदूक रखकर आम लोगों को निशाना बनाते हैं।
पहले समय की बात कुछ अलग रही होगी। तब औषधियों के माध्यम से इलाज किया जाता था। मगर आज के भगत केवल मंत्रों और बातों का सहारा लेते हैं। इक्कीसवीं सदी में यह बात हज़म करना मुश्किल है। कई बार कम ज़हरीले या बिना ज़हर वाले साँप के काटने पर लोग ‘प्लेसिबो इफेक्ट’ के कारण स्वयं ही सामान्य हो जाते हैं, और इसे झाड़-फूँक का असर मान लिया जाता है। संभव है यही तरीका पहले के वैद्यों का भी रहा हो-ताकि मरीज़ घबराए नहीं और उसका रक्तचाप नियंत्रित रहे।
ख़ैर, अब जो होना था, वह हो चुका था। हमें घटना की जानकारी सुबह मिली, जबकि राकेश को रात दो बजे साँप ने डस लिया था। तब तक उसे गाँव के सभी बढ़ुवाओं के पास ले जाया जा चुका था। दूसरे गाँवों के बढ़ुवाओं को भी नहीं छोड़ा गया। मरीज़ को बाइक पर बैठाकर इधर-उधर घुमाया गया, जिससे ज़हर तेज़ी से शरीर में फैल गया। यहाँ तक कि एक बढ़ुवे ने उसे पानी भी पिला दिया। जैसे-जैसे पूरी घटना का विवरण सामने आता गया, हमारे भीतर की नाराज़गी बढ़ती चली गई। यह नाराज़गी अस्पताल न ले जाने की थी, और उन लोगों से भी थी जिन्होंने हमें इस हादसे की सूचना तक देना ज़रूरी नहीं समझा।
धीरे-धीरे गाँव में ख़बर फैल गई। लोग इकट्ठा होने लगे। औरतें परंपरा के अनुसार घर के भीतर रोने लगीं, और पुरुष बाहर बैठकर मौत के कारणों पर चर्चा करने लगे। हर कोई हैरान और नाराज़ था। कुछ गिने-चुने सवाल बार-बार उठ रहे थे-रात में पड़ोसियों को क्यों नहीं बताया गया? जब बढ़ुवे से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, तो अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया? राकेश को एक ही जगह, उसके घर पर क्यों नहीं रखा गया?
गाँव में ऐसे हादसों के बाद अक्सर तर्कहीन चर्चाएँ शुरू हो जाती हैं। लोग अटकलों के आधार पर निष्कर्ष निकाल लेते हैं और उन्हें सच मान लेते हैं। फिर वही बातें उन भोले लोगों के बीच जीवित रहती हैं, जो या तो कम पढ़े-लिखे होते हैं या जिनका बौद्धिक विकास सीमित होता है। सुबह करीब दस बजे राकेश का शव घर लाया गया। लगभग पूरा गाँव इकट्ठा हो चुका था। औरतों के रोने की आवाज़ें बहुत तेज़ थीं और बाहर लोगों की भीड़ भी कम नहीं थी। चर्चाएँ जारी थीं। ऐसी स्थिति में मेरी संवेदनशीलता मुझे गहरे विचारों में धकेल देती है-जहाँ मैं कई सवालों से घिर जाता हूँ, उनका सामना करता हूँ। कई बार ये सवाल मुझे छलनी कर जाते हैं, तो कभी सही राह भी दिखाते हैं।
यह अत्यंत निंदनीय था कि इलाज के नाम पर ढोंग करने वाले ये भगत आज भी लोगों को गुमराह कर रहे हैं। साँप का काटना कोई मामूली बीमारी नहीं है, फिर भी ये लोग अपनी झूठी प्रतिष्ठा के चलते इलाज का नाटक करते हैं। हद तब हो गई जब शव में हलचल दिखने की बात फैल गई। किसी ने एक बढ़ुवे को फ़ोन पर बुलाकर शव के कान के पास मोबाइल रख दिया। फ़ोन पर मंत्र पढ़े जा रहे थे। यह दृश्य मेरे ज़मीर को चीर गया।
मैं खुद को रोक नहीं पाया और पूछ बैठा- “क्या किसी डॉक्टर को बुलाया गया है? क्या मृत घोषित करने से पहले मेडिकल जाँच करवाई गई?”
मेरी बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सब उसी झूठी उम्मीद में थे कि शायद वह भगत कोई चमत्कार कर दे। अंततः डॉक्टर को कॉल किया गया और शव को सरकारी अस्पताल ले जाया गया। अब तो बहुत बड़ा झटका लगना बाकी था। शव को पिकअप में डालकर नज़दीकी सरकारी अस्पताल ले जाया गया। हम भी बाइक पर बैठकर उनके साथ हो लिए। अस्पताल पहुँचकर पता चला कि राकेश की मृत्यु लगभग आधे घंटे पहले हो चुकी थी। उससे पहले उसका शरीर पैरालाइज़ हो चुका था। यह स्थिति कुछ विशेष प्रकार के साँपों के काटने पर होती है, जिसे चिकित्सा विज्ञान में न्यूरोटॉक्सिक प्रभाव कहा जाता है।
अब पछतावे के अलावा कुछ बचा नहीं था। ख़बर पक्की हो जाने पर गाँव के दूसरे लोग अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गए। श्मशान घाट पर लकड़ियाँ इकट्ठा की गईं। परंपरा के अनुसार मय्यत में शरीक प्रत्येक व्यक्ति ने पाँच से ज़्यादा लकड़ियाँ शव को जलाने के लिए डालीं। अर्थी के पास उसकी पत्नी, माँ और तीन छोटे-छोटे बच्चे फूट-फूटकर रो रहे थे। अशोक की हालत बदहवास थी। उसके पिता असामान्य रूप से शांत थे-मानो या तो उन्होंने खुद को कठोर बना लिया हो, या मृत्यु को स्वीकार करने से इनकार कर रहे हों।
राकेश की मौत कुरीतियों के मुँह पर पड़ा एक तमाचा थी। समाज चाहे तो इससे सीख ले सकता था, या फिर इसे भी किस्मत का लिखा मानकर भूल सकता था। दुर्भाग्य से, अगले ही दिन गाँव में एक और बढ़ुवे को बुलाया गया। वह लगभग एक घंटे तक किसी अलौकिक शक्ति से संपर्क करने का ढोंग करता रहा। इसे आदिवासी समाज में ‘भार’ या ‘राशि’ कहा जाता है। आख़िरकार उस बढ़ुवे ने अपने आख़िरी शब्दों में राकेश की मौत को किसी साज़िश और काली शक्ति का परिणाम बताया। और लोगों ने उस पर यक़ीन भी कर लिया। वहाँ बहुत-से लोग मौजूद थे-गाँव के बड़े-बूढ़े भी, और कुछ पढ़े-लिखे वयस्क भी। मैंने उस अंधविश्वास के पनपते कीचड़ में कुछ चेहरे ऐसे भी देखे जो नाखुश थे। एक दबी हुई आवाज़ भी सुनी, जो इन कुरीतियों का बहिष्कार कर रही थी। मगर सब बँधे हुए थे-परंपरा और प्रथा के नियमों से।
मगर सवाल फिर भी उठता है-क्या ये परंपराएँ वाकई हमारे पूर्वजों की दी हुई विरासत हैं, या फिर समय की धूल और भ्रम के मिश्रण से आज ग़लत दिशा में बढ़ रही हैं? क्या राकेश की मौत इन ढोंगी भगतों के चक्रव्यूह को समझने के लिए काफ़ी नहीं थी, या फिर यह अंधविश्वास राकेश जैसे और भोले-भाले लोगों की कुर्बानी माँगता रहेगा?
यह समय है अपने इतिहास और विवेक को समझने का। प्रथा और कुरीति के बीच अंतर पहचानने का। अन्यथा बहुत देर हो जाएगी। अंततः मैं यही कहूँगा- “अंधविश्वास एक ज़हरीला वायरस है, जो हवा में फैलता है और एक साथ कई ज़िंदगियों को निगल जाता है।”

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